भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1654, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1654

[ 19/187-191 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [ बायाँ स्तम्भ ] “सैवोत्साहरतिः स्थायी विभावाद्यैर्निजोचितैः। आनीयमाना स्वाद्यत्वं वीरभक्तिरसो भवेत्। युद्धदानदयाधर्मैश्चतुर्धा वीर उच्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'उत्साह-रति'के आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'वीरभक्तिरस' होता है। 'युद्ध', 'दान', 'दया', और 'धर्म',—इन चार प्रकारके कार्योंमें चार प्रकारके 'वीर' कहे जाते हैं।” 'करुण-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः चतुर्थ लहरी)— “आत्मोचितैर्विभावाद्यैर्नीता पुष्टिं सतां हृदि। भवेच्छोकरतिर्भक्ति-रसो हि करुणाभिधः॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'शोक-रति'के पुष्ट होनेपर उसे 'करुणभक्तिरस' कहते हैं।” 'रौद्र-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः पञ्चम लहरी)— “नीता क्रोधरतिः पुष्टिं विभावाद्यैर्निजोचितैः। हृदि भक्तजनस्यासौ रौद्रभक्तिरसो भवेत्॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके हृदयमें 'क्रोधरति'के पुष्ट होनेपर 'रौद्र-भक्तिरस' होता है।” 'भयानक-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः षष्ठम लहरी)— “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं भयरतिर्गता। भयानकाभिधो भक्तिरसो धीरैरुदीर्यते॥” “विचाराधीन विभावादिके द्वारा 'भयरति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगणोंके द्वारा वह 'भयानक-भक्तिरस' कहा जाता है।” 'वीभत्स-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः सप्तम लहरी)— “पुष्टिं निजविभावाद्यैर्जुगुप्सा रतिरागता। असौ भक्तिरसो धीरैर्वीभत्साख्य इतीर्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें जुगुप्सा अथवा 'घृणा-रति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगण उसे 'वीभत्स-भक्तिरस' कहते हैं।” 'पञ्चविध भक्त'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन स्थायी पाँच प्रकारके रसोंके भक्तोंमें हास्यादि सात गौणरस 'कारण'को देखकर प्रकाशित होते हैं॥187-188॥ [ दायाँ स्तम्भ ] शान्त और दास्य-रसके भक्तोंके नाम :— शान्तभक्त—नवयोगेन्द्र, सनकादि आर। दास्यभाव-भक्त—सर्वत्र सेवक अपार॥189॥ अनुवाद—नवयोगेन्द्र और सनकादि चार कुमार शान्तभावके भक्त हैं। दास्यभावके भक्तोंके असंख्य उदाहरण हैं, वे भगवद्-सेवक तो सर्वत्र विद्यमान हैं॥189॥ अनुभाष्य—'नवयोगेन्द्र'—(भाः 5/4/11 और 11/2/21)—(1) कवि, (2) हवि, (3) अन्तरिक्ष, (4) प्रबुद्ध, (5) पिप्पलायन, (6) आविर्होत्र, (7) द्रविड़ (द्रुमिल), (8) चमस और (9) करभाजन। 'सनकादि'—(1) सनक, (2) सनन्दन, (3) सनत्कुमार, (4) सनातन। 'दास्यभाव-भक्त'—(1) गोकुलमें रहनेवाले रक्तक- चित्रक-पत्रकादि दासगण, (2) द्वारकापुरीमें रहनेवाले दारुकादि दासगण, 3) वैकुण्ठमें स्थित दासगण, 4) हनुमानादि लीला-दासगण॥189॥ सख्य और वात्सल्य-रसके भक्तोंके नाम :— सख्य-भक्त—श्रीदामादि, पुरे भीमार्जुन। वात्सल्य-भक्त—माता-पिता, यत गुरुजन॥190॥ अनुवाद—सख्यभक्तोंके उदाहरण ब्रजमें श्रीदामादि और द्वारकापुरीमें भीम तथा अर्जुनादि हैं। वात्सल्य- भक्तके उदाहरण माता-पिता [ब्रजमें यशोदा-नन्द और द्वारकामें देवकी-वसुदेव] तथा जितने [वात्सल्यभावमें आयुमें बड़े] गुरुजन हैं॥190॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'व्रजे'—ब्रजमें श्रीदामादि, 'पुरे'— द्वारका-लीलामें भीम-अर्जुन॥190॥ मधुर-रसके भक्तगण—द्वारकाकी कान्ताएँ और ब्रजकी कान्ताएँ :— मधुर-रसे भक्तमुख्य—व्रजे गोपीगण। महिषीगण, लक्ष्मीगण, असंख्य गणन॥191॥ 208 |