श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1653, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/185-188 ] "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तोंके चित्तमें प्रीतरति आकर आस्वादनीयताको प्राप्त करनेपर वही 'प्रीति' अथवा 'दास्य-भक्ति-रस' होता है। अनुग्रह-योग्य दासोंके दासत्व और लाल्यत्वके भेदसे दास्य रसमें सम्भ्रम-दास्य और गौरवदास्य, - दो प्रकारकी प्रीति लक्षित होती है।" 'सख्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "स्थायिभावो विभावाद्यैः सख्यमात्मोचितैरिह। नीतश्चित्ते सतां पुष्टिं रसप्रेयानूदीर्यते॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा स्थायीभावमें भक्तोंके चित्तमें सख्यरतिके पुष्ट होनेपर 'प्रेयरस' अथवा 'सख्यभक्तिरस' होता है।" 'वात्सल्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः। एष वत्सल-नामात्र प्रोक्तो भक्तिरसो बुधैः॥" "स्थायीभाव भक्तके चित्तमें विभावादिके द्वारा वात्सल्परतिके पुष्ट होनेपर भक्त-पण्डितगण उसे 'वात्सल्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'मधुर भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः पञ्चम लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः पुष्टिं नीता सतां हृदि। मधुराख्यो भवेद्भक्तिरसोऽसौ मधुरा रतिः॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा सद्भक्तोंके हृदयमें मधुर-रति पुष्ट होनेपर 'मधुराख्य भक्तिरस' कहकर कीर्तित होती है॥" 185॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/116) :- हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः करुणो रौद्र इत्यपि। भयानकः स वीभत्स इति गौणश्च सप्तधा ॥ 186 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 186॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'मुख्यरस' शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-पाँच प्रकारके हैं। हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ अनुभाष्य- तथा हास्यः, अद्भुतः, वीरः, करुणः, रौद्रः, भयानकः, वीभत्सः-इति सप्तधा गौणरसश्च अपि। श्लोक-भावानुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स, भय। पञ्चविध-भक्ते गौण सप्तरस हय ॥ 187 ॥ अनुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स तथा भयानक-ये सातों गौणरस पाँचों प्रकारके भक्तोंमें ही रहते हैं॥ 187॥ पाँच मुख्यरस-स्थायी; सात गौणरस- आगन्तुक :- पञ्चरस 'स्थायी', व्यापी' रहे भक्त-मने। सप्त गौण 'आगन्तुक' पाइये कारणे ॥ 188 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पहले कहे गये पाँच मुख्यरस स्थायीभावसे ही भक्तके हृदयमें रहते हैं। हास्य- अद्भुतादि गौणरस 'कारण' उपस्थित होनेपर भक्तके हृदयमें आगन्तुकके रूपमें उदित होकर मुख्यरसको पुष्ट करके निवृत्त होते हैं॥ 188॥ अनुभाष्य- 'हास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः प्रथम लहरी)- "वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं हासरतिर्गता। हासभक्तिरसो नाम बुधैरेष निगद्यते॥" "विचाराधीन विभावादिके द्वारा हास्यरतिके पुष्ट होनेपर ही पण्डितगण उसे 'हास्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'अद्भुत-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः द्वितीय लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः स्वाद्यत्वं भक्तचेतसि। सा विस्मयरतिर्नीताऽद्भुतभक्तिरसो भवेत्॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें विस्मयरति' आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'अद्भुत-भक्तिरस' होता है।" 'वीर-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः तृतीय लहरी)- । 207