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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1652, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1652

[ 19/182-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'दास्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “स्वस्माद्भवन्ति ये न्यूनास्तेऽनुग्राह्या हरेर्मताः। आराध्यत्वात्मिका तेषां रतिः प्रीतिरितीरिता। तत्रासक्तिकृदन्यत्र प्रीतिसंहारिणी ह्यसौ॥” अर्थात् “श्रीभगवान्से स्वयंको छोटा माननेका अभिमान रखनेवाली रतिसे युक्त होनेपर जीव हरिके अनुग्रहका पात्र बन जाता है। ‘भगवान् ही आराध्य हैं'—ऐसी प्रीति-नामक रति ही आराध्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमें ‘आसक्ति' उत्पन्न करती है एवं भगवान्के अतिरिक्त मायिक वस्तुओंके प्रति प्रीतिका विनाश करती है।” 'सख्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “ये स्युस्तुल्या मुकुन्दस्य ते सखायः सतां मताः। साम्याद्विश्रम्भरूपैषां रतिः सख्यमिहोच्यते॥ परिहासप्रहासादिकारिणीयमयन्त्रणा।” अर्थात् “विद्वान और सज्जनोंके मतमें जो मुकुन्दके समान होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले हैं, वे ही ‘सखा' हैं; श्रीकृष्णके साथ परस्पर समान भाव होनेके कारण सङ्कोचरहित विश्वासमयी रतिको ‘सख्यरति' कहते हैं। यह सख्यरति-परिहास और उच्च-हास्यादि करानेवाली होती है, इसे अयन्त्रणा अर्थात् बन्धनहीना रति कहते हैं।” 'वात्सल्य-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “गुरुवो ये हरेरस्य ते पूज्या इति विश्रुताः। अनुग्रहमयी तेषां रतिर्वात्सल्यमुच्यते। इदं लालनभव्याशीशिचबुकस्पर्शनादिकृत्॥ अर्थात् “गुरु होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले जीवगण ही भगवानके ‘पूज्य' हैं; उनकी अनुग्रहमयी रतिको ‘वात्सल्य रति' कहते हैं। इस वात्सल्य-रतिमें लालन, कल्याण साधन, आशीर्वाद और ठोड़ीको स्पर्श करने आदिके अनुष्ठान हैं।” 'मधुर-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “मिथो हरेर्मृगाक्ष्याश्च सम्भोगस्यादि-कारणम्। मधुरापरपर्याया प्रियताख्योदिता रतिः। अस्यां कटाक्षभ्रूक्षेपप्रियवाणीस्मितादयः॥” अर्थात् “श्रीभगवान्के एवं मृगनयनियोंके परस्पर स्मरण-दर्शनादि आठ प्रकारके सम्भोगका मूल कारण- प्रियता अथवा मधुरा-रति है। मधुरा-रतिमें कटाक्ष, भ्रूक्षेप, प्रियवाक्य और मधुर-हास्यादि अनुष्ठान वर्तमान होते हैं॥”182-184॥ पाँच मुख्य भक्तिरस और सात गौणरस :- शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस नाम। कृष्णभक्ति-रसमध्ये ए पञ्च प्रधान॥185॥ अनुवाद-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रस, श्रीकृष्णभक्ति-रसमें ये पाँच प्रकारके रस मुख्य हैं॥185॥ अनुभाष्य-‘शान्तभक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः प्रथम लहरी)- “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः शमिनां स्वाद्यतां गतः। स्थायी शान्तिरतिर्धीरैः शान्तभक्तिरसः स्मृतः। प्रायः स्वसुखजातीयं सुखं स्यादत्र योगिनाम्। किन्त्वात्मसौख्यमघनं घनं त्वीशमयं सुखम्॥ तत्रापीशस्वरूपानुभवस्यैवारुहेतुता। दासादिवन्मनोज्ञत्वलीलादेर्न तथा मता॥” अर्थात् “शान्तरतिरूपी स्थायीभाव विचाराधीन विभावादिके साथ मिलकर जब शान्तभक्तोंके द्वारा आस्वादनीय होते हैं अर्थात् तद्रूपता प्राप्त करते हैं, तब ‘शान्तभक्तिरस' होता है। शान्तरसमें योगियोंके सर्वमूल- स्वरूप निर्विशेष-ब्रह्मानन्दजातीय सुखकी प्राप्ति होती है, किन्तु यह आत्मानन्द-‘अघन' अर्थात् बहुत कम होता है; और सच्चिदानन्द भगवद्विग्रह-स्फूर्तिमें प्रचुर सेवा-सुख ही ‘गाढ़' होता है। शान्तभक्तोंका साक्षात्कारके लिये सुख अधिक तो होता है, किन्तु दास्य आदिकी भाँति भगवान्की मनोहर लीलाओंमें उनकी वैसी रुचि नहीं होती।” 'दास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- “आत्मोचितैर्विभावाद्यैः प्रीतिरास्वाद्यनीयताम्। नीता चेतसि भक्तानां प्रीतिभक्तिरसो मतः॥ अनुग्राह्यस्य दासत्वाल्लाल्यत्वाद्द्वयं द्विधा। भिद्यते सम्भ्रमप्रीतो गौरवप्रीत इत्यादि॥” 206 ।

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