भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1651

उन्नीसवाँ अध्याय 19/178–184 ] “सान्द्रश्चित्द्रवं कुर्वन् प्रेमा ‘स्नेह’ इतीयते। क्षणिकस्यापि नेह स्याद्विश्लेषस्य सहिष्णुता ॥” “चित्तको द्रवीभूत करनेवाले भावके अत्यधिक गाढ़ होनेपर प्रेम ‘स्नेह’-संज्ञा प्राप्त करता है। उसमें एक क्षणका वियोग भी सहन नहीं होता।” ‘मान’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘प्रणय’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘राग’—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)— “स्नेहः स रागो येन स्यात् सुखं दुःखमपि स्फुटम्। तत्सम्बन्ध-लवेऽप्यत्र प्रीतिः प्राणव्ययैरपि॥” “जिस स्नेहमें स्पष्टरूपसे दुःख ही ‘सुख’के रूपमें प्रतीत होता है, वही ‘राग’ है। इस सम्बन्धमात्रसे अपने प्राणोंको नष्ट करके भी श्रीकृष्णकी प्रीतिको उदित करानेकी प्रवृत्ति होती है।” ‘अनुराग’, ‘भाव’ और ‘महाभाव’—मध्यलीला 6/13 संख्याके अनुभाष्यमें ‘अधिरूढ़-महाभाव’का प्रसङ्ग देखें। ‘स्थायीभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायिभावो भक्तिरसो भवेत् ॥” “कृष्णरति-स्थायीभाव-स्वरूप है; श्रवणादिके द्वारा विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके सम्मिलनसे, भक्तोंके हृदयमें आस्वादनीय भावसे लाये जानेपर वही ‘भक्तिरस’ होता है।” ‘विभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादनहेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपना परे॥” “रतिके आस्वादन-हेतुसमूहको ‘विभाव’ कहते हैं। विभाव-आलम्बन और उद्दीपनके भेदसे दो प्रकारका होता है।” ‘अनुभाव’—(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी)— “अनुभावास्तु चित्तस्था भावानामवबोधकाः। ते बहिर्विक्रिया-प्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्यया ॥” “जो उद्भास्वरयुक्त चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक बाहरमें विकार जैसी चेष्टा प्रदर्शित करते हैं, वे ही ‘अनुभाव’ हैं।” ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’—मध्यलीला 3/162 संख्या और मध्यलीला 14/167 संख्या देखें॥ 178-181 ॥ उपमा :- यैछे दधि, सिता, घृत, मरीच, कर्पूर। मिलने ‘रसाला’ हय अमृत मधुर ॥ 182 ॥ भक्तके भेदसे पाँच प्रकारकी रति और रतिके भेदसे पाँच प्रकारके भक्तिरस :- भक्तभेदे रति-भेद पञ्च परकार। शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति आर ॥ 183 ॥ वात्सल्यरति, मधुररति,—ए पञ्च विभेद। रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे पञ्च भेद ॥ 184 ॥ अनुवाद—जैसे दही, मिश्री, घी, काली मिर्च तथा कर्पूरको मिलानेसे ‘रस’ अमृतकी भाँति मधुर होता है। उसी प्रकार भक्तोंके भेदसे रति भी शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति और मधुररति—पाँच प्रकारकी होती है। रतिभेदसे श्रीकृष्णभक्तिरस भी पाँच प्रकारके होते हैं॥ 182-184 ॥ अनुभाष्य— ‘सिता’—मिश्री। ‘शान्तरति’—(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “मानसे निर्विकल्पत्वं शम इत्यभिधीयते” अर्थात् “मानसमें संशयादि रहित भावको ‘शम’ कहते हैं।” (भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “विहाय विषयोन्मुख्यं निजानन्द-स्थितिर्यतः। आत्मनः कथ्यते सोऽत्र स्वभावः शम इत्यसौ ॥ प्रायः शमप्रधानानां ममतागन्धवर्जिता। परमात्मतया कृष्णे जाता शान्तरतिर्मता ॥” अर्थात् “विषय वासनाको छोड़कर अपने आनन्दमें अवस्थित होनेको ‘शम’-स्वभाव कहते हैं। शम-प्रधान व्यक्तियोंकी परमात्म-ज्ञानसे श्रीकृष्णके प्रति ममता- गन्धहीन शान्तरति उत्पन्न होती है।” । 205