भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1650, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1650

[ 19/177-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपमा :- यैछे बीज, इक्षु-रस, गुड़, खण्ड-सार। शर्करा, सिता-मिछरि, उत्तम-मिछरी आर ॥ 179 ॥ रतिके साथ विभावादि चार प्रकारके भावोंके मिलनसे रसका उदित होना :- एसब कृष्णभक्ति-रसे स्थायिभाव। स्थायिभावे मिले यदि विभाव, अनुभाव ॥ 180 ॥ सात्त्विक, व्यभिचारि-भावेर मिलने। कृष्णभक्ति-रस हय अमृत आस्वादने ॥ 181 ॥ अनुवाद-प्रेम वर्द्धित होनेपर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव नाम धारण करता है। जैसे गन्नेका बीज अङ्कुरित होकर गन्ना बनता है, फिर उस गन्नेका रस निकाला जाता है। तब उसको उबालनेपर वह गुड़ बनता है, गुड़से क्रमशः खाण्ड, चीनी, सफेद मिश्री और उत्तम मिश्री बनती है। इसी प्रकार रतिसे महाभाव तक सभी श्रीकृष्णभक्ति-रसमें स्थायी-भाव कहलाते हैं। स्थायी-भावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावके मिलनेसे श्रीकृष्णभक्ति-रस अमृतके समान आस्वादनीय हो जाता है ॥ 178-181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिकी तीन अवस्थाएँ हैं- साधनावस्था, भावावस्था और प्रेमावस्था। श्रवण-कीर्तनादि नौ प्रकारके अङ्ग पहले साधनभक्तिमें ही क्रियान्वित होते हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण-कीर्तनादि करते-करते पूर्वोक्त सभी अनर्थ जितनी मात्रामें कम होते हैं, उतनी ही श्रद्धावृत्ति क्रमशः उच्चभाव धारण करते हुए निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव या रति, -इन सब नामोंसे परिचित होती है। साधनभक्तिसे ही रतिका उदय होता है; श्रवण-कीर्तनादिके अनुशीलनसे ही वह रति जितनी गाढ़ होती जाती है, उतना ही 'प्रेमादि' नाम धारण करती है। (क्रमशः) प्रेम वर्धित होते हुए स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव तक उन्नत होता है। इसका उदाहरण यह है, गन्नेका रस-मानो रतिस्थानीय बीजस्वरूप है, वह जितना गाढ़ होता है, उससे पहले गुड़, बादमें खाण्ड, चीनी, सफेद-मिश्री और उत्तम मिश्री-इन सब अवस्थाओंको प्राप्त करता है। रतिसे महाभाव तक, सब कुछ ही श्रीकृष्णभक्तिरसमें स्थायीभाव कहलाते हैं; रतिको ही सर्वत्र 'स्थायीभाव' कहा जाता है। उसी स्थायीभावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी, -इन चारों भावोंके मिलनेपर ही रस उदित होता है। श्रीकृष्णभक्तिके सम्बन्धमें स्थायीभावमें इन सब सामग्रियोंके संयुक्त होनेसे 'श्रीकृष्णभक्तिरस' होता है। स्थायीभाव ही रसोद्दीपन-कार्यका मुख्य आधार है। उसके साथ विभावादि चार सामग्रियाँ संयुक्त होती हैं। इसलिये स्थायीभाव ही रसका 'मूल', विभाव ही रसका 'हेतु', अनुभाव ही रसका 'कार्य', सात्त्विकभाव भी रसका 'विशेषकार्य' एवं सभी सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव रसके 'सहायक' हैं। विभावके दो भाग हैं- 'आलम्बन' और 'उद्दीपन'। आलम्बन पुनः दो प्रकारसे विभक्त है, - 'विषय' और 'आश्रय'। श्रीकृष्णभक्तिरसमें भक्त ही 'आश्रय', श्रीकृष्ण ही 'विषय' एवं श्रीकृष्णके गुण ही 'उद्दीपन' हैं। अनुभाव तेरह प्रकारके हैं, -1) नृत्य, 2) विलुण्ठन (पृथ्वीपर गिरकर लोटने लगना), 3) गान 4) जोरसे रोना, 5) शरीरको मरोड़ना, 6) हुङ्कार, 7) जम्भाई, 8) दीर्घश्वास, 9) लोकपेक्षा-त्याग (लोग क्या कहेंगे- इसकी परवाह नहीं करना), 10) लार टपकाना, 11) अट्टहास (जोरोंसे हँसना), 12) उद्घूर्णा (चक्कर आना), 13) हिचकी। एक ही समयमें समस्त अनुभाव-लक्षण उदित नहीं होते। रसका कार्य जिस प्रकार होता रहता है, उसी प्रकार कोई-कोई लक्षण समय-समयपर उदित होते हैं। सात्त्विकभाव, -आठ प्रकारके एवं सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव-तैंतीस प्रकारके होते हैं। (मध्यलीला, 14/167 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥ 177-181 ॥ अनुभाष्य- 'स्नेह'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- 204 |