भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1649, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1649

उन्नीसवाँ अध्याय 19/174-178 ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ छल अथवा अपराध रहनेपर करोड़ों जन्मोंका साधन भी सम्पूर्ण रूपसे विफल :- भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा यदि मने हय। साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥ 175 ॥ अनुवाद-जब तक भोग-मोक्षादिकी इच्छाएँ मनमें रहती हैं, तब तक साधन करनेपर भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 175 ॥ अनुभाष्य-हृदयमें कर्मफल भोगकी वासना अथवा संसार-बन्धनसे मुक्तिकी वासना रहनेपर ऐसे फलकी आकाङ्क्षासे युक्त व्यक्ति चौंसठ प्रकारकी साधन-भक्तिका जितना भी अनुष्ठान क्यों न करे, ऐसा तथाकथित बिद्धा-भजन कर्ममात्रमें अथवा निष्फल-ज्ञान-चेष्टामें ही परिणत होगा, इसलिये उसके भाग्यमें साधनभक्तिका फल श्रीकृष्णप्रेम नहीं होगा ॥ 175 ॥ भुक्ति और मुक्तिकी कामनारूपी पिशाची-भक्तिका लोप करनेवाली :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/22)- भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ॥ 176 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भुक्ति की स्पृहा और मुक्तिकी स्पृहा, -ये दो पिशाची (राक्षसी) हैं; जब तक ये किसी व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान रहती हैं, तब तक उसके हृदयमें भक्तिसुखका प्राकट्य नहीं हो सकता ॥ 176 ॥ अनुभाष्य- यावत् हृदि (अन्तर्मनसि) भुक्तिमुक्तिस्पृहा (भोगमोक्षवासनारूपा) पिशाची (ग्रासकारिणी राक्षसी) वर्त्तते, तावत् अत्र (अन्तःकरणे) भक्तिसुखस्य (कृष्णप्रीतिविधायक-सेवानन्दस्य) कथं (केन प्रकारेण) अभ्युदयः (प्राकट्यं) भवेत्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ साधनभक्तिसे ही (2) भावभक्ति अथवा रति, रतिसे ही (3) प्रेमभक्ति :- साधनभक्ति हैते हय 'रति'र उदय। रति गाढ़ हैले तार 'प्रेम' नाम कय ॥ 177 ॥ अनुवाद-साधनभक्तिसे 'रति' उदित होती है। रतिके गाढ़ होनेपर उसीको 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति' - (भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी)- "कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥" श्रवण-कीर्त्तनादिकी सहायक इन्द्रियोंके द्वारा साधनीय भक्तिको ही 'साधन-भक्ति' कहते हैं; नित्यसिद्ध भावका हृदयमें प्रकट होना ही 'साधन' है। श्रद्धा, साधुसङ्ग (दीक्षा और श्रवण), भजन (निरपराध विष्णु-वैष्णवसेवा), निष्ठा, रुचि और आसक्ति तक 'साधनभक्ति' है। मध्यलीला 23/11-15 संख्या देखें। 'रति' - (भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी) - "व्यक्तं मसृणतेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्। मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्भवेदेषा रतिर्न हि ॥" हृदयमें स्थित मसृणताके (कोमलताके) प्रकाशित होनेपर उसको ही 'रतिका लक्षण' कहते हैं। मुक्तिकामी अथवा भोगकामी लोगोंमें ऐसी मसृणताके प्रकाशित होनेपर भी उसे 'रति' नहीं कहा जाता। प्रेम'-(भःरःसिः पूःविः चतुर्थ लहरी प्रथम संख्या)- "सम्यङ्मसृणित-स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥" अन्तःकरणके सम्पूर्ण रूपसे मसृण (द्रवित) होनेपर अत्यधिक ममतायुक्त भावके गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसे 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ प्रेमभक्तिकी गाढ़ताके तारतम्यका वैचित्र्य; चरम अवस्थामें 'महाभाव'- प्रेम वृद्धिक्रमे नाम-स्नेह, मान, प्रणय। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥ 178 ॥ । 203