भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1648

[ 19/168-174 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—यही 'शुद्धभक्ति' है, इससे ही 'प्रेम' उत्पन्न होता है। पञ्चरात्र और भागवतमें शुद्धभक्तिके यही लक्षण कहे गये हैं॥ 168-169 ॥ अनुभाष्य— 'शुद्धभक्तिके लक्षण'—पाञ्चरात्रिक और भागवत-सम्प्रदाय, दोनोंका मत एक ही अर्थका प्रतिपादक है॥ 169 ॥

समस्त पञ्चरात्रका मत :— भक्तिरसामृतसिन्धु (1/1/12)–उद्धृत श्रीनारदपञ्चरात्र वाक्य— सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥ 170 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 170 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—समस्त इन्द्रियोंके द्वारा हृषीकेशकी सेवाका नाम 'भक्ति' है। इस स्वरूप-लक्षणमयी सेवाके दो 'तटस्थ' लक्षण हैं—जैसे, यह शुद्धभक्ति समस्त उपाधियोंसे मुक्त होगी और केवल श्रीकृष्णपरायण होकर स्वयं निर्मला रहेगी॥ 170 ॥

अनुभाष्य— सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं (सकलभेदावरणपरिशून्यं कृष्णोतरान्या-भिलाषिता-वर्जितं) तत्परत्वेन (कृष्णसेवैक-तात्पर्येण आनुकूल्येन) निर्मलं (कर्मावरण-ज्ञान-विमोहनाद्युपाधिरूप-मल-निर्मुक्तं) हृषीकेण (सेवोन्मुखेन्द्रियद्वारा) हृषीकेशसेवनं (सर्वेन्द्रियाधिपस्य विष्णोरनुशीलनम् एव) भक्तिः उच्यते (कथ्यते)।

श्लोक-भावानुवाद—श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य अभिलाषाओंको त्यागकर केवल श्रीकृष्णकी ही सेवाके तात्पर्यसे अनुकूल भावसे कर्मावरण एवं ज्ञान-विमोहनादि उपाधिरूप मलसे निर्मुक्त सेवोन्मुखेन्द्रियोंके द्वारा सर्वेन्द्रियोंके अधिपति श्रीविष्णुके अनुशीलनको ही भक्ति कहते हैं॥ 170 ॥

अहैतुकी अथवा ऐकान्तिकी शुद्धभक्तिसे ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति :— श्रीमद्भागवत (3/29/11-14)में— मद्गुण श्रुतिमात्रेण मयि सर्वगुहाशये। मनोगतिरविच्छिन्ना यथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥ 171 ॥

लक्षणं भक्तियोगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम्। अहैतुक्यव्यवहिता या भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥ 172 ॥ सालोक्यसार्ष्टिसारूप्य-सामीप्यैकत्वमप्युत। दीयमानं न गृह्णन्ति बिना मत्सेवनं जनाः ॥ 173 ॥ स एव भक्तियोगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः। येनातिव्रज्य त्रिगुणं मद्भावायोपपद्यते ॥ 174 ॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 171-174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिस प्रकार गङ्गाका प्रवाह समुद्रकी ओर निरन्तर बहता है, उस प्रकार मेरे गुणोंके श्रवणमात्रसे सर्वान्तर्यामी मुझमें मनकी जो (तैलधारावत्) अविच्छिन्ना अवस्थाका उदय होता है, वही निर्गुण भक्तियोगका लक्षण है। पुरुषोत्तमस्वरूप मुझमें वह भक्ति अहैतुकी अर्थात् अकारण या स्वतःसिद्धा और अव्यवहिता अर्थात् बिना किसी व्यवधानके अथवा अन्य किसी फलकी आकाङ्क्षासे रहित है। (मेरे द्वारा) सालोक्य (वैकुण्ठवास), सार्ष्टि (ऐश्वर्यसम्पत्ति), सारूप्य (चतुर्भुजाकार), सामीप्य (निकटवास) और एकत्व (सायुज्य या अभेदगति) प्रदान करनेपर भी भक्त उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं, क्योंकि मेरी अप्राकृत सेवाके अतिरिक्त उनकी कोई भी अभिलाषा नहीं है। ऐसी भक्तिको ही 'आत्यन्तिक-भक्तियोग' कहा जाता है। उस भक्तियोगके द्वारा जीव गुणमयी मायाको पार करके मेरा विमल प्रेम प्राप्त करता है॥ 171-174 ॥

अनुभाष्य—शुद्धभक्तियोग पथकी कथा श्रवण करनेकी इच्छुक माता देवहूतिके प्रति भगवान् कपिलदेवकी उक्ति,— (श्रीमद्भागवतके श्लोक (3/29/11-13)के लिये आदिलीला 4/205-207 संख्या देखें।) स (उक्त लक्षणः) भक्तियोगाख्यः एव आत्यन्तिकः (अत्यन्ते सर्वान्ते भवः चरमकाष्ठाम् आपन्नः) उदाहृतः (कथितः) येन (आत्यन्तिक-भक्तियोगेन) [पुरुषः] त्रिगुणं (मायामयं संसारम्) अतिव्रज्य (अतिक्रम्य) मद्भावाय (मम साक्षात्काराय ब्रह्मभूतत्वाय) उपपद्यते (समर्थो भवति) ।

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