श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1647, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/167-169 ]
श्लोक-भावानुवाद-[पहले तटस्थ लक्षण कह रहे हैं-] अन्याभिलाषाओंसे शून्य (कृष्णभजन-सम्पादनकी विरोधी स्त्रीसङ्गादिरूपा दुर्नीतिमूलक वाञ्छासे विहीन), ज्ञान-कर्मादिके द्वारा व्यवधानरहित (यहाँ 'ज्ञान'का तात्पर्य निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धानसे है, भजनीय श्रीकृष्णसे नहीं, क्योंकि श्रीकृष्ण-विषयक ज्ञान अवश्य ही अपेक्षणीय है; 'कर्मों'का तात्पर्य स्मृति-शास्त्रोंमें वर्णित नित्य-नैमित्तिकादि कर्मोंसे है, भजनीयकी सेवादिसे नहीं, क्योंकि उसका अनुशीलन कर्त्तव्य है; 'आदि'-शब्दसे वैराग्य-योग-सांख्यके अभ्यासादिको समझना चाहिये); [बादमें उसके स्वरूपलक्षणको कह रहे हैं-] अनुकूल भावसे (अर्थात् भजनके उद्देश्यसे श्रीकृष्णके लिये रोचमाना प्रवृत्तिः, प्रतिकूल भावसे रोचमाना प्रवृत्तिको भजनका विरोधी जानना चाहिये; आनुकूल्येन तृतीया विभक्ति के द्वारा विशेषणरूपमें प्रयोग किया गया है, न कि उपलक्षण रूपसे; अनुकूल भाव ही भक्तिका विधान करता है, ऐसा समझना चाहिये) कृष्णानुशीलन (कृष्ण-शब्दसे यहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और उनके अन्य रूपों अर्थात् श्रीविष्णुतत्त्वको समझना चाहिये; कृष्णसे सम्बन्धित अथवा कृष्णके लिये अनुशीलन अर्थात् शैथिल्य त्यागकर कायिक-वाचिक-मानसिक चेष्टारूप प्रीतिविषयात्मक पुनः पुनः उन-उन कर्मोंमें प्रवृत्त होना) ही उत्तमा भक्ति है [इसके द्वारा वैधी और रागानुगा मार्गोंकी साधक एवं सिद्ध दशा, दोनोंका ही सुन्दररूपसे वैशिष्ट्य कहा गया है] ॥ 167 ॥
पहले दो पद-'तटस्थ' और बादके दो पद-शुद्धभक्तिके 'स्वरूप' लक्षण :- अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा छाड़ि' 'ज्ञान', 'कर्म'। आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्णानुशीलन ॥ 168 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 168 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुद्धभक्तिका लक्षण यह है- शुद्धभक्तिमें श्रीकृष्णकी सेवाके लिये अपनी (पारमार्थिक सिद्धिके पथमें) उन्नतिकी इच्छाके अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं रह सकती। श्रीकृष्णके बिना अन्य किसी सेव्य ब्रह्म-परमात्मादि-स्वरूपकी पूजा रह ही नहीं सकती एवं ज्ञान और कर्म अपने-अपने स्वरूपोंमें नहीं रह सकते। इन सबसे विमुक्त होकर जीवन-यात्रामें जो भक्तिके अनुकूल हैं, केवलमात्र वही ग्रहण करते हुए समस्त इन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णानुशीलन करनेका नाम ही 'शुद्धभक्ति' है ॥ 168 ॥
अनुभाष्य- 'अन्य वाञ्छा'- श्रीकृष्णकी सेवाके अतिरिक्त अन्य वासना; 'अन्यपूजा'-श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसीकी पूजा; 'कर्म'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे फल-भोगकी लालसाके उद्देश्यसे जिन सत्कर्मोंके अनुष्ठानकी व्यवस्था है; 'ज्ञान'-स्वरूप-विस्मृति होनेसे भोगरहित होने (मुक्तिके) उद्देश्यसे आत्माके उत्कर्षके लिये नित्य अभेद्या (जिन्हें कभी भी पृथक् नहीं किया जा सके, ऐसी) सन्धिनी और ह्लादिनी नामक दोनों शक्तियोंसे रहित केवल सम्वित्की चेष्टा; 'आनुकूल्ये कृष्णानुशीलन'- श्रीकृष्णकी प्रीतिके उद्देश्यसे श्रीकृष्णसेवा, श्रीकृष्णके अतिरिक्त मायाके अनुशीलनका त्याग करके अनुकूल भावसे श्रीकृष्णकी सेवा; 'सर्वेन्द्रिये'- समस्त इन्द्रियोंके द्वारा। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा मायाका ही अनुशीलन होता है; 'जड़ेन्द्रिय' अर्थात् वाणी, हाथ, पैर, मल और मूत्र त्यागकी इन्द्रियाँ एवं नेत्र, कान, नाक, जिह्वा और त्वचा तथा मन। जड़ेन्द्रियोंके द्वारा श्रीकृष्णके बदले मायाकी सेवा करनेपर वह सेवा अपने भोगके लिये ही हो जाती है, इसलिये साधन-भक्तिके अन्तर्गत चौंसठ प्रकारके भक्तिके अङ्गोंकी व्यवस्था की गयी है। इसी साधनभक्तिके बलसे बद्धजीव जड़़ीय भोगोंके चङ्गुलसे निकलकर अनर्थोंसे निवृत्त होकर अप्राकृत सेवाका अधिकारी बनता है ॥ 168 ॥
शुद्धभक्तिरूप 'अभिधेय' से ही श्रीकृष्णप्रेमरूप 'प्रयोजन', -यही सात्वत पञ्चरात्र और भागवतका मत :- एइ 'शुद्धभक्ति'-इहा हैते 'प्रेमा' हय। पञ्चरात्रे, भागवते एइ लक्षण कय ॥ 169 ॥
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