श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
उन्नीसवाँ अध्याय 19/174-178 ] श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 174 ॥ छल अथवा अपराध रहनेपर करोड़ों जन्मोंका साधन भी सम्पूर्ण रूपसे विफल :- भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा यदि मने हय। साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥ 175 ॥ अनुवाद-जब तक भोग-मोक्षादिकी इच्छाएँ मनमें रहती हैं, तब तक साधन करनेपर भी प्रेम उत्पन्न नहीं होता ॥ 175 ॥ अनुभाष्य-हृदयमें कर्मफल भोगकी वासना अथवा संसार-बन्धनसे मुक्तिकी वासना रहनेपर ऐसे फलकी आकाङ्क्षासे युक्त व्यक्ति चौंसठ प्रकारकी साधन-भक्तिका जितना भी अनुष्ठान क्यों न करे, ऐसा तथाकथित बिद्धा-भजन कर्ममात्रमें अथवा निष्फल-ज्ञान-चेष्टामें ही परिणत होगा, इसलिये उसके भाग्यमें साधनभक्तिका फल श्रीकृष्णप्रेम नहीं होगा ॥ 175 ॥ भुक्ति और मुक्तिकी कामनारूपी पिशाची-भक्तिका लोप करनेवाली :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/22)- भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्त्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ॥ 176 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भुक्ति की स्पृहा और मुक्तिकी स्पृहा, -ये दो पिशाची (राक्षसी) हैं; जब तक ये किसी व्यक्तिके हृदयमें विद्यमान रहती हैं, तब तक उसके हृदयमें भक्तिसुखका प्राकट्य नहीं हो सकता ॥ 176 ॥ अनुभाष्य- यावत् हृदि (अन्तर्मनसि) भुक्तिमुक्तिस्पृहा (भोगमोक्षवासनारूपा) पिशाची (ग्रासकारिणी राक्षसी) वर्त्तते, तावत् अत्र (अन्तःकरणे) भक्तिसुखस्य (कृष्णप्रीतिविधायक-सेवानन्दस्य) कथं (केन प्रकारेण) अभ्युदयः (प्राकट्यं) भवेत्? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 176 ॥ साधनभक्तिसे ही (2) भावभक्ति अथवा रति, रतिसे ही (3) प्रेमभक्ति :- साधनभक्ति हैते हय 'रति'र उदय। रति गाढ़ हैले तार 'प्रेम' नाम कय ॥ 177 ॥ अनुवाद-साधनभक्तिसे 'रति' उदित होती है। रतिके गाढ़ होनेपर उसीको 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ अनुभाष्य- 'साधनभक्ति' - (भःरःसिः पूःविः द्वितीय लहरी)- "कृतिसाध्या भवेत् साध्यभावा सा साधनाभिधा। नित्यसिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता॥" श्रवण-कीर्त्तनादिकी सहायक इन्द्रियोंके द्वारा साधनीय भक्तिको ही 'साधन-भक्ति' कहते हैं; नित्यसिद्ध भावका हृदयमें प्रकट होना ही 'साधन' है। श्रद्धा, साधुसङ्ग (दीक्षा और श्रवण), भजन (निरपराध विष्णु-वैष्णवसेवा), निष्ठा, रुचि और आसक्ति तक 'साधनभक्ति' है। मध्यलीला 23/11-15 संख्या देखें। 'रति' - (भःरःसिः पूःविः तृतीय लहरी) - "व्यक्तं मसृणतेवान्तर्लक्ष्यते रतिलक्षणम्। मुमुक्षुप्रभृतीनाञ्चेद्भवेदेषा रतिर्न हि ॥" हृदयमें स्थित मसृणताके (कोमलताके) प्रकाशित होनेपर उसको ही 'रतिका लक्षण' कहते हैं। मुक्तिकामी अथवा भोगकामी लोगोंमें ऐसी मसृणताके प्रकाशित होनेपर भी उसे 'रति' नहीं कहा जाता। प्रेम'-(भःरःसिः पूःविः चतुर्थ लहरी प्रथम संख्या)- "सम्यङ्मसृणित-स्वान्तो ममत्वातिशयाङ्कितः। भावः स एव सान्द्रात्मा बुधैः प्रेमा निगद्यते ॥" अन्तःकरणके सम्पूर्ण रूपसे मसृण (द्रवित) होनेपर अत्यधिक ममतायुक्त भावके गाढ़ता प्राप्त होनेपर पण्डितगण उसे 'प्रेम' कहते हैं ॥ 177 ॥ प्रेमभक्तिकी गाढ़ताके तारतम्यका वैचित्र्य; चरम अवस्थामें 'महाभाव'- प्रेम वृद्धिक्रमे नाम-स्नेह, मान, प्रणय। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥ 178 ॥ । 203
[ 19/177-12 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला उपमा :- यैछे बीज, इक्षु-रस, गुड़, खण्ड-सार। शर्करा, सिता-मिछरि, उत्तम-मिछरी आर ॥ 179 ॥ रतिके साथ विभावादि चार प्रकारके भावोंके मिलनसे रसका उदित होना :- एसब कृष्णभक्ति-रसे स्थायिभाव। स्थायिभावे मिले यदि विभाव, अनुभाव ॥ 180 ॥ सात्त्विक, व्यभिचारि-भावेर मिलने। कृष्णभक्ति-रस हय अमृत आस्वादने ॥ 181 ॥ अनुवाद-प्रेम वर्द्धित होनेपर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव, महाभाव नाम धारण करता है। जैसे गन्नेका बीज अङ्कुरित होकर गन्ना बनता है, फिर उस गन्नेका रस निकाला जाता है। तब उसको उबालनेपर वह गुड़ बनता है, गुड़से क्रमशः खाण्ड, चीनी, सफेद मिश्री और उत्तम मिश्री बनती है। इसी प्रकार रतिसे महाभाव तक सभी श्रीकृष्णभक्ति-रसमें स्थायी-भाव कहलाते हैं। स्थायी-भावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावके मिलनेसे श्रीकृष्णभक्ति-रस अमृतके समान आस्वादनीय हो जाता है ॥ 178-181 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भक्तिकी तीन अवस्थाएँ हैं- साधनावस्था, भावावस्था और प्रेमावस्था। श्रवण-कीर्तनादि नौ प्रकारके अङ्ग पहले साधनभक्तिमें ही क्रियान्वित होते हैं। श्रद्धापूर्वक श्रवण-कीर्तनादि करते-करते पूर्वोक्त सभी अनर्थ जितनी मात्रामें कम होते हैं, उतनी ही श्रद्धावृत्ति क्रमशः उच्चभाव धारण करते हुए निष्ठा, रुचि, आसक्ति, भाव या रति, -इन सब नामोंसे परिचित होती है। साधनभक्तिसे ही रतिका उदय होता है; श्रवण-कीर्तनादिके अनुशीलनसे ही वह रति जितनी गाढ़ होती जाती है, उतना ही 'प्रेमादि' नाम धारण करती है। (क्रमशः) प्रेम वर्धित होते हुए स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव और महाभाव तक उन्नत होता है। इसका उदाहरण यह है, गन्नेका रस-मानो रतिस्थानीय बीजस्वरूप है, वह जितना गाढ़ होता है, उससे पहले गुड़, बादमें खाण्ड, चीनी, सफेद-मिश्री और उत्तम मिश्री-इन सब अवस्थाओंको प्राप्त करता है। रतिसे महाभाव तक, सब कुछ ही श्रीकृष्णभक्तिरसमें स्थायीभाव कहलाते हैं; रतिको ही सर्वत्र 'स्थायीभाव' कहा जाता है। उसी स्थायीभावमें विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी, -इन चारों भावोंके मिलनेपर ही रस उदित होता है। श्रीकृष्णभक्तिके सम्बन्धमें स्थायीभावमें इन सब सामग्रियोंके संयुक्त होनेसे 'श्रीकृष्णभक्तिरस' होता है। स्थायीभाव ही रसोद्दीपन-कार्यका मुख्य आधार है। उसके साथ विभावादि चार सामग्रियाँ संयुक्त होती हैं। इसलिये स्थायीभाव ही रसका 'मूल', विभाव ही रसका 'हेतु', अनुभाव ही रसका 'कार्य', सात्त्विकभाव भी रसका 'विशेषकार्य' एवं सभी सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव रसके 'सहायक' हैं। विभावके दो भाग हैं- 'आलम्बन' और 'उद्दीपन'। आलम्बन पुनः दो प्रकारसे विभक्त है, - 'विषय' और 'आश्रय'। श्रीकृष्णभक्तिरसमें भक्त ही 'आश्रय', श्रीकृष्ण ही 'विषय' एवं श्रीकृष्णके गुण ही 'उद्दीपन' हैं। अनुभाव तेरह प्रकारके हैं, -1) नृत्य, 2) विलुण्ठन (पृथ्वीपर गिरकर लोटने लगना), 3) गान 4) जोरसे रोना, 5) शरीरको मरोड़ना, 6) हुङ्कार, 7) जम्भाई, 8) दीर्घश्वास, 9) लोकपेक्षा-त्याग (लोग क्या कहेंगे- इसकी परवाह नहीं करना), 10) लार टपकाना, 11) अट्टहास (जोरोंसे हँसना), 12) उद्घूर्णा (चक्कर आना), 13) हिचकी। एक ही समयमें समस्त अनुभाव-लक्षण उदित नहीं होते। रसका कार्य जिस प्रकार होता रहता है, उसी प्रकार कोई-कोई लक्षण समय-समयपर उदित होते हैं। सात्त्विकभाव, -आठ प्रकारके एवं सञ्चारी अथवा व्यभिचारी भाव-तैंतीस प्रकारके होते हैं। (मध्यलीला, 14/167 संख्याका अमृतप्रवाह भाष्य देखें) ॥ 177-181 ॥ अनुभाष्य- 'स्नेह'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- 204 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/178–184 ] “सान्द्रश्चित्द्रवं कुर्वन् प्रेमा ‘स्नेह’ इतीयते। क्षणिकस्यापि नेह स्याद्विश्लेषस्य सहिष्णुता ॥” “चित्तको द्रवीभूत करनेवाले भावके अत्यधिक गाढ़ होनेपर प्रेम ‘स्नेह’-संज्ञा प्राप्त करता है। उसमें एक क्षणका वियोग भी सहन नहीं होता।” ‘मान’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘प्रणय’—मध्यलीला 2/66 संख्या देखें। ‘राग’—(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)— “स्नेहः स रागो येन स्यात् सुखं दुःखमपि स्फुटम्। तत्सम्बन्ध-लवेऽप्यत्र प्रीतिः प्राणव्ययैरपि॥” “जिस स्नेहमें स्पष्टरूपसे दुःख ही ‘सुख’के रूपमें प्रतीत होता है, वही ‘राग’ है। इस सम्बन्धमात्रसे अपने प्राणोंको नष्ट करके भी श्रीकृष्णकी प्रीतिको उदित करानेकी प्रवृत्ति होती है।” ‘अनुराग’, ‘भाव’ और ‘महाभाव’—मध्यलीला 6/13 संख्याके अनुभाष्यमें ‘अधिरूढ़-महाभाव’का प्रसङ्ग देखें। ‘स्थायीभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “विभावैरनुभावैश्च सात्त्विकैर्व्यभिचारिभिः। स्वाद्यत्वं हृदि भक्तानामानीता श्रवणादिभिः। एषा कृष्णरतिः स्थायिभावो भक्तिरसो भवेत् ॥” “कृष्णरति-स्थायीभाव-स्वरूप है; श्रवणादिके द्वारा विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और व्यभिचारी भावोंके सम्मिलनसे, भक्तोंके हृदयमें आस्वादनीय भावसे लाये जानेपर वही ‘भक्तिरस’ होता है।” ‘विभाव’—(भःरःसिः दःविः प्रथम लहरी)— “तत्र ज्ञेया विभावास्तु रत्यास्वादनहेतवः। ते द्विधालम्बना एके तथैवोद्दीपना परे॥” “रतिके आस्वादन-हेतुसमूहको ‘विभाव’ कहते हैं। विभाव-आलम्बन और उद्दीपनके भेदसे दो प्रकारका होता है।” ‘अनुभाव’—(भःरःसिः दःविः द्वितीय लहरी)— “अनुभावास्तु चित्तस्था भावानामवबोधकाः। ते बहिर्विक्रिया-प्रायाः प्रोक्ता उद्भास्वराख्यया ॥” “जो उद्भास्वरयुक्त चित्तमें स्थित भावसमूहके प्रकाशक बाहरमें विकार जैसी चेष्टा प्रदर्शित करते हैं, वे ही ‘अनुभाव’ हैं।” ‘सात्त्विक’ और ‘व्यभिचारी’—मध्यलीला 3/162 संख्या और मध्यलीला 14/167 संख्या देखें॥ 178-181 ॥ उपमा :- यैछे दधि, सिता, घृत, मरीच, कर्पूर। मिलने ‘रसाला’ हय अमृत मधुर ॥ 182 ॥ भक्तके भेदसे पाँच प्रकारकी रति और रतिके भेदसे पाँच प्रकारके भक्तिरस :- भक्तभेदे रति-भेद पञ्च परकार। शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति आर ॥ 183 ॥ वात्सल्यरति, मधुररति,—ए पञ्च विभेद। रतिभेदे कृष्णभक्ति-रसे पञ्च भेद ॥ 184 ॥ अनुवाद—जैसे दही, मिश्री, घी, काली मिर्च तथा कर्पूरको मिलानेसे ‘रस’ अमृतकी भाँति मधुर होता है। उसी प्रकार भक्तोंके भेदसे रति भी शान्तरति, दास्यरति, सख्यरति, वात्सल्यरति और मधुररति—पाँच प्रकारकी होती है। रतिभेदसे श्रीकृष्णभक्तिरस भी पाँच प्रकारके होते हैं॥ 182-184 ॥ अनुभाष्य— ‘सिता’—मिश्री। ‘शान्तरति’—(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “मानसे निर्विकल्पत्वं शम इत्यभिधीयते” अर्थात् “मानसमें संशयादि रहित भावको ‘शम’ कहते हैं।” (भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)— “विहाय विषयोन्मुख्यं निजानन्द-स्थितिर्यतः। आत्मनः कथ्यते सोऽत्र स्वभावः शम इत्यसौ ॥ प्रायः शमप्रधानानां ममतागन्धवर्जिता। परमात्मतया कृष्णे जाता शान्तरतिर्मता ॥” अर्थात् “विषय वासनाको छोड़कर अपने आनन्दमें अवस्थित होनेको ‘शम’-स्वभाव कहते हैं। शम-प्रधान व्यक्तियोंकी परमात्म-ज्ञानसे श्रीकृष्णके प्रति ममता- गन्धहीन शान्तरति उत्पन्न होती है।” । 205
[ 19/182-185 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'दास्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “स्वस्माद्भवन्ति ये न्यूनास्तेऽनुग्राह्या हरेर्मताः। आराध्यत्वात्मिका तेषां रतिः प्रीतिरितीरिता। तत्रासक्तिकृदन्यत्र प्रीतिसंहारिणी ह्यसौ॥” अर्थात् “श्रीभगवान्से स्वयंको छोटा माननेका अभिमान रखनेवाली रतिसे युक्त होनेपर जीव हरिके अनुग्रहका पात्र बन जाता है। ‘भगवान् ही आराध्य हैं'—ऐसी प्रीति-नामक रति ही आराध्य भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रमें ‘आसक्ति' उत्पन्न करती है एवं भगवान्के अतिरिक्त मायिक वस्तुओंके प्रति प्रीतिका विनाश करती है।” 'सख्यरति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “ये स्युस्तुल्या मुकुन्दस्य ते सखायः सतां मताः। साम्याद्विश्रम्भरूपैषां रतिः सख्यमिहोच्यते॥ परिहासप्रहासादिकारिणीयमयन्त्रणा।” अर्थात् “विद्वान और सज्जनोंके मतमें जो मुकुन्दके समान होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले हैं, वे ही ‘सखा' हैं; श्रीकृष्णके साथ परस्पर समान भाव होनेके कारण सङ्कोचरहित विश्वासमयी रतिको ‘सख्यरति' कहते हैं। यह सख्यरति-परिहास और उच्च-हास्यादि करानेवाली होती है, इसे अयन्त्रणा अर्थात् बन्धनहीना रति कहते हैं।” 'वात्सल्य-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “गुरुवो ये हरेरस्य ते पूज्या इति विश्रुताः। अनुग्रहमयी तेषां रतिर्वात्सल्यमुच्यते। इदं लालनभव्याशीशिचबुकस्पर्शनादिकृत्॥ अर्थात् “गुरु होनेके अभिमानसे युक्त रतिवाले जीवगण ही भगवानके ‘पूज्य' हैं; उनकी अनुग्रहमयी रतिको ‘वात्सल्य रति' कहते हैं। इस वात्सल्य-रतिमें लालन, कल्याण साधन, आशीर्वाद और ठोड़ीको स्पर्श करने आदिके अनुष्ठान हैं।” 'मधुर-रति'-(भःरःसिः दःविः पञ्चम लहरी)- “मिथो हरेर्मृगाक्ष्याश्च सम्भोगस्यादि-कारणम्। मधुरापरपर्याया प्रियताख्योदिता रतिः। अस्यां कटाक्षभ्रूक्षेपप्रियवाणीस्मितादयः॥” अर्थात् “श्रीभगवान्के एवं मृगनयनियोंके परस्पर स्मरण-दर्शनादि आठ प्रकारके सम्भोगका मूल कारण- प्रियता अथवा मधुरा-रति है। मधुरा-रतिमें कटाक्ष, भ्रूक्षेप, प्रियवाक्य और मधुर-हास्यादि अनुष्ठान वर्तमान होते हैं॥”182-184॥ पाँच मुख्य भक्तिरस और सात गौणरस :- शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस नाम। कृष्णभक्ति-रसमध्ये ए पञ्च प्रधान॥185॥ अनुवाद-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रस, श्रीकृष्णभक्ति-रसमें ये पाँच प्रकारके रस मुख्य हैं॥185॥ अनुभाष्य-‘शान्तभक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः प्रथम लहरी)- “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः शमिनां स्वाद्यतां गतः। स्थायी शान्तिरतिर्धीरैः शान्तभक्तिरसः स्मृतः। प्रायः स्वसुखजातीयं सुखं स्यादत्र योगिनाम्। किन्त्वात्मसौख्यमघनं घनं त्वीशमयं सुखम्॥ तत्रापीशस्वरूपानुभवस्यैवारुहेतुता। दासादिवन्मनोज्ञत्वलीलादेर्न तथा मता॥” अर्थात् “शान्तरतिरूपी स्थायीभाव विचाराधीन विभावादिके साथ मिलकर जब शान्तभक्तोंके द्वारा आस्वादनीय होते हैं अर्थात् तद्रूपता प्राप्त करते हैं, तब ‘शान्तभक्तिरस' होता है। शान्तरसमें योगियोंके सर्वमूल- स्वरूप निर्विशेष-ब्रह्मानन्दजातीय सुखकी प्राप्ति होती है, किन्तु यह आत्मानन्द-‘अघन' अर्थात् बहुत कम होता है; और सच्चिदानन्द भगवद्विग्रह-स्फूर्तिमें प्रचुर सेवा-सुख ही ‘गाढ़' होता है। शान्तभक्तोंका साक्षात्कारके लिये सुख अधिक तो होता है, किन्तु दास्य आदिकी भाँति भगवान्की मनोहर लीलाओंमें उनकी वैसी रुचि नहीं होती।” 'दास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः द्वितीय लहरी)- “आत्मोचितैर्विभावाद्यैः प्रीतिरास्वाद्यनीयताम्। नीता चेतसि भक्तानां प्रीतिभक्तिरसो मतः॥ अनुग्राह्यस्य दासत्वाल्लाल्यत्वाद्द्वयं द्विधा। भिद्यते सम्भ्रमप्रीतो गौरवप्रीत इत्यादि॥” 206 ।
उन्नीसवाँ अध्याय 19/185-188 ] "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तोंके चित्तमें प्रीतरति आकर आस्वादनीयताको प्राप्त करनेपर वही 'प्रीति' अथवा 'दास्य-भक्ति-रस' होता है। अनुग्रह-योग्य दासोंके दासत्व और लाल्यत्वके भेदसे दास्य रसमें सम्भ्रम-दास्य और गौरवदास्य, - दो प्रकारकी प्रीति लक्षित होती है।" 'सख्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "स्थायिभावो विभावाद्यैः सख्यमात्मोचितैरिह। नीतश्चित्ते सतां पुष्टिं रसप्रेयानूदीर्यते॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा स्थायीभावमें भक्तोंके चित्तमें सख्यरतिके पुष्ट होनेपर 'प्रेयरस' अथवा 'सख्यभक्तिरस' होता है।" 'वात्सल्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः चतुर्थ लहरी)- "विभावाद्यैस्तु वात्सल्यं स्थायी पुष्टिमुपागतः। एष वत्सल-नामात्र प्रोक्तो भक्तिरसो बुधैः॥" "स्थायीभाव भक्तके चित्तमें विभावादिके द्वारा वात्सल्परतिके पुष्ट होनेपर भक्त-पण्डितगण उसे 'वात्सल्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'मधुर भक्तिरस'-(भःरःसिः पःविः पञ्चम लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः पुष्टिं नीता सतां हृदि। मधुराख्यो भवेद्भक्तिरसोऽसौ मधुरा रतिः॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा सद्भक्तोंके हृदयमें मधुर-रति पुष्ट होनेपर 'मधुराख्य भक्तिरस' कहकर कीर्तित होती है॥" 185॥ भक्तिरसामृतसिन्धु (2/5/116) :- हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः करुणो रौद्र इत्यपि। भयानकः स वीभत्स इति गौणश्च सप्तधा ॥ 186 ॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 186॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'मुख्यरस' शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-पाँच प्रकारके हैं। हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ अनुभाष्य- तथा हास्यः, अद्भुतः, वीरः, करुणः, रौद्रः, भयानकः, वीभत्सः-इति सप्तधा गौणरसश्च अपि। श्लोक-भावानुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक और वीभत्स-ये सात प्रकारके गौण रस हैं॥ 186॥ हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स, भय। पञ्चविध-भक्ते गौण सप्तरस हय ॥ 187 ॥ अनुवाद-हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, वीभत्स तथा भयानक-ये सातों गौणरस पाँचों प्रकारके भक्तोंमें ही रहते हैं॥ 187॥ पाँच मुख्यरस-स्थायी; सात गौणरस- आगन्तुक :- पञ्चरस 'स्थायी', व्यापी' रहे भक्त-मने। सप्त गौण 'आगन्तुक' पाइये कारणे ॥ 188 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 188॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पहले कहे गये पाँच मुख्यरस स्थायीभावसे ही भक्तके हृदयमें रहते हैं। हास्य- अद्भुतादि गौणरस 'कारण' उपस्थित होनेपर भक्तके हृदयमें आगन्तुकके रूपमें उदित होकर मुख्यरसको पुष्ट करके निवृत्त होते हैं॥ 188॥ अनुभाष्य- 'हास्य-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः प्रथम लहरी)- "वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं हासरतिर्गता। हासभक्तिरसो नाम बुधैरेष निगद्यते॥" "विचाराधीन विभावादिके द्वारा हास्यरतिके पुष्ट होनेपर ही पण्डितगण उसे 'हास्य-भक्तिरस' कहते हैं।" 'अद्भुत-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः द्वितीय लहरी)- "आत्मोचितैर्विभावाद्यैः स्वाद्यत्वं भक्तचेतसि। सा विस्मयरतिर्नीताऽद्भुतभक्तिरसो भवेत्॥" "आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें विस्मयरति' आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'अद्भुत-भक्तिरस' होता है।" 'वीर-भक्तिरस'-(भःरःसिः उःविः तृतीय लहरी)- । 207
[ 19/187-191 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला [ बायाँ स्तम्भ ] “सैवोत्साहरतिः स्थायी विभावाद्यैर्निजोचितैः। आनीयमाना स्वाद्यत्वं वीरभक्तिरसो भवेत्। युद्धदानदयाधर्मैश्चतुर्धा वीर उच्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'उत्साह-रति'के आस्वादनीयरूपमें आनेपर 'वीरभक्तिरस' होता है। 'युद्ध', 'दान', 'दया', और 'धर्म',—इन चार प्रकारके कार्योंमें चार प्रकारके 'वीर' कहे जाते हैं।” 'करुण-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः चतुर्थ लहरी)— “आत्मोचितैर्विभावाद्यैर्नीता पुष्टिं सतां हृदि। भवेच्छोकरतिर्भक्ति-रसो हि करुणाभिधः॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें 'शोक-रति'के पुष्ट होनेपर उसे 'करुणभक्तिरस' कहते हैं।” 'रौद्र-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः पञ्चम लहरी)— “नीता क्रोधरतिः पुष्टिं विभावाद्यैर्निजोचितैः। हृदि भक्तजनस्यासौ रौद्रभक्तिरसो भवेत्॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके हृदयमें 'क्रोधरति'के पुष्ट होनेपर 'रौद्र-भक्तिरस' होता है।” 'भयानक-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः षष्ठम लहरी)— “वक्ष्यमाणैर्विभावाद्यैः पुष्टिं भयरतिर्गता। भयानकाभिधो भक्तिरसो धीरैरुदीर्यते॥” “विचाराधीन विभावादिके द्वारा 'भयरति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगणोंके द्वारा वह 'भयानक-भक्तिरस' कहा जाता है।” 'वीभत्स-भक्तिरस'—(भःरःसिः उःविः सप्तम लहरी)— “पुष्टिं निजविभावाद्यैर्जुगुप्सा रतिरागता। असौ भक्तिरसो धीरैर्वीभत्साख्य इतीर्यते॥” “आत्मोचित विभावादिके द्वारा भक्तके चित्तमें जुगुप्सा अथवा 'घृणा-रति'के पुष्ट होनेपर पण्डितगण उसे 'वीभत्स-भक्तिरस' कहते हैं।” 'पञ्चविध भक्त'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन स्थायी पाँच प्रकारके रसोंके भक्तोंमें हास्यादि सात गौणरस 'कारण'को देखकर प्रकाशित होते हैं॥187-188॥ [ दायाँ स्तम्भ ] शान्त और दास्य-रसके भक्तोंके नाम :— शान्तभक्त—नवयोगेन्द्र, सनकादि आर। दास्यभाव-भक्त—सर्वत्र सेवक अपार॥189॥ अनुवाद—नवयोगेन्द्र और सनकादि चार कुमार शान्तभावके भक्त हैं। दास्यभावके भक्तोंके असंख्य उदाहरण हैं, वे भगवद्-सेवक तो सर्वत्र विद्यमान हैं॥189॥ अनुभाष्य—'नवयोगेन्द्र'—(भाः 5/4/11 और 11/2/21)—(1) कवि, (2) हवि, (3) अन्तरिक्ष, (4) प्रबुद्ध, (5) पिप्पलायन, (6) आविर्होत्र, (7) द्रविड़ (द्रुमिल), (8) चमस और (9) करभाजन। 'सनकादि'—(1) सनक, (2) सनन्दन, (3) सनत्कुमार, (4) सनातन। 'दास्यभाव-भक्त'—(1) गोकुलमें रहनेवाले रक्तक- चित्रक-पत्रकादि दासगण, (2) द्वारकापुरीमें रहनेवाले दारुकादि दासगण, 3) वैकुण्ठमें स्थित दासगण, 4) हनुमानादि लीला-दासगण॥189॥ सख्य और वात्सल्य-रसके भक्तोंके नाम :— सख्य-भक्त—श्रीदामादि, पुरे भीमार्जुन। वात्सल्य-भक्त—माता-पिता, यत गुरुजन॥190॥ अनुवाद—सख्यभक्तोंके उदाहरण ब्रजमें श्रीदामादि और द्वारकापुरीमें भीम तथा अर्जुनादि हैं। वात्सल्य- भक्तके उदाहरण माता-पिता [ब्रजमें यशोदा-नन्द और द्वारकामें देवकी-वसुदेव] तथा जितने [वात्सल्यभावमें आयुमें बड़े] गुरुजन हैं॥190॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'व्रजे'—ब्रजमें श्रीदामादि, 'पुरे'— द्वारका-लीलामें भीम-अर्जुन॥190॥ मधुर-रसके भक्तगण—द्वारकाकी कान्ताएँ और ब्रजकी कान्ताएँ :— मधुर-रसे भक्तमुख्य—व्रजे गोपीगण। महिषीगण, लक्ष्मीगण, असंख्य गणन॥191॥ 208 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/191-197 ] अनुवाद-मधुर-रसके भक्तोंमें मुख्य व्रजमें गोपियाँ, द्वारकामें महिषियाँ, वैकुण्ठमें लक्ष्मियाँ हैं। मधुर-रसमें भी असंख्य भक्त हैं॥191॥ दो प्रकारकी रति-1) ऐश्वर्यमिश्रा और 2) केवला :- पुनः कृष्णरति हय दुइत प्रकार। ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा, केवला-भेद आर॥ 192॥ गोकुलमें 'केवला' रति एवं वैकुण्ठ, मथुरा और द्वारकामें 'ऐश्वर्यप्रधान' रति :- गोकुले 'केवला' रति-ऐश्वर्यज्ञानहीन। पुरीद्वये, वैकुण्ठाद्ये-'ऐश्वर्य' प्रवीण॥ 193॥ ऐश्वर्यप्रधान रतिमें राग-सङ्कुचित, केवलामें ऐश्वर्य-ज्ञानका अभाव :- ऐश्वर्यज्ञान-प्राधान्ये सङ्कुचित प्रीति। देखिले ना माने ऐश्वर्य-केवलार रीति॥ 194॥ अनुवाद-ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवलाके भेदसे पुनः श्रीकृष्णरति भी दो प्रकारकी होती है। गोकुलमें 'केवला' रति है, यह ऐश्वर्यज्ञानसे रहित होती है। मथुरापुरी और द्वारकापुरी तथा वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्य-प्रधान रति होती है। ऐश्वर्यज्ञानकी प्रधानता होनेपर प्रीति सङ्कुचित हो जाती है। केवला-रतिकी यह रीति है कि वह ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानती नहीं है॥192-194॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णरति दो प्रकारकी है- ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा और केवला अथवा ऐश्वर्यज्ञानहीना। दोनों पुरियों अर्थात् द्वारका और मथुरामें एवं वैकुण्ठादिमें ऐश्वर्यज्ञानमिश्रा भक्ति है। इसलिये वहाँ प्रेम सङ्कुचित होता है। किन्तु गोकुलमें केवला-रतिमें गोप-गोपियाँ श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको देखनेपर भी उसे मानना नहीं चाहते॥192-194॥ व्रजमें शान्त और दास्यमें कहींपर ऐश्वर्यज्ञान रहनेपर भी सख्य, वात्सल्य और मधुररसमें ऐश्वर्यज्ञानका अभाव :- शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य काँहा उद्दीपन। सख्ये, वात्सल्ये, मधुर-रसे सङ्कोचन॥ 195॥ अनुवाद-व्रजमें शान्त और दास्य रसमें कहीं-कहींपर ऐश्वर्यका उद्दीपन होता है, किन्तु सख्य, वात्सल्य तथा मधुर रसमें ऐश्वर्य सम्पूर्ण रूपमें सङ्कुचित है॥195॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'काँहा'-किसी विशेष स्थान पर॥195॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य और गौरव-सख्यमें स्थान-स्थानपर ऐश्वर्यकी प्रधानता लक्षित होती है; विश्रम्भ-सख्यमें, वात्सल्यमें और मधुर-रसमें ऐश्वर्यकी प्रधानताका भाव सङ्कुचित होता है॥195॥ ऐश्वर्यमिश्रित रतिमें स्वयंको 'दीन' और श्रीकृष्णको प्रभु मानना- (1) वात्सल्य-रतिमें वसुदेव और देवकी :- वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण वन्दिल। ऐश्वर्यज्ञाने दुँहार मने भय हैल॥ 196॥ अनुवाद-जब श्रीकृष्णने वसुदेव और देवकीके चरणोंकी वन्दना की, तब श्रीकृष्णके ऐश्वर्यज्ञानके कारण दोनोंके मनमें भय उत्पन्न हो गया॥196॥ श्रीमद्भागवत (10/44/51) में :- देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ। कृतसंवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ॥ 197॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 197॥ अमृतप्रवाह भाष्य-देवकी और वसुदेव, बलदेव और श्रीकृष्णको 'जगदीश्वर' जानकर शङ्कासे युक्त होकर उन्हें आलिङ्गन नहीं कर पाये॥197॥ अनुभाष्य-कंस और उसके द्वारा नियुक्त मल्लोंका वध करके श्रीकृष्णने माता देवकी और पिता वसुदेवके बन्धनको खोलकर उन्हें प्रणाम किया, देवकी और वसुदेवमें यशोदा और नन्दकी भाँति भाव नहीं होनेके कारण ऐश्वर्यभावकी प्रबलता लक्षित,- देवकी वसुदेवश्च (मातापितरौ) पुत्रौ (रामकृष्णौ) जगदीश्वरौ इति विज्ञाय (ज्ञात्वा) शङ्कितौ (भीतौ सन्तौ) कृतसंवन्दनौ (कृतप्रणामौ) अपि तौ न सस्वजाते (आलिङ्गितवन्तौ किन्तु प्रणतौ बद्धाञ्जली स्तुवन्तौ स्थितौ)। । 209
[ 19/197-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-जब बलदेव और कृष्णने देवकी और वसुदेवके चरण स्पर्श करके उनकी वन्दना की, तब उन दोनों पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर कुछ भयभीत होकर वे उनको आलिङ्गन नहीं कर पाये, अपितु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे ॥ 197 ॥ (2) सख्य-रतिमें अर्जुन :- कृष्णेर विश्वरूप देखि' अर्जुनेर हैल भय। सख्यभावे धार्थ्य क्षमापय करिया विनय ॥ 198 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णके विश्वरूपको देखकर अर्जुन भयभीत हो गये और अपने द्वारा पहले सख्यभावमें की गयी धृष्टताके लिये श्रीकृष्णसे दीनतापूर्वक क्षमा-याचना की ॥ 198 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता [11/41 (तीन चरण)- 42 (अन्तिम चरण)] :- सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ 199 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सखा मानकर आपकी महिमाको नहीं जाननेके कारण मैंने हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, - इस प्रकारके शब्दोंके उपयोगके द्वारा बलपूर्वक जो-जो आपको कहा है, हे अप्रमेय-स्वरूप [अचिन्त्य-प्रभाव-स्वरूप] ! मैं आपसे उसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ॥ 199 ॥ अनुभाष्य- तव इदं [विराड्रूपं] महिमानं (महत्त्वम्) अजानता (अनुन्भवता) मया [प्रमादात् प्रणयेन् वा अपि] सखा इति मत्वा [त्वां प्रति] प्रसभं (हठात्) हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, इति यत् उक्तं (कथितं) [यत् च असत्कृतः असि] अहम् अप्रमेयम् (अचिन्त्यप्रभावं) तत् (सर्ववचन-रूपम् असत्कार-रूपं अपराधजातं वा) क्षामये (क्षमां कारयामि, त्वं क्षमस्व इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ (3) मधुर रतिमें रुक्मिणी :- कृष्ण यदि रुक्मिणीरे कैला परिहास। 'कृष्ण छाड़िबेन'-जानि' रुक्मिणीर हैल त्रास ॥ 200 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णने जब रुक्मिणीके साथ परिहास किया, तब 'कृष्ण मुझे छोड़ देंगे'-ऐसा सोचकर रुक्मिणीके मनमें भय हो गया ॥ 200 ॥ प्रमाण वचन :- श्रीमद्भागवत (10/60/24)में- तस्याः सुदुःखभय-शोक-विनष्ट-बुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात। देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन् रम्भेव वातविहता प्रविकीय्यं केशान् ॥ 201 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 201 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वारकामें रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णके परिहास करनेपर दुःख, भय और शोकके कारण रुक्मिणीकी विचारशक्ति लुप्त हो गयी, वियोगकी सम्भावनासे वे इतनी दुबली हो गयीं कि उनके हाथसे कङ्कन तक खिसक गया, हाथका चँवर भी गिर पड़ा, केश बिखर गये और आँधीसे गिरे केलेके वृक्षकी भाँति उनकी देह सहसा विकल होकर मोहको प्राप्त हो गयी ॥ 201 ॥ अनुभाष्य-एक बार अपने घरमें रुक्मिणीने अपने हाथोंसे श्रीकृष्णकी सेवा आरम्भ की। तब श्रीकृष्णने उनके अनुरागकी परीक्षा करनेकी इच्छासे परिहास करते हुए स्वयंको दीन, निष्किञ्चन और उदासीन कहकर रुक्मिणीके प्रणयके सम्पूर्ण अयोग्य-पात्रके रूपमें वर्णन करके उन्हें उनका सङ्ग छोड़कर अन्यत्र प्रणय स्थापित करनेके लिये कहा। इसे सुनकर कृष्णैकप्राणा रुक्मिणीकी तात्कालिक अवस्थाका वर्णन,- सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धेः (सुदुःखम् अत्यन्तदुःखम् अप्रिय- श्रवणात्, भयं त्यागशङ्कया, शोकः अनुतापः तैः विनष्टा बुद्धिः यस्याः रुक्मिण्याः तस्याः) श्लथद्वलयतः (श्लथन्ति पतन्ति 210
उन्नीसवाँ अध्याय 19/201-204 ]
वलयानि यस्मात् तस्मात्) हस्तात् व्यजनं (वीजनयन्त्रं) पपात। विक्लवधियः (विक्ल्वा अवशा धीः यस्याः तस्याः) देहः च सहसा एव मुह्यन् केशान् प्रविकीर्य (इतस्ततः विक्षिप्य) वातविहता (वायुताड़िता) रम्भा (कदलीवृक्षः) इव पपात। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ ब्रजमें ऐश्वर्यहीन केवला-रतिसे श्रीकृष्णको अपने वशयोग्य समझना :- ‘केवला’र शुद्धप्रेम ‘ऐश्वर्य’ ना जाने। ऐश्वर्य देखिले निजसम्बन्ध ना माने॥ 202 ॥ अनुवाद-‘केवला’ रतिवालोंका शुद्धप्रेम श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको नहीं मानता। श्रीकृष्णका ऐश्वर्य देखनेपर भी केवला-रति भक्त उस ऐश्वर्यसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं॥ 202 ॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्य-प्रधान भक्त केवला-रतिके शुद्ध प्रेमके माहात्म्यको नहीं समझ सकते। भगवान्के ऐश्वर्यको देखनेपर भी केवला-रतिपरायण भक्त उससे अपना सम्बन्ध स्वीकार नहीं करते हैं॥ 202 ॥ (1) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको यशोदाके द्वारा अपना पुत्र समझना :- श्रीमद्भागवत (10/8/45)में- त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम्॥ 203 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 203 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना ‘पुत्र’ समझती हैं॥ 203 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके मुखमें ऐश्वर्यमय विश्वरूपको देखकर यशोदामें तत्त्वज्ञानके कारण सम्भ्रम-बुद्धि आते ही पुनः श्रीकृष्णकी इच्छासे उनके सहज ममता-प्रबल हृदयमें श्रीकृष्णस्नेह गाढ़ होकर वर्धित हो गया- त्रया (कर्मोपासनामयैः ऋग्यजुःसाम-वेदैः) [इन्द्रादिरूपेण इति], उपनिषद्भिः (वेदोत्तर-ज्ञानकाण्डात्मक-श्रुतिभिः) ['ब्रह्म' इति], सांख्यैः ['पुरुषः' इति], योगैः ['परमात्मा' इति], सात्वतैः (पञ्चरात्रागमैः) ['भगवान्' इति] उपगीयमान-माहात्म्यम् (उपगीयमानम् ईड्यमानं माहात्म्यं यस्य तं) हरिं सा (केवलरतिविशिष्टा यशोदा) आत्मजं (तनयम्) अमन्यत। श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंकी उपासना- प्रधान कर्मकाण्ड उपासनामय ऋक्-यजु-साम-तीनों वेद (यज्ञपुरुषरूपमें), ब्रह्म-विषयक वेदोंसे श्रेष्ठ ज्ञानकाण्डात्मक श्रुतियाँ (ब्रह्मरूपमें), सांख्य (पुरुषरूपमें), योग (परमात्मारूपमें), सात्वत अर्थात् नारद-पञ्चरात्रादि भक्तियोगशास्त्र (भगवान्रूपमें) जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन परमपुरुष श्रीहरिको केवलारतियुक्त यशोदाने अपना पुत्र ही माना॥ 203 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/14)में :- तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिङ्गमधोक्षजम्। गोपीकोलूलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा॥ 204 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण मरणशील मनुष्यकी भाँति व्यक्त, उस अव्यक्त और इन्द्रियोंसे अतीत अधोक्षज-वस्तुको (भगवान्को) यशोदाने अपना गर्भजात पुत्र मानकर साधारण बालककी भाँति रस्सीके द्वारा ओखलीसे बाँध दिया॥ 204 ॥ अनुभाष्य-माताके स्नेहका दर्शन करानेके लिये लीलामय श्रीकृष्णने यशोदा-भवनमें ही दहीकी मटकीको फोड़कर चोरी करके माखन खाना आरम्भ किया, जिसे देखकर क्रोधित यशोदाके व्यवहारका वर्णन- अव्यक्तं (जड़ेन्द्रियाद्यविषयम्) अधोक्षजम् (अधःकृतम् अक्षजम् इन्द्रियज-ज्ञानं येन तं स्वयं भगवन्तं) मर्त्यलिङ्गं (जीवानुकम्पया स्वीकृत-नरतनुम्) आत्मजं (पुत्रं) मत्वा गोपिका (यशोदा) प्राकृतं बालकं [माता] यथा, (तथा) दाम्ना (रज्जुना) उलुखले (उदूखले) बबन्ध (बन्धनार्थं यत्नवती आसीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान जिन तक पहुँच नहीं सकता, उन्हें
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[ 19/204-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अधोक्षज कहते हैं। उन्होंने जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही नरदेहको स्वीकार किया ॥ 204 ॥ (2) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको श्रीदामादिके द्वारा सखा-मानना :- श्रीमद्भागवत (10/18/24)में- उवाह भगवान् कृष्णः श्रीदामानं पराजितः। वृषभं भद्रसेनश्च प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ 205 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 205 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीकृष्णने पराजित होकर श्रीदामको कन्धेपर चढ़ाया; भद्रसेनने वृषभको उठाया तथा प्रलम्बने रोहिणीपुत्र श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ अनुभाष्य-ब्रजवनमें गोचारणके समय श्रीराम-कृष्णको चुरानेके लिये कपट-वेशी गोपरूपी प्रलम्बासुरको आते देखकर श्रीकृष्ण उसे मोहित करके गोचारण करते-करते श्रीकृष्णपक्षीय और श्रीरामपक्षीय सखाओंको परस्पर स्पर्द्धा क्रीड़ामें मत्त कराके भाण्डीरवनमें पहुँचे। तब श्रीकृष्णपक्षीय सखाओंकी हारके कारण अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार उनकी श्रीरामपक्षीय सखाओंको उठाकर ले जानेकी चेष्टाका वर्णन, - भगवान् कृष्णः पराजितः (सन्) श्रीदामानं, भद्रसेनः वृषभं, प्रलम्बः (गोपबालकवेषी कपटी असुरः) रोहिणीसुतं (भावि-तन्मृत्यूरुपं बलदेवम्) उवाह। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। प्रलम्बने अपने भावी-मृत्यूरुप श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ (3) श्रीराधाके द्वारा स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको अपने वशीभूत कान्त समझना :- श्रीमद्भागवत (10/30/37-39)में- सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठां सर्वयोषिताम्। हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः॥ 206 ॥ ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्। न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥ 207 ॥ एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धमारुह्यतामिति। ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत ॥ 208 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206-208 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- "काम ही जिन गोपियोंका वनमें आनेका कारण है, उन गोपियोंका परित्याग करके ये प्रिय कृष्ण मेरा भजन कर रहे हैं" - ऐसे अहङ्कारके कारण श्रीराधिकाने (स्वयंको सभी गोपियोंसे श्रेष्ठा जानकर अन्तमें) वनमें जाकर श्रीकृष्णसे कहा, - "हे कृष्ण, मैं और चल नहीं पा रही हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, मुझे वहाँ ले चलो।" श्रीराधिकाके ऐसे कहनेपर श्रीकृष्णने कहा, - "मेरे कन्धेपर चढ़ो।" इतना कहकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर वे श्रीकृष्णवधु श्रीराधिका अनुताप करने लगीं ॥ 206-208 ॥ अनुभाष्य-रासलीलासे केवलमात्र श्रीमती राधिकाको लेकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर श्रीमतीको अहङ्कार होनेपर उनकी गर्वोक्ति, - असौ प्रियः (कृष्णः) कामयाना (कामो यानम् आगमन- साधनं यासां ताः) गोपीः (सर्वाः) हित्वा (परित्यज्य) मां (राधिकां) भजते इति दृप्ता (गर्विता सती) सा (राधिका) आत्मानं (स्वां) सर्वयोषितां (सकलगोपीनां मध्ये) वरिष्ठां (श्रेष्ठां) मेने; ततः (एवमभिमानान्तरं) वनोद्देशं (कानन-प्रदेशविशेषं) गत्वा “अहं चलितुं न पारये (शक्नोमि, अतः) यत्र (स्थाने) ते (तव) गन्तुं मनः (अभिलाषः), [तत्र हे केशव,] मां नय (वह)", इति सा केशवम् अब्रवीत्। एवम् उक्तः [सन् सः श्रीकृष्णः तां] प्रियां (राधिकां) [मम] स्कन्धम् आरुह्यताम् इति आह; ततः [लीला-विलासी] कृष्णः च अन्तर्दधे (अन्तर्हितः आसीत्); [तद्दृष्ट्वा] सा वधू (राधिका) च अन्वतप्यत (अनुतापवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 206-208 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/16)में- पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः। गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 209 ॥ 212 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/209-212 ]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो,—तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 209 ॥
अनुभाष्य—गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते श्रीकृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेपर, श्रीकृष्णके उद्देश्यसे विरहमें कातर गोपियोंकी विलाप-गीति,—
हे अच्युत, गतिविदः (अस्मदागमनं जानतः, गीतगतीर्वा जानतः, यद्वा गतिविदः वयं) तव उद्गीतमोहिताः (उद्गीतेन् उच्चैर्गीतेन् मोहिताः वयं गोप्यः) पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् (पतीन् सुतान् अन्वयान् तत्सम्बन्धिनः पुत्रान् भ्रातॄन् बान्धवांश्च सर्वान्) अतिविलङ्घ्य (अनादृत्य) ते (तव) अन्ति (समीपम्) आगताः; हे कितव, (वञ्चनशील शठ,) निशि एवम्भूताः योषितः (स्वयमागताः) [त्वां ऋते] कः त्यजेत् [न कोऽपीत्यर्थः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥
शान्तरसके गुण और स्वरूप :- शान्तरसे—'स्वरूपबुद्धये कृष्णैकनिष्ठता'। “शमो मन्निष्ठता बुद्धेः” इति श्रीमुख-गाथा ॥ 210 ॥
अनुवाद—शान्तरसमें अपने स्वरूपमें स्थित होकर बुद्धिके द्वारा श्रीकृष्णमें निष्ठा होती है। श्रीकृष्णने अपने श्रीमुखसे स्वयं उद्धवजीसे कहा है,—“मुझमें ही बुद्धिका एकाग्र होना 'शम' है॥” 210 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ बुद्धिसे 'शम'-धर्म उदित होता है; शम-धर्मसे 'शान्त'-रस होता है, इसलिये शान्तरसमें श्रीकृष्ण ही एकमात्र परमार्थ स्वरूप हैं। समस्त विश्व ही (श्रीकृष्णपर आश्रित होनेपर भी श्रीकृष्ण-स्वरूपसे पृथक् अन्य) 'इतर' वस्तु है—यही निष्ठा लक्षित होती है॥ 210 ॥
अनुभाष्य—शान्तरसमें जड़़ीय-भोगबुद्धिके दूर होने पर जीवकी स्वरूपबुद्धि उदित होती है। उनका नित्य स्वरूप ही श्रीकृष्णमें नित्य एकनिष्ठता-धर्मसे युक्त है। श्रीभगवान्ने उद्धवको अपने मुखसे कहा है कि 'शम'-शब्दका अर्थ 'कृष्णैकनिष्ठता' है॥ 210 ॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/47)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति श्रीभगवद्वचः। तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां शान्तरतिं बिना॥ 211 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शमगुण'—इस भगवद्-वाक्यसे समझना होगा कि शान्तरतिके बिना भगवन्निष्ठा-अत्यन्त दुर्लभ है॥ 211 ॥
अनुभाष्य— बुद्धेः मन्निष्ठता (कृष्णैकनिष्ठता) 'शमः' इति श्रीभगवद्वचः (उद्धवं प्रति श्रीकृष्णवाक्यम्); एतां शान्तरतिं बिना बुद्धेः तन्निष्ठा (भगवन्निष्ठा) दुर्घटा (दुर्घटनाया)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥
श्रीमद्भागवत (11/19/36)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयमः। तितिक्षा दुःखसंमर्षो जिह्वोपस्थजयो धृतिः ॥ 212 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 212 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शम' गुण, इन्द्रिय-संयमको 'दम', दुःख-सहन करनेका नाम 'तितिक्षा', जिह्वा और उपस्थको जीतनेका नाम 'धृति' है॥ 212 ॥
अनुभाष्य—उद्धवके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,— बुद्धेः मन्निष्ठता (न तु शान्तिमात्रं) 'शमः'; इन्द्रियसंयमः [न चौरादि-दमनं] 'दमः'; दुःखसंमर्षः (आत्मकृतविपाकस्य, विहित-दुःखस्य वा, सन्मर्षः सहनं, न तु भारादेः) 'तितिक्षा'; जिह्वोपस्थ जयः (जिह्वोपस्थयोः जयः वेगधारणं, न तु अनुद्वेगमात्रं) 'धृतिः'।
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[ 19/212-220 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 212 ॥ कृष्ण बिना तृष्णा-त्याग—तार कार्य मानि। अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त एक जानि॥ 213॥ स्वर्ग, मोक्ष कृष्णभक्त 'नरक' करि' माने। कृष्णनिष्ठा, तृष्णा-त्याग—शान्तेर 'दुइ' गुणे॥ 214॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-सम्बन्ध बिना समस्त प्रकारकी कामनाओंका त्याग ही शान्तरसके भक्तका कार्य है। इसलिये शान्तरसके आश्रितको भी एक श्रीकृष्णभक्त माना जाता है। श्रीकृष्णभक्त स्वर्ग तथा मोक्षको भी नरकके समान ही मानता है। श्रीकृष्णके प्रति निष्ठा और अन्यान्य तृष्णाओंका त्याग—ये शान्तरसके भक्तके दो गुण हैं॥ 213-214॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंमें तृणारहित होना ही शान्तरसका कार्य स्वीकृत है; इसलिये एकमात्र श्रीकृष्णभक्त ही शान्त है। 'दुइ गुणे'—अर्थात् श्रीकृष्णनिष्ठा और श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं अथवा द्रव्योंमें लोभका त्याग—ये दो गुण हैं॥ 213-214॥ श्रीमद्भागवत (6/17/28)में :— नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥ 215॥ अनुवाद—स्वर्ग, अपवर्ग (मुक्ति) और नरकको एक समान देखनेवाले श्रीनारायण-भक्त किसीसे भी भयभीत नहीं होते॥ 215॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/270 संख्या देखें॥ 215॥ सभी भगवद्भक्तोंमें ही शान्त-रस विद्यमान :— एइ दुइ गुण व्यापे सब भक्तजने। आकाशेर 'शब्द'-गुण येन भूतगणे॥ 216॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनिष्ठा और तृष्णा-त्याग—ये दो गुण सभी रसके भक्तोंमें विद्यमान रहते हैं। जैसे आकाशका 'शब्द'-गुण अन्य चारों भूतोंमें रहता है॥ 216॥ अनुभाष्य—'सब भक्तजने'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भक्तोंमें ही अवस्थित है। 'आकाशका शब्दगुण'—मध्यलीला 8/85-87 संख्या देखें॥ 216॥ शान्तरसमें—श्रीकृष्णके प्रति निरपेक्ष-भाव :— शान्तेर स्वभाव—कृष्णे ममता-गन्धहीन। 'परंब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान-प्रवीण॥ 217॥ अनुवाद—शान्तरसके भक्तके स्वभावमें श्रीकृष्णके प्रति ममताकी गन्ध भी नहीं होती। उनमें केवल परमब्रह्म (निराकार ब्रह्म) और परमात्माका ज्ञान ही प्रबल होता है॥ 217॥ दास्यरसमें—शान्तरस और सेवा :— केवल 'स्वरूप-ज्ञान' हय शान्तरसे। 'पूर्णैश्वर्यप्रभु-ज्ञान' अधिक हय दास्ये॥ 218॥ ईश्वरज्ञान, सम्भ्रम-गौरव प्रचुर। 'सेवा' करि' कृष्णे सुख देन निरन्तर॥ 219॥ शान्तेर गुण दास्ये आछे, अधिक—'सेवन'। अतएव दास्यरसेर एइ 'दुइ' गुण॥ 220॥ अनुवाद—शान्तरसमें जीवको केवल अपने स्वरूपका ज्ञान होता है। किन्तु दास्यरसमें जीवको श्रीकृष्णका अधिक ज्ञान होता है और वह उन्हें 'पूर्णैश्वर्यमय प्रभु'के रूपमें जानता है। दास्यरसके भक्त श्रीकृष्णको ईश्वर जानते हैं और उनके प्रति प्रचुर सम्भ्रम और गौरव भाव होता है। वे श्रीकृष्णकी सेवा करके उन्हें निरन्तर सुख प्रदान करते हैं। शान्तरसके गुण दास्यरसमें तो होते ही हैं, और साथमें 'सेवाकी भावना'—एक अधिक गुण होता है। इसलिये दास्यरसमें श्रीकृष्णनिष्ठा और सम्भ्रम सेवा—ये दो गुण होते हैं॥ 218-220॥ 214 ।
उन्नीसवाँ अध्याय 19/221-228 ]
सख्यरसमें-शान्तको अपनेमें समाया दास्यरस + विश्रम्भ-ममता :- शान्तेर गुण, दास्येर सेवन-सख्ये दुइ हय। दास्येर 'सम्भ्रम-गौरव'-सेवा, सख्ये 'विश्वास'-मय॥ 221 ॥ कान्धे चड़े, कान्धे चड़ाय, करे क्रीड़ा-रण। कृष्णे सेवे, कृष्णे कराय आपन सेवन! ॥ 222 ॥ विश्रम्भ-प्रधान सख्य-गौरव-सम्भ्रम-हीन। अतएव सख्य-रसेर 'तिन' गुण-चिह्न ॥ 223 ॥ 'ममता' अधिक, कृष्णे आत्मसम ज्ञान। अतएव सख्यरसेर वश भगवान् ॥ 224 ॥
अनुवाद-सख्यरसमें शान्तरसके दोनों गुण और दास्यरसका सेवाका गुण होते हैं। सख्यरसमें दास्यरसकी सम्भ्रम गौरवमयी सेवा परिवर्तित होकर विश्वासमयी हो जाती है। सखा कभी श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ जाते हैं और कभी श्रीकृष्णको अपने कन्धेपर चढ़ा लेते हैं। कभी खेलमें उनसे कृत्रिम युद्ध करते हैं। कभी वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं और कभी श्रीकृष्णसे अपनी सेवा करवाते हैं! सख्यरसमें विश्रम्भकी प्रधानता होनेके कारण वह गौरव-सम्भ्रमसे रहित होता है। इसलिये सख्यरसके तीन गुण उसके लक्षण हैं। सख्यरसमें श्रीकृष्णके प्रति अधिक ममता होती है और वे श्रीकृष्णको अपने समान ही मानते हैं, इसलिये भगवान् सख्यरसके भक्तोंके वशीभूत रहते हैं॥ 221-224 ॥
वात्सल्यरसमें-दास्यको अपनेमें समाया सख्यरस + श्रीकृष्णको अपना पाल्य समझना :- वात्सल्ये शान्तेर गुण, दास्येर सेवन। सेइ सेइ सेवनेर इँहा नाम - 'पालन' ॥ 225 ॥ सख्येर गुण- 'असङ्कोच', 'अगौरव' सार। ममताधिक्ये ताड़न-भर्त्सन-व्यवहार ॥ 226 ॥ आपनारे 'पालक' ज्ञान, कृष्णे 'पाल्य'-ज्ञान। 'चारि' गुणे वात्सल्य रस-अमृत-समान ॥ 227 ॥
से अमृतानन्दे भक्त सह डुबेन आपने। 'कृष्ण-भक्तवश' गुण कहे ऐश्वर्य-ज्ञानिगणे॥ 228 ॥
अनुवाद-वात्सल्यरसमें शान्तरसके गुण, दास्यरसकी सेवा विद्यमान है, किन्तु दास्यरसकी सेवाओंका नाम वात्सल्य-रसमें 'पालन' हो जाता है। सख्यरसके गुणका सार 'असङ्कोच' और 'अगौरव' है। वात्सल्यरसके भक्तोंमें श्रीकृष्णके प्रति ममता अधिक होनेके कारण उनके व्यवहारमें श्रीकृष्णको डाँटना-डपटना, भर्त्सना करना आदि भी देखा जाता है। वात्सल्यरसके भक्त स्वयंको श्रीकृष्णका पालन करनेवाले जानकर श्रीकृष्णको अपना पाल्य मानते हैं। इन चार गुणोंसे वात्सल्यरस अमृतके समान है। उस अमृतानन्दमें श्रीकृष्ण भक्तोंके साथ स्वयं भी डूब जाते हैं। इसलिये ऐश्वर्यज्ञानसे युक्त ज्ञानी लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपने भक्तोंके वशीभूत रहते हैं॥ 225-228 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णमें एकनिष्ठा, और (उसके कारण) अन्य वस्तुओंमें तृष्णा-त्याग-ये दो शान्तरसके गुण हैं। जैसे वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-इन सभी भूतोंमें आकाशका 'शब्दमात्र' गुण व्याप्त है, उसी प्रकार शान्तरसके गुण दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रसमें हैं। शान्तरसमें इन दो गुणोंके रहनेपर भी ममता ('वे मेरे ही हैं' ऐसा धर्म) नहीं है, इसलिये उस रसकी उपास्य-वस्तु- 'परब्रह्म', 'परमात्मा' आदि हैं; यह उपासना-क्रिया-ज्ञान-प्रधान है। 'वे परमात्मा ही मेरे प्रभु हैं और मैं ही उनका नित्यदास हूँ'-ऐसा ममता-ज्ञान जब उसमें संयुक्त होता है, तब शान्तरस विकसित होकर दास्यरसमें परिणत होता है; तथापि उसमें 'ईश्वरज्ञान' और सम्भ्रमरूप 'गौरव' प्रचुर मात्रामें होता है। शान्तरसमें 'सेवा' नहीं होती, दास्यरसमें ही सेवा आरम्भ होती है। दास्यरसमें-शान्तके गुण और 'ममता'-ये दो गुण देखे जाते हैं। पुनः, सख्यरसमें-शान्तके गुण और दास्यके गुण तो होते ही हैं, उनमें विश्वासमय प्रेम भी थोड़ा संयुक्त होता है। विश्वासका नाम ही
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[ 19/218-235 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'विश्रम्भ' है, उस विश्रम्भ-प्रधान सख्यरसमें गौरव-सम्भ्रम नहीं होता, इसलिये सख्यरसमें 'तीन' गुण होते हैं। दास्यमें जो 'ममता' थी, सख्यमें 'आत्मसम' होकर वही वर्द्धित होती है। वात्सल्यमें-शान्तके गुण, दास्यके सेवनकी 'पालन'रूपमें परिणति; विशेषतः सख्यका असङ्कोच और अगौरव-गुण भी ममताकी आधिक्यसे ताड़न-भर्त्सन-व्यवहार एवं स्वयंको 'पालक' जानकर श्रीकृष्णको 'पाल्य' मानना-इन चार-रसोंके गुणोंसे 'वात्सल्य' अमृतके समान बन गया है॥218-227॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्यप्रधान ज्ञानीगण निजभक्त-वश्यताको श्रीकृष्णका गुण कहते हैं॥227॥ पद्मपुराणके 'दामोदराष्टक'में :- इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्। तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं पुनः प्रेमतस्त्वां शतावृत्ति वन्दे॥229॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥229॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्, मैं आपकी सैकड़ों-सैकड़ों बार प्रेमपूर्वक वन्दना करता हूँ; क्योंकि इस प्रकार अपनी लीलाके द्वारा आप गोपियोंको आनन्दकुण्डमें निमज्जित करते हैं एवं आप भक्तोंसे पराजित हो जाते हैं-ऐसा ऐश्वर्य-ज्ञानसम्पन्न भक्तोंको बतलाते हैं॥229॥ अनुभाष्य- इति (अनया दामोदरलीलया) ईदृक्स्वलीलाभिः (ईदृशीभिः दामोदरलीलासद्दशीभिः स्वाभिः लीलाभिः क्रीड़ाभिः) स्वघोषं (स्वस्य प्रेमवतः गोपादीन् सर्वमेव) आनन्दकुण्डे निमज्जन्तं (परमसुखविशेषमनुभवन्तं) तदीयेशितज्ञेषु (भगवदैश्वर्यपरेषु भक्तेषु) भक्तैर्जितत्वम् (आत्मनो भक्तवश्यताम्) आख्यापयन्तं (प्रथयन्तम्) त्वाम् (ईश्वरं) प्रेमतः (भक्तिविशेषेण) शतावृत्ति (यथा स्यात् तथा शतवारान्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥229॥ मधुररसमें-दास्य और सख्यको अपनेमें समाया वात्सल्य + अपने अङ्गोंके द्वारा सेवा :- मधुर-रसे-कृष्णनिष्ठा, सेवा अतिशय। सख्येरे असङ्कोच, लालन-ममताधिक्य हय॥230॥ कान्तभावे निजाङ्ग दिया करेन सेवन। अतएव मधुर-रसेर हय 'पञ्च' गुण॥231॥ अनुवाद-मधुररसमें श्रीकृष्णनिष्ठा, अतिशय सेवा, सख्यका असङ्कोच तथा लालन-ममताका आधिक्य होता है। कान्तभावमें सर्वाङ्ग देकर श्रीकृष्णकी सेवा होती है। इसलिये मधुर-रसमें 'पाँचों' गुण होते हैं॥230-231॥ आकाशादिका शब्दादि जिस प्रकार पृथ्वीके गन्धके गुणमें पर्यवसित हो जाता है, उसी प्रकार मधुररसमें अन्य चार रस विद्यमान :- आकाशादि गुण येन पर पर भूते। एक-दुइ-तिन-चारि-क्रमे पञ्च पृथिवीते॥232॥ एइमत मधुरे सब भाव-समाहार। अतएव आस्वादाधिक्ये करे चमत्कार॥233॥ अनुवाद-आकाशादिके गुण जैसे अगले अगले भूतोंमें होते हैं, वैसे एक-दो-तीन-चारके क्रमसे बढ़ते हुए पृथ्वीमें पाँचों गुण विद्यमान रहते हैं। इसी प्रकार मधुररसमें समस्त प्रकारके रसोंके भाव विद्यमान रहते हैं। इसलिये मधुररसमें आस्वादनकी अधिकता चमत्कार उत्पन्न करती है॥232-233॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/87 संख्या देखें॥232॥ उन्नीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका यह दिग्दर्शन भक्तिरसामृतसिन्धुमें विस्तृत रूपसे वर्णित :- एइ भक्तिरसेर करिलाङ, दिग्दर्शन। इहार विस्तार मने करिह भावन॥234॥ भाविते भाविते कृष्ण स्फुरये अन्तरे। कृष्णकृपाय अज्ञ पाय रससिन्धु-पारे॥"235॥ 216 ।
उन्नीसवाँ अध्याय 19/234-245 ] अनुवाद—(महाप्रभु अब उपसंहार करते हुए कह रहे हैं)—इस प्रकार मैंने तुम्हें भक्तिरसका दिग्दर्शन कराया है। इसे विस्तृत रूपसे जाननेके लिये तुम इसपर मनन करना। मनन करते-करते श्रीकृष्ण तुम्हारे हृदयमें स्फुरित होंगे। श्रीकृष्णकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी रससिन्धुके तट तक पहुँच जाता है॥ 234-235 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शान्तकी 'कृष्णनिष्ठा', दास्यकी 'अतिशय सेवा', सख्यकी 'असङ्कोच सेवा' और वात्सल्यका 'ममताधिक्य लालन'—इन सब भावोंमें और कान्ता- भाव-गत 'निजाङ्ग-दानरूप-सेवा' दृढ़रूपसे संयुक्त होनेपर पाँच गुणोंसे युक्त 'मधुर-रस' होता है। उसमें सभी भावोंका ही संग्रह है। इसलिये आस्वादनका आधिक्य होनेके कारण इसमें अत्यन्त चमत्कारिता लक्षित होती है। संक्षेपमें कहे गये इस भक्ति-रसका सूत्र ही विचारपूर्वक भक्तिरसामृतसिन्धु-रूप शास्त्रको उदित करायेगा ॥ 234-235 ॥ उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। प्रयागसे महाप्रभुकी काशी यात्रा :— एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। वाराणसी चलिबारे प्रभुर हैल मन ॥ 236 ॥ प्रभाते उठिया यबे करिला गमन। तबे ताँर पदे रूप करे निवेदन ॥ 237 ॥ महाप्रभुके अनुगमनके लिये श्रीरूपकी आज्ञा-याचना :— “आज्ञा-हय, आसि मुञि श्रीचरण-सङ्गे। सहिते ना पारि मुञि विरह-तरङ्गे ॥ ” 238 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया। महाप्रभुने अब वाराणसी जानेका निश्चय किया। अगले दिन प्रातःकाल उठकर जब महाप्रभु जाने लगे, तब श्रीरूप गोस्वामीने उनके चरणकमलोंमें निवेदन किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं भी आपके साथ चलूँ, मैं आपके विरहकी तरङ्गको सहन नहीं कर सकता ॥ ” 236-238 ॥ श्रीरूपको वृन्दावन जाने और बादमें वहाँसे पुरीमें आकर मिलनेकी आज्ञा देना :— प्रभु कहे,—“तोमार कर्त्तव्य, आमार वचन। निकटे आसियाछ तुमि, याह वृन्दावन ॥ 239 ॥ वृन्दावन हैते तुमि गौड़देश दिया। आमारे मिलिबा नीलाचलेते आसिया ॥ ” 240 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मेरे वचनका पालन करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। तुम वृन्दावनके निकट आ पहुँचे हो, इसलिये वृन्दावन जाओ। वृन्दावनसे तुम गौड़देश (बङ्गाल) होते हुए मुझसे नीलाचलमें आकर मिलना ॥ ” 239-240 ॥ महाप्रभुका नौकापर चढ़ना, श्रीरूपकी मूर्च्छा :— ताँरे आलिङ्गिया प्रभु नौकाते चड़िला। मूर्च्छित हञा तेंहो ताहाञि पड़िला ॥ 241 ॥ अनुवाद—श्रीरूपको आलिङ्गन करके महाप्रभु नौकापर चढ़ गये। श्रीरूप मूर्च्छित होकर वहींपर गिर पड़े॥ 241 ॥ श्रीरूप और अनुपमकी वृन्दावन-यात्रा :— दाक्षिणात्य-विप्र ताँरे घरे लञा गेला। तबे दुइ भाइ वृन्दावनेरे चलिला ॥ 242 ॥ अनुवाद—दक्षिण भारतीय ब्राह्मण उनको अपने घरपर ले गये। तब वहाँसे दोनों भाई (श्रीरूप और श्रीवल्लभ) वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 242 ॥ महाप्रभुका काशीमें आगमन :— महाप्रभु चलि' चलि' आइला वाराणसी। चन्द्रशेखर मिलिला ग्रामेर बाहिरे आसिं ॥ 243 ॥ वैद्य शेखरके स्वप्नके अनुसार महाप्रभुका दर्शन और अपने घरमें लाना :— रात्रे तेंहो स्वप्न देखे, — प्रभु आइला घरे। प्रातःकाले आसिं' रहे ग्रामेर बाहिरे ॥ 244 ॥ आचम्बिते प्रभु देखि' चरणे पड़िला। आनन्दित हञा निज-गृहे लञा गेला ॥ 245 ॥ । 217
[ 19/243-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभु चलते-चलते वाराणसी आ पहुँचे। श्रीचन्द्रशेखर नगरसे बाहर आकर उनसे मिले। रात्रिके समय श्रीचन्द्रशेखरने स्वप्न देखा था कि महाप्रभु उनके घरपर आये हैं। इसलिये वे प्रातःकालमें ही महाप्रभुको लेने नगरके बाहर आ गये। अचानक महाप्रभुको देखकर श्रीचन्द्रशेखर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़े और आनन्दित होकर उन्हें अपने घरपर ले गये॥ 243-245 ॥ महाप्रभुको श्रीतपनमिश्रका और बलभद्रको श्रीचन्द्रशेखरका निमन्त्रण :- तपनमिश्र शुनि' आसि' प्रभुरे मिलिला। इष्टगोष्ठी करि' प्रभुर निमन्त्रण कैला ॥ 246 ॥ निज घरे लञा प्रभुरे भिक्षा कराइल। भट्टाचार्ये चन्द्रशेखर निमन्त्रण कैल॥ 247 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आगमनके विषयमें सुनकर श्रीतपनमिश्र श्रीचन्द्रशेखरके घरपर आकर उनसे मिले। वहाँपर वार्तालाप करनेके बाद उन्होंने महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया। श्रीतपनमिश्र महाप्रभुको अपने घरपर ले गये और उन्होंने महाप्रभुको भोजन कराया। श्रीबलभद्र भट्टाचार्यको श्रीचन्द्रशेखरने भोजनका निमन्त्रण दिया॥ 246-247 ॥ काशीमें रहनेके समय तक महाप्रभुको भिक्षा देनेके लिये मिश्रकी आज्ञाकी याचना :- भिक्षा-कराञा मिश्र कहे प्रभु-पाय धरि'। “एक भिक्षा मागि, मोरे देह कृपा करि' ॥ 248 ॥ यावत् तोमार हय काशीपुरे स्थिति। मोर घर बिना भिक्षा ना करिबा कति ॥” 249 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको भोजन करानेके बाद श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको पकड़कर कहा,-“मैं आपसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा करके आप मुझे वह भिक्षा प्रदान कीजिये। जब तक आप काशीमें रहेंगे, मेरे घरके अतिरिक्त अन्य कहीं भी भोजन ग्रहण मत कीजियेगा॥” 248-249 ॥ मायावादी संन्यासियोंके सङ्गको दुःसङ्ग जानकर महाप्रभुके द्वारा भक्तकी प्रार्थनापर सम्मति :- प्रभु जानेन—'दिन पाँच-सात से रहिब। संन्यासीर सङ्गे भिक्षा काँहा ना करिब ॥' 250 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीतपनमिश्रके घरमें भिक्षा तथा श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहना :- एत जानि' ताँर भिक्षा कैला अङ्गीकार। वासा-निष्ठा कैला चन्द्रशेखरेर घर ॥ 251 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जानते थे,—'मैं काशीमें पाँच-सात दिन ही रहूँगा और मायावादी संन्यासियोंके साथ कहींपर भी भिक्षा ग्रहण नहीं करूँगा।' ऐसा जाननेके कारण महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रकी भिक्षाके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया, किन्तु उन्होंने श्रीचन्द्रशेखरके घरमें ही रहनेका निश्चय किया॥ 250-251 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र प्रभु ताँरे स्नेह करि' कृपा प्रकाशिला ॥ 252 ॥ महाप्रभु आइला शुनि' शिष्ट शिष्ट जन। ब्राह्मण, क्षत्रिय आसि' करेन दरशन ॥ 253 ॥ अनुवाद-महाराष्ट्र मिले। महाप्रभुने उन्हें बहुत स्नेह करके कृपा प्रकाशित की। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाजके सज्जन व्यक्तियोंने आकर उनका दर्शन किया ॥ 252-253 ॥ श्रीरूप-शिक्षाका संक्षेपमें वर्णन :- श्रीरूप-उपरे प्रभुर यत कृपा हैल। अत्यन्त विस्तार-कथा संक्षेपे कहिल ॥ 254 ॥ 218 |
उन्नीसवाँ अध्याय 19/254-256 ] अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीपर महाप्रभुकी जितनी श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कृपा हुई, उस अत्यन्त विस्तृत कथाको मैंने केवल चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 256॥ संक्षेपमें ही वर्णन किया है ॥ 254 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीरूपानुग्रहो नाम श्रीरूपशिक्षा-श्रवणसे श्रीचैतन्यचरणोंमें प्रेमभक्ति-प्राप्ति :- ऊनविंश-परिच्छेदः। श्रद्धा करि' एइ कथा सुने येइ जने। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी प्रेमभक्ति पाय सेइ चैतन्य-चरणे ॥ 255 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 256 ॥ अनुवाद—श्रद्धापूर्वक जो व्यक्ति इस कथाका श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीरूपानुग्रह-नामक उन्नीसवें प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है ॥ 255 ॥ अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 219
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 220 ।
बीसवाँ अध्याय कथासार—जब श्रीसनातन गोस्वामी गौड़देशकी कारागारमें बन्द थे, तब श्रीरूपगोस्वामीने उन्हें पत्रमें लिखा,—‘महाप्रभु मथुरा गये हैं।’ श्रीसनातनने कारागारके रक्षकको मीठे वचन कहकर सात हजार मुद्राएँ दीं और गङ्गा पार करके पलायन कर गये। साथी ईशानके पास आठ स्वर्णमुद्राएँ होनेके कारण पातड़ा-पर्वतके जमींदारने उन मुद्राओंको हरण करनेकी आशासे श्रीसनातनका आतिथ्य-सत्कार किया। ईशानसे पूछनेपर श्रीसनातनको पता चला कि उसके पास स्वर्णमुद्राएँ हैं। उन मुद्राओंको अनर्थरूप जानकर उन्हें जमींदारको देकर उन्होंने पर्वतमय देशको पार किया। पर्वत पार करके श्रीसनातनने ईशानको देश जानेके लिये विदायी दी। हाजिपुर पहुँचनेपर उनके बहनोई राजकर्मचारी श्रीकान्त उनसे मिले और समस्त वृत्तान्त सुनकर उन्हें गङ्गा पार करा दी। तब श्रीसनातन चलते-चलते काशीधाममें आकर श्रीचन्द्रशेखरके द्वारपर पहुँचे; महाप्रभुने उन्हें बुलवाया और उनके प्रति कृपा दिखलाते हुए उन्हें वेश बदलने और भद्र (सज्जन) व्यक्तिकी भाँति दिखने आज्ञा दी। श्रीसनातन केश मुँड़वाकर और स्नान करके आये एवं उन्होंने श्रीतपनमिश्रके द्वारा दिये गये पुराने वस्त्रको कौपीन और बहिर्वास बनाकर पहन लिया। बादमें उन्होंने अपने साथ लाये मूल्यवान कम्बलको गङ्गातटपर एक फटे-पुराने चिथड़ेसे बदलकर उसे धारण करके महाप्रभुको आनन्दित किया। श्रीसनातनने वहाँ रहकर जब महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा की, तब महाप्रभुने पहले ‘जीवके स्वरूप’ और ‘श्रीकृष्णशक्ति’के विषयमें समझाया, बादमें सम्बन्ध-ज्ञान सिखलाकर अभिधेय-रूपा भक्तिकी व्याख्या की। श्रीकृष्णके स्वरूप-विचारमें ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्का विचार, स्वयंरूप और तदेकात्म और आवेश, उनमें ‘वैभव’ और ‘प्रभाव’-विलास आदिके विचारसे भगवान्की मूर्तियोंके भेद आदिके विषयमें बतलाया; उसके बाद पुरुषावतारके माया-वैभव, मन्वन्तरावतार, गुणावतार, शक्त्यावेशावतार और बाल्य-पौगण्ड-अवस्थाके भेदसे सभी लीलाओं एवं किशोर-लीलाकी नित्यताकी व्याख्या की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीचैतन्यमहाप्रभुम्। नीचोऽपि यत्प्रसादात् स्याद्भक्तिशास्त्रप्रवर्त्तकः॥ 1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपासे नीच व्यक्ति भी भक्तिशास्त्रका प्रवर्त्तक हो सकता है, उन अनन्त-अद्भुत- ऐश्वर्यसे युक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1॥ अनुभाष्य— यत्प्रसादात् (यस्य कृपया) नीचः (विषयी) अपि भक्ति-शास्त्र-प्रवर्त्तकः (भक्तिशास्त्रलेखकः) स्यात्, तम् अनन्ताद्भुतैश्वर्यम् (अशेषापूर्व्वैश्वर्यपूर्णं) श्रीचैतन्यमहाप्रभुम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2॥ बन्दी श्रीसनातनको श्रीरूपके द्वारा लिखित पत्र-प्राप्ति :- एथा गौड़े सनातन आछे बन्दिशाले। श्रीरूप-गोसाञिर पत्री आइल हेनकाले॥ 3॥ अनुवाद—जब श्रीसनातन गौड़देशमें कारागारमें बन्द । 221
[ 20/3-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला थे, तब उनके पास श्रीरूप-गोस्वामीका एक पत्र आया॥ ३॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पत्री' - उद्भटचन्द्रिका-ग्रन्थके टीकाकारने लिखा है कि निम्नलिखित श्लोक श्रीरूपने बाक्लासे लिखकर गौड़देशके कारागारमें श्रीसनातनके पास भेजा था। इस श्लोकमें महाप्रभुके मथुरा जानेका सङ्केत होनेके कारण इसे श्रीरूप गोस्वामीकी पत्री कहकर विश्वास किया जा सकता है- “यदुपतेः क्व गता मथुरापुरी, रघुपतेः क्व गतोत्तरकोशला। इति विचिन्त्य कुरुष्व मनः स्थिरं, न सदिदं जगदित्यवधारय॥” [अर्थात् “यदुपतिकी मथुरापुरी कहाँ गयी है, रघुपतिकी ही उत्तरकोशला (अयोध्या) कहाँ गयी है-इसपर विशेषरूपसे चिन्ता करके मन स्थिर कीजिये और यह दृश्यमान् जगत् नित्य नहीं है, - इससे अवगत होइये।”]॥३॥ श्रीसनातनका आनन्द और कारागार-रक्षककी प्रशंसा :- पत्री पाञा सनातन आनन्दित हैला। यवन-रक्षक-पाश कहिते लागिला ॥ 4 ॥ “तुमि एक जिन्दापीर महाभाग्यवान्। केताब-कोराण-शास्त्रे आछे तोमार ज्ञान॥5॥ एक बन्दी छाड़े यदि निज-धर्म देखिया। संसार हइते तारे मुक्त करेन गोसाञा ॥ 6 ॥ प्रत्युपकारकी प्रार्थना :- पूर्वे आमि तोमार करियाछि उपकार। तुमि आमा छाड़ि' कर प्रत्युपकार ॥ 7 ॥ शुद्धहरिभजनके लिये लौकिक सुनीतिके विचारसे घृणित चेष्टाकी भी श्रीसनातनके द्वारा अनुकूलरूपमें नियुक्ति - यही सत्य-धर्म :- पाँच सहस्र मुद्रा दिब, तुमि कर अङ्गीकार। पुण्य, अर्थ,-दुइ लाभ हइबे तोमार ॥” 8 ॥ अनुवाद-पत्रको प्राप्त करके श्रीसनातन बहुत प्रसन्न हुए। तब वे कारागार-अध्यक्षके पास गये और उनसे कहा, - “आप एक जिन्दापीर हैं और महासौभाग्यशाली हैं। आपको कुरान और अन्य शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान भी है। यदि कोई अपने धर्मका पालन करते हुए किसी एक बन्दीको मुक्त कर देता है, तब फिर खुदा उसे संसारसे मुक्त कर देते हैं। पहले मैंने आपके ऊपर उपकार किया था और अब मैं कठिनाईमें हूँ, इसलिये आप मुझे कारागारसे मुक्त करके उसका प्रत्युपकार करो। मैं आपको पाँच हजार स्वर्ण मुद्राएँ भी दूँगा, आप उसे स्वीकार करें। मुझे छोड़नेसे आपको पुण्य और धन-इन दोनोंकी प्राप्ति होगी॥” 4-8॥ अनुभाष्य - 'जिन्दापीर' - जीवित पीर । 'गोसाञा' - खुदा, भगवान् ॥ 5-6 ॥ कारागार-रक्षकको राजाका भय :- तबे सेइ यवन कहे, - “शुन, महाशय। तोमारे छाड़िब, किन्तु करि राजभय ॥”9॥ अनुवाद-तब उस यवनने कहा, - “सुनो, महाशय ! मैं आपको छोड़ना तो चाहता हूँ, किन्तु मुझे बादशाहका भय है॥”9॥ श्रीसनातनके द्वारा परामर्श देना :- सनातन कहे, - “तुमि ना कर राजभय। दक्षिण गियाछे, यदि लेउटि' आओयय॥ 10॥ ताँहारे कहिओ-सेइ बाह्यकृत्ये गेल। गङ्गार निकट गङ्गा देखि झाँप दिल ॥ 11 ॥ अनेक देखिल, तार लाग् ना पाइल। दाड़ुका-सहित डुबि काँहा बहि' गेल॥ 12 ॥ किछु भय नाहि, आमि ए-देशे ना रब। दरवेश हञा आमि मक्काके याइब ॥ ”13॥ अनुवाद - श्रीसनातनने उससे कहा, - “आप बादशाहका भय मत कीजिये। अभी तो वे दक्षिणमें युद्ध करनेके लिये गये हैं, जब वे लौटकर आयेंगे, तो उनसे कहना - वे (साकर मल्लिक) गङ्गाके निकट मलत्याग करनेके लिये गङ्गा तटपर गये थे और 222 ।