श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1659, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/209-212 ]
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—हे कृष्ण, हम अपने पति, पुत्र, अन्वय (पतिके सम्बन्धसे जो पुत्रके समान हैं), भाई और बन्धुओं, सभीका परित्याग करके तुम्हारे पास आयी हैं; हमारे आनेका कारण तुम जानते हो,—तुम्हारे गीतसे मोहित होकर हम आयी हैं। हे धूर्त, रात्रिकालमें स्त्रियोंका [तुम्हारे अतिरिक्त] कौन इस प्रकार परित्याग करता है? ॥ 209 ॥
अनुभाष्य—गोपियोंके साथ रासलीला करते-करते श्रीकृष्णके अचानक अन्तर्धान होनेपर, श्रीकृष्णके उद्देश्यसे विरहमें कातर गोपियोंकी विलाप-गीति,—
हे अच्युत, गतिविदः (अस्मदागमनं जानतः, गीतगतीर्वा जानतः, यद्वा गतिविदः वयं) तव उद्गीतमोहिताः (उद्गीतेन् उच्चैर्गीतेन् मोहिताः वयं गोप्यः) पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान् (पतीन् सुतान् अन्वयान् तत्सम्बन्धिनः पुत्रान् भ्रातॄन् बान्धवांश्च सर्वान्) अतिविलङ्घ्य (अनादृत्य) ते (तव) अन्ति (समीपम्) आगताः; हे कितव, (वञ्चनशील शठ,) निशि एवम्भूताः योषितः (स्वयमागताः) [त्वां ऋते] कः त्यजेत् [न कोऽपीत्यर्थः]।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 209 ॥
शान्तरसके गुण और स्वरूप :- शान्तरसे—'स्वरूपबुद्धये कृष्णैकनिष्ठता'। “शमो मन्निष्ठता बुद्धेः” इति श्रीमुख-गाथा ॥ 210 ॥
अनुवाद—शान्तरसमें अपने स्वरूपमें स्थित होकर बुद्धिके द्वारा श्रीकृष्णमें निष्ठा होती है। श्रीकृष्णने अपने श्रीमुखसे स्वयं उद्धवजीसे कहा है,—“मुझमें ही बुद्धिका एकाग्र होना 'शम' है॥” 210 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ बुद्धिसे 'शम'-धर्म उदित होता है; शम-धर्मसे 'शान्त'-रस होता है, इसलिये शान्तरसमें श्रीकृष्ण ही एकमात्र परमार्थ स्वरूप हैं। समस्त विश्व ही (श्रीकृष्णपर आश्रित होनेपर भी श्रीकृष्ण-स्वरूपसे पृथक् अन्य) 'इतर' वस्तु है—यही निष्ठा लक्षित होती है॥ 210 ॥
अनुभाष्य—शान्तरसमें जड़़ीय-भोगबुद्धिके दूर होने पर जीवकी स्वरूपबुद्धि उदित होती है। उनका नित्य स्वरूप ही श्रीकृष्णमें नित्य एकनिष्ठता-धर्मसे युक्त है। श्रीभगवान्ने उद्धवको अपने मुखसे कहा है कि 'शम'-शब्दका अर्थ 'कृष्णैकनिष्ठता' है॥ 210 ॥
भक्तिरसामृतसिन्धु (3/1/47)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति श्रीभगवद्वचः। तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां शान्तरतिं बिना॥ 211 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शमगुण'—इस भगवद्-वाक्यसे समझना होगा कि शान्तरतिके बिना भगवन्निष्ठा-अत्यन्त दुर्लभ है॥ 211 ॥
अनुभाष्य— बुद्धेः मन्निष्ठता (कृष्णैकनिष्ठता) 'शमः' इति श्रीभगवद्वचः (उद्धवं प्रति श्रीकृष्णवाक्यम्); एतां शान्तरतिं बिना बुद्धेः तन्निष्ठा (भगवन्निष्ठा) दुर्घटा (दुर्घटनाया)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 211 ॥
श्रीमद्भागवत (11/19/36)में :- शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियसंयमः। तितिक्षा दुःखसंमर्षो जिह्वोपस्थजयो धृतिः ॥ 212 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 212 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मुझमें निष्ठ-बुद्धिसे 'शम' गुण, इन्द्रिय-संयमको 'दम', दुःख-सहन करनेका नाम 'तितिक्षा', जिह्वा और उपस्थको जीतनेका नाम 'धृति' है॥ 212 ॥
अनुभाष्य—उद्धवके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,— बुद्धेः मन्निष्ठता (न तु शान्तिमात्रं) 'शमः'; इन्द्रियसंयमः [न चौरादि-दमनं] 'दमः'; दुःखसंमर्षः (आत्मकृतविपाकस्य, विहित-दुःखस्य वा, सन्मर्षः सहनं, न तु भारादेः) 'तितिक्षा'; जिह्वोपस्थ जयः (जिह्वोपस्थयोः जयः वेगधारणं, न तु अनुद्वेगमात्रं) 'धृतिः'।
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