श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1660, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/212-220 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 212 ॥ कृष्ण बिना तृष्णा-त्याग—तार कार्य मानि। अतएव 'शान्त' कृष्णभक्त एक जानि॥ 213॥ स्वर्ग, मोक्ष कृष्णभक्त 'नरक' करि' माने। कृष्णनिष्ठा, तृष्णा-त्याग—शान्तेर 'दुइ' गुणे॥ 214॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण-सम्बन्ध बिना समस्त प्रकारकी कामनाओंका त्याग ही शान्तरसके भक्तका कार्य है। इसलिये शान्तरसके आश्रितको भी एक श्रीकृष्णभक्त माना जाता है। श्रीकृष्णभक्त स्वर्ग तथा मोक्षको भी नरकके समान ही मानता है। श्रीकृष्णके प्रति निष्ठा और अन्यान्य तृष्णाओंका त्याग—ये शान्तरसके भक्तके दो गुण हैं॥ 213-214॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णसे अतिरिक्त अन्य वस्तुओंमें तृणारहित होना ही शान्तरसका कार्य स्वीकृत है; इसलिये एकमात्र श्रीकृष्णभक्त ही शान्त है। 'दुइ गुणे'—अर्थात् श्रीकृष्णनिष्ठा और श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं अथवा द्रव्योंमें लोभका त्याग—ये दो गुण हैं॥ 213-214॥ श्रीमद्भागवत (6/17/28)में :— नारायणपराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति। स्वर्गापवर्गनरकेष्वपि तुल्यार्थदर्शिनः॥ 215॥ अनुवाद—स्वर्ग, अपवर्ग (मुक्ति) और नरकको एक समान देखनेवाले श्रीनारायण-भक्त किसीसे भी भयभीत नहीं होते॥ 215॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 9/270 संख्या देखें॥ 215॥ सभी भगवद्भक्तोंमें ही शान्त-रस विद्यमान :— एइ दुइ गुण व्यापे सब भक्तजने। आकाशेर 'शब्द'-गुण येन भूतगणे॥ 216॥ अनुवाद—श्रीकृष्णनिष्ठा और तृष्णा-त्याग—ये दो गुण सभी रसके भक्तोंमें विद्यमान रहते हैं। जैसे आकाशका 'शब्द'-गुण अन्य चारों भूतोंमें रहता है॥ 216॥ अनुभाष्य—'सब भक्तजने'—शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर—इन पाँच प्रकारके भक्तोंमें ही अवस्थित है। 'आकाशका शब्दगुण'—मध्यलीला 8/85-87 संख्या देखें॥ 216॥ शान्तरसमें—श्रीकृष्णके प्रति निरपेक्ष-भाव :— शान्तेर स्वभाव—कृष्णे ममता-गन्धहीन। 'परंब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान-प्रवीण॥ 217॥ अनुवाद—शान्तरसके भक्तके स्वभावमें श्रीकृष्णके प्रति ममताकी गन्ध भी नहीं होती। उनमें केवल परमब्रह्म (निराकार ब्रह्म) और परमात्माका ज्ञान ही प्रबल होता है॥ 217॥ दास्यरसमें—शान्तरस और सेवा :— केवल 'स्वरूप-ज्ञान' हय शान्तरसे। 'पूर्णैश्वर्यप्रभु-ज्ञान' अधिक हय दास्ये॥ 218॥ ईश्वरज्ञान, सम्भ्रम-गौरव प्रचुर। 'सेवा' करि' कृष्णे सुख देन निरन्तर॥ 219॥ शान्तेर गुण दास्ये आछे, अधिक—'सेवन'। अतएव दास्यरसेर एइ 'दुइ' गुण॥ 220॥ अनुवाद—शान्तरसमें जीवको केवल अपने स्वरूपका ज्ञान होता है। किन्तु दास्यरसमें जीवको श्रीकृष्णका अधिक ज्ञान होता है और वह उन्हें 'पूर्णैश्वर्यमय प्रभु'के रूपमें जानता है। दास्यरसके भक्त श्रीकृष्णको ईश्वर जानते हैं और उनके प्रति प्रचुर सम्भ्रम और गौरव भाव होता है। वे श्रीकृष्णकी सेवा करके उन्हें निरन्तर सुख प्रदान करते हैं। शान्तरसके गुण दास्यरसमें तो होते ही हैं, और साथमें 'सेवाकी भावना'—एक अधिक गुण होता है। इसलिये दास्यरसमें श्रीकृष्णनिष्ठा और सम्भ्रम सेवा—ये दो गुण होते हैं॥ 218-220॥ 214 ।