भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1661

उन्नीसवाँ अध्याय 19/221-228 ]

सख्यरसमें-शान्तको अपनेमें समाया दास्यरस + विश्रम्भ-ममता :- शान्तेर गुण, दास्येर सेवन-सख्ये दुइ हय। दास्येर 'सम्भ्रम-गौरव'-सेवा, सख्ये 'विश्वास'-मय॥ 221 ॥ कान्धे चड़े, कान्धे चड़ाय, करे क्रीड़ा-रण। कृष्णे सेवे, कृष्णे कराय आपन सेवन! ॥ 222 ॥ विश्रम्भ-प्रधान सख्य-गौरव-सम्भ्रम-हीन। अतएव सख्य-रसेर 'तिन' गुण-चिह्न ॥ 223 ॥ 'ममता' अधिक, कृष्णे आत्मसम ज्ञान। अतएव सख्यरसेर वश भगवान् ॥ 224 ॥

अनुवाद-सख्यरसमें शान्तरसके दोनों गुण और दास्यरसका सेवाका गुण होते हैं। सख्यरसमें दास्यरसकी सम्भ्रम गौरवमयी सेवा परिवर्तित होकर विश्वासमयी हो जाती है। सखा कभी श्रीकृष्णके कन्धेपर चढ़ जाते हैं और कभी श्रीकृष्णको अपने कन्धेपर चढ़ा लेते हैं। कभी खेलमें उनसे कृत्रिम युद्ध करते हैं। कभी वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं और कभी श्रीकृष्णसे अपनी सेवा करवाते हैं! सख्यरसमें विश्रम्भकी प्रधानता होनेके कारण वह गौरव-सम्भ्रमसे रहित होता है। इसलिये सख्यरसके तीन गुण उसके लक्षण हैं। सख्यरसमें श्रीकृष्णके प्रति अधिक ममता होती है और वे श्रीकृष्णको अपने समान ही मानते हैं, इसलिये भगवान् सख्यरसके भक्तोंके वशीभूत रहते हैं॥ 221-224 ॥

वात्सल्यरसमें-दास्यको अपनेमें समाया सख्यरस + श्रीकृष्णको अपना पाल्य समझना :- वात्सल्ये शान्तेर गुण, दास्येर सेवन। सेइ सेइ सेवनेर इँहा नाम - 'पालन' ॥ 225 ॥ सख्येर गुण- 'असङ्कोच', 'अगौरव' सार। ममताधिक्ये ताड़न-भर्त्सन-व्यवहार ॥ 226 ॥ आपनारे 'पालक' ज्ञान, कृष्णे 'पाल्य'-ज्ञान। 'चारि' गुणे वात्सल्य रस-अमृत-समान ॥ 227 ॥

से अमृतानन्दे भक्त सह डुबेन आपने। 'कृष्ण-भक्तवश' गुण कहे ऐश्वर्य-ज्ञानिगणे॥ 228 ॥

अनुवाद-वात्सल्यरसमें शान्तरसके गुण, दास्यरसकी सेवा विद्यमान है, किन्तु दास्यरसकी सेवाओंका नाम वात्सल्य-रसमें 'पालन' हो जाता है। सख्यरसके गुणका सार 'असङ्कोच' और 'अगौरव' है। वात्सल्यरसके भक्तोंमें श्रीकृष्णके प्रति ममता अधिक होनेके कारण उनके व्यवहारमें श्रीकृष्णको डाँटना-डपटना, भर्त्सना करना आदि भी देखा जाता है। वात्सल्यरसके भक्त स्वयंको श्रीकृष्णका पालन करनेवाले जानकर श्रीकृष्णको अपना पाल्य मानते हैं। इन चार गुणोंसे वात्सल्यरस अमृतके समान है। उस अमृतानन्दमें श्रीकृष्ण भक्तोंके साथ स्वयं भी डूब जाते हैं। इसलिये ऐश्वर्यज्ञानसे युक्त ज्ञानी लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण अपने भक्तोंके वशीभूत रहते हैं॥ 225-228 ॥

अमृतप्रवाह भाष्य- श्रीकृष्णमें एकनिष्ठा, और (उसके कारण) अन्य वस्तुओंमें तृष्णा-त्याग-ये दो शान्तरसके गुण हैं। जैसे वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी-इन सभी भूतोंमें आकाशका 'शब्दमात्र' गुण व्याप्त है, उसी प्रकार शान्तरसके गुण दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-रसमें हैं। शान्तरसमें इन दो गुणोंके रहनेपर भी ममता ('वे मेरे ही हैं' ऐसा धर्म) नहीं है, इसलिये उस रसकी उपास्य-वस्तु- 'परब्रह्म', 'परमात्मा' आदि हैं; यह उपासना-क्रिया-ज्ञान-प्रधान है। 'वे परमात्मा ही मेरे प्रभु हैं और मैं ही उनका नित्यदास हूँ'-ऐसा ममता-ज्ञान जब उसमें संयुक्त होता है, तब शान्तरस विकसित होकर दास्यरसमें परिणत होता है; तथापि उसमें 'ईश्वरज्ञान' और सम्भ्रमरूप 'गौरव' प्रचुर मात्रामें होता है। शान्तरसमें 'सेवा' नहीं होती, दास्यरसमें ही सेवा आरम्भ होती है। दास्यरसमें-शान्तके गुण और 'ममता'-ये दो गुण देखे जाते हैं। पुनः, सख्यरसमें-शान्तके गुण और दास्यके गुण तो होते ही हैं, उनमें विश्वासमय प्रेम भी थोड़ा संयुक्त होता है। विश्वासका नाम ही

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