भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1662, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1662

[ 19/218-235 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला 'विश्रम्भ' है, उस विश्रम्भ-प्रधान सख्यरसमें गौरव-सम्भ्रम नहीं होता, इसलिये सख्यरसमें 'तीन' गुण होते हैं। दास्यमें जो 'ममता' थी, सख्यमें 'आत्मसम' होकर वही वर्द्धित होती है। वात्सल्यमें-शान्तके गुण, दास्यके सेवनकी 'पालन'रूपमें परिणति; विशेषतः सख्यका असङ्कोच और अगौरव-गुण भी ममताकी आधिक्यसे ताड़न-भर्त्सन-व्यवहार एवं स्वयंको 'पालक' जानकर श्रीकृष्णको 'पाल्य' मानना-इन चार-रसोंके गुणोंसे 'वात्सल्य' अमृतके समान बन गया है॥218-227॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्यप्रधान ज्ञानीगण निजभक्त-वश्यताको श्रीकृष्णका गुण कहते हैं॥227॥ पद्मपुराणके 'दामोदराष्टक'में :- इतीदृक्स्वलीलाभिरानन्दकुण्डे स्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम्। तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वं पुनः प्रेमतस्त्वां शतावृत्ति वन्दे॥229॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥229॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्, मैं आपकी सैकड़ों-सैकड़ों बार प्रेमपूर्वक वन्दना करता हूँ; क्योंकि इस प्रकार अपनी लीलाके द्वारा आप गोपियोंको आनन्दकुण्डमें निमज्जित करते हैं एवं आप भक्तोंसे पराजित हो जाते हैं-ऐसा ऐश्वर्य-ज्ञानसम्पन्न भक्तोंको बतलाते हैं॥229॥ अनुभाष्य- इति (अनया दामोदरलीलया) ईदृक्स्वलीलाभिः (ईदृशीभिः दामोदरलीलासद्दशीभिः स्वाभिः लीलाभिः क्रीड़ाभिः) स्वघोषं (स्वस्य प्रेमवतः गोपादीन् सर्वमेव) आनन्दकुण्डे निमज्जन्तं (परमसुखविशेषमनुभवन्तं) तदीयेशितज्ञेषु (भगवदैश्वर्यपरेषु भक्तेषु) भक्तैर्जितत्वम् (आत्मनो भक्तवश्यताम्) आख्यापयन्तं (प्रथयन्तम्) त्वाम् (ईश्वरं) प्रेमतः (भक्तिविशेषेण) शतावृत्ति (यथा स्यात् तथा शतवारान्) अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥229॥ मधुररसमें-दास्य और सख्यको अपनेमें समाया वात्सल्य + अपने अङ्गोंके द्वारा सेवा :- मधुर-रसे-कृष्णनिष्ठा, सेवा अतिशय। सख्येरे असङ्कोच, लालन-ममताधिक्य हय॥230॥ कान्तभावे निजाङ्ग दिया करेन सेवन। अतएव मधुर-रसेर हय 'पञ्च' गुण॥231॥ अनुवाद-मधुररसमें श्रीकृष्णनिष्ठा, अतिशय सेवा, सख्यका असङ्कोच तथा लालन-ममताका आधिक्य होता है। कान्तभावमें सर्वाङ्ग देकर श्रीकृष्णकी सेवा होती है। इसलिये मधुर-रसमें 'पाँचों' गुण होते हैं॥230-231॥ आकाशादिका शब्दादि जिस प्रकार पृथ्वीके गन्धके गुणमें पर्यवसित हो जाता है, उसी प्रकार मधुररसमें अन्य चार रस विद्यमान :- आकाशादि गुण येन पर पर भूते। एक-दुइ-तिन-चारि-क्रमे पञ्च पृथिवीते॥232॥ एइमत मधुरे सब भाव-समाहार। अतएव आस्वादाधिक्ये करे चमत्कार॥233॥ अनुवाद-आकाशादिके गुण जैसे अगले अगले भूतोंमें होते हैं, वैसे एक-दो-तीन-चारके क्रमसे बढ़ते हुए पृथ्वीमें पाँचों गुण विद्यमान रहते हैं। इसी प्रकार मधुररसमें समस्त प्रकारके रसोंके भाव विद्यमान रहते हैं। इसलिये मधुररसमें आस्वादनकी अधिकता चमत्कार उत्पन्न करती है॥232-233॥ अनुभाष्य-मध्यलीला 8/87 संख्या देखें॥232॥ उन्नीसवें अध्यायका अनुभाष्य समाप्त। महाप्रभुका यह दिग्दर्शन भक्तिरसामृतसिन्धुमें विस्तृत रूपसे वर्णित :- एइ भक्तिरसेर करिलाङ, दिग्दर्शन। इहार विस्तार मने करिह भावन॥234॥ भाविते भाविते कृष्ण स्फुरये अन्तरे। कृष्णकृपाय अज्ञ पाय रससिन्धु-पारे॥"235॥ 216 ।

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