भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1663, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1663

उन्नीसवाँ अध्याय 19/234-245 ] अनुवाद—(महाप्रभु अब उपसंहार करते हुए कह रहे हैं)—इस प्रकार मैंने तुम्हें भक्तिरसका दिग्दर्शन कराया है। इसे विस्तृत रूपसे जाननेके लिये तुम इसपर मनन करना। मनन करते-करते श्रीकृष्ण तुम्हारे हृदयमें स्फुरित होंगे। श्रीकृष्णकी कृपासे अज्ञ व्यक्ति भी रससिन्धुके तट तक पहुँच जाता है॥ 234-235 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—शान्तकी 'कृष्णनिष्ठा', दास्यकी 'अतिशय सेवा', सख्यकी 'असङ्कोच सेवा' और वात्सल्यका 'ममताधिक्य लालन'—इन सब भावोंमें और कान्ता- भाव-गत 'निजाङ्ग-दानरूप-सेवा' दृढ़रूपसे संयुक्त होनेपर पाँच गुणोंसे युक्त 'मधुर-रस' होता है। उसमें सभी भावोंका ही संग्रह है। इसलिये आस्वादनका आधिक्य होनेके कारण इसमें अत्यन्त चमत्कारिता लक्षित होती है। संक्षेपमें कहे गये इस भक्ति-रसका सूत्र ही विचारपूर्वक भक्तिरसामृतसिन्धु-रूप शास्त्रको उदित करायेगा ॥ 234-235 ॥ उन्नीसवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य समाप्त। प्रयागसे महाप्रभुकी काशी यात्रा :— एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन। वाराणसी चलिबारे प्रभुर हैल मन ॥ 236 ॥ प्रभाते उठिया यबे करिला गमन। तबे ताँर पदे रूप करे निवेदन ॥ 237 ॥ महाप्रभुके अनुगमनके लिये श्रीरूपकी आज्ञा-याचना :— “आज्ञा-हय, आसि मुञि श्रीचरण-सङ्गे। सहिते ना पारि मुञि विरह-तरङ्गे ॥ ” 238 ॥ अनुवाद—इतना कहकर महाप्रभुने श्रीरूपका आलिङ्गन किया। महाप्रभुने अब वाराणसी जानेका निश्चय किया। अगले दिन प्रातःकाल उठकर जब महाप्रभु जाने लगे, तब श्रीरूप गोस्वामीने उनके चरणकमलोंमें निवेदन किया,—“यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं भी आपके साथ चलूँ, मैं आपके विरहकी तरङ्गको सहन नहीं कर सकता ॥ ” 236-238 ॥ श्रीरूपको वृन्दावन जाने और बादमें वहाँसे पुरीमें आकर मिलनेकी आज्ञा देना :— प्रभु कहे,—“तोमार कर्त्तव्य, आमार वचन। निकटे आसियाछ तुमि, याह वृन्दावन ॥ 239 ॥ वृन्दावन हैते तुमि गौड़देश दिया। आमारे मिलिबा नीलाचलेते आसिया ॥ ” 240 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा,—“मेरे वचनका पालन करना तुम्हारा कर्त्तव्य है। तुम वृन्दावनके निकट आ पहुँचे हो, इसलिये वृन्दावन जाओ। वृन्दावनसे तुम गौड़देश (बङ्गाल) होते हुए मुझसे नीलाचलमें आकर मिलना ॥ ” 239-240 ॥ महाप्रभुका नौकापर चढ़ना, श्रीरूपकी मूर्च्छा :— ताँरे आलिङ्गिया प्रभु नौकाते चड़िला। मूर्च्छित हञा तेंहो ताहाञि पड़िला ॥ 241 ॥ अनुवाद—श्रीरूपको आलिङ्गन करके महाप्रभु नौकापर चढ़ गये। श्रीरूप मूर्च्छित होकर वहींपर गिर पड़े॥ 241 ॥ श्रीरूप और अनुपमकी वृन्दावन-यात्रा :— दाक्षिणात्य-विप्र ताँरे घरे लञा गेला। तबे दुइ भाइ वृन्दावनेरे चलिला ॥ 242 ॥ अनुवाद—दक्षिण भारतीय ब्राह्मण उनको अपने घरपर ले गये। तब वहाँसे दोनों भाई (श्रीरूप और श्रीवल्लभ) वृन्दावनकी ओर चल दिये ॥ 242 ॥ महाप्रभुका काशीमें आगमन :— महाप्रभु चलि' चलि' आइला वाराणसी। चन्द्रशेखर मिलिला ग्रामेर बाहिरे आसिं ॥ 243 ॥ वैद्य शेखरके स्वप्नके अनुसार महाप्रभुका दर्शन और अपने घरमें लाना :— रात्रे तेंहो स्वप्न देखे, — प्रभु आइला घरे। प्रातःकाले आसिं' रहे ग्रामेर बाहिरे ॥ 244 ॥ आचम्बिते प्रभु देखि' चरणे पड़िला। आनन्दित हञा निज-गृहे लञा गेला ॥ 245 ॥ । 217