भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1664, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1664

[ 19/243-254 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद-महाप्रभु चलते-चलते वाराणसी आ पहुँचे। श्रीचन्द्रशेखर नगरसे बाहर आकर उनसे मिले। रात्रिके समय श्रीचन्द्रशेखरने स्वप्न देखा था कि महाप्रभु उनके घरपर आये हैं। इसलिये वे प्रातःकालमें ही महाप्रभुको लेने नगरके बाहर आ गये। अचानक महाप्रभुको देखकर श्रीचन्द्रशेखर उनके चरणकमलोंमें गिर पड़े और आनन्दित होकर उन्हें अपने घरपर ले गये॥ 243-245 ॥ महाप्रभुको श्रीतपनमिश्रका और बलभद्रको श्रीचन्द्रशेखरका निमन्त्रण :- तपनमिश्र शुनि' आसि' प्रभुरे मिलिला। इष्टगोष्ठी करि' प्रभुर निमन्त्रण कैला ॥ 246 ॥ निज घरे लञा प्रभुरे भिक्षा कराइल। भट्टाचार्ये चन्द्रशेखर निमन्त्रण कैल॥ 247 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके आगमनके विषयमें सुनकर श्रीतपनमिश्र श्रीचन्द्रशेखरके घरपर आकर उनसे मिले। वहाँपर वार्तालाप करनेके बाद उन्होंने महाप्रभुको अपने घर आनेका निमन्त्रण दिया। श्रीतपनमिश्र महाप्रभुको अपने घरपर ले गये और उन्होंने महाप्रभुको भोजन कराया। श्रीबलभद्र भट्टाचार्यको श्रीचन्द्रशेखरने भोजनका निमन्त्रण दिया॥ 246-247 ॥ काशीमें रहनेके समय तक महाप्रभुको भिक्षा देनेके लिये मिश्रकी आज्ञाकी याचना :- भिक्षा-कराञा मिश्र कहे प्रभु-पाय धरि'। “एक भिक्षा मागि, मोरे देह कृपा करि' ॥ 248 ॥ यावत् तोमार हय काशीपुरे स्थिति। मोर घर बिना भिक्षा ना करिबा कति ॥” 249 ॥ अनुवाद-महाप्रभुको भोजन करानेके बाद श्रीतपन मिश्रने महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंको पकड़कर कहा,-“मैं आपसे एक भिक्षा माँगता हूँ, कृपा करके आप मुझे वह भिक्षा प्रदान कीजिये। जब तक आप काशीमें रहेंगे, मेरे घरके अतिरिक्त अन्य कहीं भी भोजन ग्रहण मत कीजियेगा॥” 248-249 ॥ मायावादी संन्यासियोंके सङ्गको दुःसङ्ग जानकर महाप्रभुके द्वारा भक्तकी प्रार्थनापर सम्मति :- प्रभु जानेन—'दिन पाँच-सात से रहिब। संन्यासीर सङ्गे भिक्षा काँहा ना करिब ॥' 250 ॥ महाप्रभुके द्वारा श्रीतपनमिश्रके घरमें भिक्षा तथा श्रीचन्द्रशेखरके घरमें रहना :- एत जानि' ताँर भिक्षा कैला अङ्गीकार। वासा-निष्ठा कैला चन्द्रशेखरेर घर ॥ 251 ॥ अनुवाद-महाप्रभु जानते थे,—'मैं काशीमें पाँच-सात दिन ही रहूँगा और मायावादी संन्यासियोंके साथ कहींपर भी भिक्षा ग्रहण नहीं करूँगा।' ऐसा जाननेके कारण महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रकी भिक्षाके निमन्त्रणको स्वीकार कर लिया, किन्तु उन्होंने श्रीचन्द्रशेखरके घरमें ही रहनेका निश्चय किया॥ 250-251 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र प्रभु ताँरे स्नेह करि' कृपा प्रकाशिला ॥ 252 ॥ महाप्रभु आइला शुनि' शिष्ट शिष्ट जन। ब्राह्मण, क्षत्रिय आसि' करेन दरशन ॥ 253 ॥ अनुवाद-महाराष्ट्र मिले। महाप्रभुने उन्हें बहुत स्नेह करके कृपा प्रकाशित की। महाप्रभुके आनेका समाचार सुनकर ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाजके सज्जन व्यक्तियोंने आकर उनका दर्शन किया ॥ 252-253 ॥ श्रीरूप-शिक्षाका संक्षेपमें वर्णन :- श्रीरूप-उपरे प्रभुर यत कृपा हैल। अत्यन्त विस्तार-कथा संक्षेपे कहिल ॥ 254 ॥ 218 |