भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1665

उन्नीसवाँ अध्याय 19/254-256 ] अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीपर महाप्रभुकी जितनी श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। कृपा हुई, उस अत्यन्त विस्तृत कथाको मैंने केवल चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 256॥ संक्षेपमें ही वर्णन किया है ॥ 254 ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते मध्यखण्डे श्रीरूपानुग्रहो नाम श्रीरूपशिक्षा-श्रवणसे श्रीचैतन्यचरणोंमें प्रेमभक्ति-प्राप्ति :- ऊनविंश-परिच्छेदः। श्रद्धा करि' एइ कथा सुने येइ जने। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी प्रेमभक्ति पाय सेइ चैतन्य-चरणे ॥ 255 ॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 256 ॥ अनुवाद—श्रद्धापूर्वक जो व्यक्ति इस कथाका श्रवण करता है, उसे श्रीचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्यखण्डमें श्रीरूपानुग्रह-नामक उन्नीसवें प्रेमभक्तिकी प्राप्ति होती है ॥ 255 ॥ अध्यायका अनुवाद समाप्त। । 219