श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1658, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/204-209 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अधोक्षज कहते हैं। उन्होंने जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही नरदेहको स्वीकार किया ॥ 204 ॥ (2) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको श्रीदामादिके द्वारा सखा-मानना :- श्रीमद्भागवत (10/18/24)में- उवाह भगवान् कृष्णः श्रीदामानं पराजितः। वृषभं भद्रसेनश्च प्रलम्बो रोहिणीसुतम् ॥ 205 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 205 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-भगवान् श्रीकृष्णने पराजित होकर श्रीदामको कन्धेपर चढ़ाया; भद्रसेनने वृषभको उठाया तथा प्रलम्बने रोहिणीपुत्र श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ अनुभाष्य-ब्रजवनमें गोचारणके समय श्रीराम-कृष्णको चुरानेके लिये कपट-वेशी गोपरूपी प्रलम्बासुरको आते देखकर श्रीकृष्ण उसे मोहित करके गोचारण करते-करते श्रीकृष्णपक्षीय और श्रीरामपक्षीय सखाओंको परस्पर स्पर्द्धा क्रीड़ामें मत्त कराके भाण्डीरवनमें पहुँचे। तब श्रीकृष्णपक्षीय सखाओंकी हारके कारण अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार उनकी श्रीरामपक्षीय सखाओंको उठाकर ले जानेकी चेष्टाका वर्णन, - भगवान् कृष्णः पराजितः (सन्) श्रीदामानं, भद्रसेनः वृषभं, प्रलम्बः (गोपबालकवेषी कपटी असुरः) रोहिणीसुतं (भावि-तन्मृत्यूरुपं बलदेवम्) उवाह। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। प्रलम्बने अपने भावी-मृत्यूरुप श्रीबलदेवको उठाया ॥ 205 ॥ (3) श्रीराधाके द्वारा स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको अपने वशीभूत कान्त समझना :- श्रीमद्भागवत (10/30/37-39)में- सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठां सर्वयोषिताम्। हित्वा गोपीः कामयाना मामसौ भजते प्रियः॥ 206 ॥ ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्। न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥ 207 ॥ एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धमारुह्यतामिति। ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत ॥ 208 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 206-208 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य- "काम ही जिन गोपियोंका वनमें आनेका कारण है, उन गोपियोंका परित्याग करके ये प्रिय कृष्ण मेरा भजन कर रहे हैं" - ऐसे अहङ्कारके कारण श्रीराधिकाने (स्वयंको सभी गोपियोंसे श्रेष्ठा जानकर अन्तमें) वनमें जाकर श्रीकृष्णसे कहा, - "हे कृष्ण, मैं और चल नहीं पा रही हूँ, तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, मुझे वहाँ ले चलो।" श्रीराधिकाके ऐसे कहनेपर श्रीकृष्णने कहा, - "मेरे कन्धेपर चढ़ो।" इतना कहकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर वे श्रीकृष्णवधु श्रीराधिका अनुताप करने लगीं ॥ 206-208 ॥ अनुभाष्य-रासलीलासे केवलमात्र श्रीमती राधिकाको लेकर श्रीकृष्णके अन्तर्धान होनेपर श्रीमतीको अहङ्कार होनेपर उनकी गर्वोक्ति, - असौ प्रियः (कृष्णः) कामयाना (कामो यानम् आगमन- साधनं यासां ताः) गोपीः (सर्वाः) हित्वा (परित्यज्य) मां (राधिकां) भजते इति दृप्ता (गर्विता सती) सा (राधिका) आत्मानं (स्वां) सर्वयोषितां (सकलगोपीनां मध्ये) वरिष्ठां (श्रेष्ठां) मेने; ततः (एवमभिमानान्तरं) वनोद्देशं (कानन-प्रदेशविशेषं) गत्वा “अहं चलितुं न पारये (शक्नोमि, अतः) यत्र (स्थाने) ते (तव) गन्तुं मनः (अभिलाषः), [तत्र हे केशव,] मां नय (वह)", इति सा केशवम् अब्रवीत्। एवम् उक्तः [सन् सः श्रीकृष्णः तां] प्रियां (राधिकां) [मम] स्कन्धम् आरुह्यताम् इति आह; ततः [लीला-विलासी] कृष्णः च अन्तर्दधे (अन्तर्हितः आसीत्); [तद्दृष्ट्वा] सा वधू (राधिका) च अन्वतप्यत (अनुतापवती)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 206-208 ॥ श्रीमद्भागवत (10/31/16)में- पतिसुतान्वयभ्रातृबान्धवान अतिविलङ्घ्य तेऽन्त्यच्युतागताः। गतिविदस्तवोद्गीतमोहिताः कितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥ 209 ॥ 212 |