श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्नीसवाँ अध्याय 19/201-204 ]
वलयानि यस्मात् तस्मात्) हस्तात् व्यजनं (वीजनयन्त्रं) पपात। विक्लवधियः (विक्ल्वा अवशा धीः यस्याः तस्याः) देहः च सहसा एव मुह्यन् केशान् प्रविकीर्य (इतस्ततः विक्षिप्य) वातविहता (वायुताड़िता) रम्भा (कदलीवृक्षः) इव पपात। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 201 ॥ ब्रजमें ऐश्वर्यहीन केवला-रतिसे श्रीकृष्णको अपने वशयोग्य समझना :- ‘केवला’र शुद्धप्रेम ‘ऐश्वर्य’ ना जाने। ऐश्वर्य देखिले निजसम्बन्ध ना माने॥ 202 ॥ अनुवाद-‘केवला’ रतिवालोंका शुद्धप्रेम श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको नहीं मानता। श्रीकृष्णका ऐश्वर्य देखनेपर भी केवला-रति भक्त उस ऐश्वर्यसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानते हैं॥ 202 ॥ अनुभाष्य-ऐश्वर्य-प्रधान भक्त केवला-रतिके शुद्ध प्रेमके माहात्म्यको नहीं समझ सकते। भगवान्के ऐश्वर्यको देखनेपर भी केवला-रतिपरायण भक्त उससे अपना सम्बन्ध स्वीकार नहीं करते हैं॥ 202 ॥ (1) स्वयं भगवान् श्रीकृष्णको यशोदाके द्वारा अपना पुत्र समझना :- श्रीमद्भागवत (10/8/45)में- त्रय्या चोपनिषद्भिश्च सांख्ययोगैश्च सात्वतैः। उपगीयमानमाहात्म्यं हरिं सामन्यतात्मजम्॥ 203 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 203 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीनों वेदों, उपनिषद्-समूह, सांख्ययोग और भक्तिशास्त्रोंके द्वारा जिनके माहात्म्यका गान किया जाता है, उन श्रीकृष्णको यशोदा अपना ‘पुत्र’ समझती हैं॥ 203 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्णके मुखमें ऐश्वर्यमय विश्वरूपको देखकर यशोदामें तत्त्वज्ञानके कारण सम्भ्रम-बुद्धि आते ही पुनः श्रीकृष्णकी इच्छासे उनके सहज ममता-प्रबल हृदयमें श्रीकृष्णस्नेह गाढ़ होकर वर्धित हो गया- त्रया (कर्मोपासनामयैः ऋग्यजुःसाम-वेदैः) [इन्द्रादिरूपेण इति], उपनिषद्भिः (वेदोत्तर-ज्ञानकाण्डात्मक-श्रुतिभिः) ['ब्रह्म' इति], सांख्यैः ['पुरुषः' इति], योगैः ['परमात्मा' इति], सात्वतैः (पञ्चरात्रागमैः) ['भगवान्' इति] उपगीयमान-माहात्म्यम् (उपगीयमानम् ईड्यमानं माहात्म्यं यस्य तं) हरिं सा (केवलरतिविशिष्टा यशोदा) आत्मजं (तनयम्) अमन्यत। श्लोक-भावानुवाद-इन्द्रादि देवताओंकी उपासना- प्रधान कर्मकाण्ड उपासनामय ऋक्-यजु-साम-तीनों वेद (यज्ञपुरुषरूपमें), ब्रह्म-विषयक वेदोंसे श्रेष्ठ ज्ञानकाण्डात्मक श्रुतियाँ (ब्रह्मरूपमें), सांख्य (पुरुषरूपमें), योग (परमात्मारूपमें), सात्वत अर्थात् नारद-पञ्चरात्रादि भक्तियोगशास्त्र (भगवान्रूपमें) जिनकी महिमाका गान करते हैं, उन परमपुरुष श्रीहरिको केवलारतियुक्त यशोदाने अपना पुत्र ही माना॥ 203 ॥ श्रीमद्भागवत (10/9/14)में :- तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्यलिङ्गमधोक्षजम्। गोपीकोलूलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं यथा॥ 204 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 204 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-साधारण मरणशील मनुष्यकी भाँति व्यक्त, उस अव्यक्त और इन्द्रियोंसे अतीत अधोक्षज-वस्तुको (भगवान्को) यशोदाने अपना गर्भजात पुत्र मानकर साधारण बालककी भाँति रस्सीके द्वारा ओखलीसे बाँध दिया॥ 204 ॥ अनुभाष्य-माताके स्नेहका दर्शन करानेके लिये लीलामय श्रीकृष्णने यशोदा-भवनमें ही दहीकी मटकीको फोड़कर चोरी करके माखन खाना आरम्भ किया, जिसे देखकर क्रोधित यशोदाके व्यवहारका वर्णन- अव्यक्तं (जड़ेन्द्रियाद्यविषयम्) अधोक्षजम् (अधःकृतम् अक्षजम् इन्द्रियज-ज्ञानं येन तं स्वयं भगवन्तं) मर्त्यलिङ्गं (जीवानुकम्पया स्वीकृत-नरतनुम्) आत्मजं (पुत्रं) मत्वा गोपिका (यशोदा) प्राकृतं बालकं [माता] यथा, (तथा) दाम्ना (रज्जुना) उलुखले (उदूखले) बबन्ध (बन्धनार्थं यत्नवती आसीत्)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें। इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञान जिन तक पहुँच नहीं सकता, उन्हें
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