भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1656, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1656

[ 19/197-201 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्लोक-भावानुवाद-जब बलदेव और कृष्णने देवकी और वसुदेवके चरण स्पर्श करके उनकी वन्दना की, तब उन दोनों पुत्रोंको जगदीश्वर जानकर कुछ भयभीत होकर वे उनको आलिङ्गन नहीं कर पाये, अपितु हाथ जोड़कर उनके सम्मुख खड़े रहे ॥ 197 ॥ (2) सख्य-रतिमें अर्जुन :- कृष्णेर विश्वरूप देखि' अर्जुनेर हैल भय। सख्यभावे धार्थ्य क्षमापय करिया विनय ॥ 198 ॥ अनुवाद- श्रीकृष्णके विश्वरूपको देखकर अर्जुन भयभीत हो गये और अपने द्वारा पहले सख्यभावमें की गयी धृष्टताके लिये श्रीकृष्णसे दीनतापूर्वक क्षमा-याचना की ॥ 198 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता [11/41 (तीन चरण)- 42 (अन्तिम चरण)] :- सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥ 199 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सखा मानकर आपकी महिमाको नहीं जाननेके कारण मैंने हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, - इस प्रकारके शब्दोंके उपयोगके द्वारा बलपूर्वक जो-जो आपको कहा है, हे अप्रमेय-स्वरूप [अचिन्त्य-प्रभाव-स्वरूप] ! मैं आपसे उसे क्षमा करनेकी प्रार्थना करता हूँ॥ 199 ॥ अनुभाष्य- तव इदं [विराड्रूपं] महिमानं (महत्त्वम्) अजानता (अनुन्भवता) मया [प्रमादात् प्रणयेन् वा अपि] सखा इति मत्वा [त्वां प्रति] प्रसभं (हठात्) हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे, इति यत् उक्तं (कथितं) [यत् च असत्कृतः असि] अहम् अप्रमेयम् (अचिन्त्यप्रभावं) तत् (सर्ववचन-रूपम् असत्कार-रूपं अपराधजातं वा) क्षामये (क्षमां कारयामि, त्वं क्षमस्व इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 199 ॥ (3) मधुर रतिमें रुक्मिणी :- कृष्ण यदि रुक्मिणीरे कैला परिहास। 'कृष्ण छाड़िबेन'-जानि' रुक्मिणीर हैल त्रास ॥ 200 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णने जब रुक्मिणीके साथ परिहास किया, तब 'कृष्ण मुझे छोड़ देंगे'-ऐसा सोचकर रुक्मिणीके मनमें भय हो गया ॥ 200 ॥ प्रमाण वचन :- श्रीमद्भागवत (10/60/24)में- तस्याः सुदुःखभय-शोक-विनष्ट-बुद्धे- र्हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात। देहश्च विक्लवधियः सहसैव मुह्यन् रम्भेव वातविहता प्रविकीय्यं केशान् ॥ 201 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 201 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-द्वारकामें रुक्मिणीके साथ श्रीकृष्णके परिहास करनेपर दुःख, भय और शोकके कारण रुक्मिणीकी विचारशक्ति लुप्त हो गयी, वियोगकी सम्भावनासे वे इतनी दुबली हो गयीं कि उनके हाथसे कङ्कन तक खिसक गया, हाथका चँवर भी गिर पड़ा, केश बिखर गये और आँधीसे गिरे केलेके वृक्षकी भाँति उनकी देह सहसा विकल होकर मोहको प्राप्त हो गयी ॥ 201 ॥ अनुभाष्य-एक बार अपने घरमें रुक्मिणीने अपने हाथोंसे श्रीकृष्णकी सेवा आरम्भ की। तब श्रीकृष्णने उनके अनुरागकी परीक्षा करनेकी इच्छासे परिहास करते हुए स्वयंको दीन, निष्किञ्चन और उदासीन कहकर रुक्मिणीके प्रणयके सम्पूर्ण अयोग्य-पात्रके रूपमें वर्णन करके उन्हें उनका सङ्ग छोड़कर अन्यत्र प्रणय स्थापित करनेके लिये कहा। इसे सुनकर कृष्णैकप्राणा रुक्मिणीकी तात्कालिक अवस्थाका वर्णन,- सुदुःखभयशोकविनष्टबुद्धेः (सुदुःखम् अत्यन्तदुःखम् अप्रिय- श्रवणात्, भयं त्यागशङ्कया, शोकः अनुतापः तैः विनष्टा बुद्धिः यस्याः रुक्मिण्याः तस्याः) श्लथद्वलयतः (श्लथन्ति पतन्ति 210