भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1667, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1667

बीसवाँ अध्याय कथासार—जब श्रीसनातन गोस्वामी गौड़देशकी कारागारमें बन्द थे, तब श्रीरूपगोस्वामीने उन्हें पत्रमें लिखा,—‘महाप्रभु मथुरा गये हैं।’ श्रीसनातनने कारागारके रक्षकको मीठे वचन कहकर सात हजार मुद्राएँ दीं और गङ्गा पार करके पलायन कर गये। साथी ईशानके पास आठ स्वर्णमुद्राएँ होनेके कारण पातड़ा-पर्वतके जमींदारने उन मुद्राओंको हरण करनेकी आशासे श्रीसनातनका आतिथ्य-सत्कार किया। ईशानसे पूछनेपर श्रीसनातनको पता चला कि उसके पास स्वर्णमुद्राएँ हैं। उन मुद्राओंको अनर्थरूप जानकर उन्हें जमींदारको देकर उन्होंने पर्वतमय देशको पार किया। पर्वत पार करके श्रीसनातनने ईशानको देश जानेके लिये विदायी दी। हाजिपुर पहुँचनेपर उनके बहनोई राजकर्मचारी श्रीकान्त उनसे मिले और समस्त वृत्तान्त सुनकर उन्हें गङ्गा पार करा दी। तब श्रीसनातन चलते-चलते काशीधाममें आकर श्रीचन्द्रशेखरके द्वारपर पहुँचे; महाप्रभुने उन्हें बुलवाया और उनके प्रति कृपा दिखलाते हुए उन्हें वेश बदलने और भद्र (सज्जन) व्यक्तिकी भाँति दिखने आज्ञा दी। श्रीसनातन केश मुँड़वाकर और स्नान करके आये एवं उन्होंने श्रीतपनमिश्रके द्वारा दिये गये पुराने वस्त्रको कौपीन और बहिर्वास बनाकर पहन लिया। बादमें उन्होंने अपने साथ लाये मूल्यवान कम्बलको गङ्गातटपर एक फटे-पुराने चिथड़ेसे बदलकर उसे धारण करके महाप्रभुको आनन्दित किया। श्रीसनातनने वहाँ रहकर जब महाप्रभुसे तत्त्वकी जिज्ञासा की, तब महाप्रभुने पहले ‘जीवके स्वरूप’ और ‘श्रीकृष्णशक्ति’के विषयमें समझाया, बादमें सम्बन्ध-ज्ञान सिखलाकर अभिधेय-रूपा भक्तिकी व्याख्या की। श्रीकृष्णके स्वरूप-विचारमें ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्‌का विचार, स्वयंरूप और तदेकात्म और आवेश, उनमें ‘वैभव’ और ‘प्रभाव’-विलास आदिके विचारसे भगवान्‌की मूर्तियोंके भेद आदिके विषयमें बतलाया; उसके बाद पुरुषावतारके माया-वैभव, मन्वन्तरावतार, गुणावतार, शक्त्यावेशावतार और बाल्य-पौगण्ड-अवस्थाके भेदसे सभी लीलाओं एवं किशोर-लीलाकी नित्यताकी व्याख्या की। —(अमृतप्रवाह भाष्य) वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्रीचैतन्यमहाप्रभुम्। नीचोऽपि यत्प्रसादात् स्याद्भक्तिशास्त्रप्रवर्त्तकः॥ 1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपासे नीच व्यक्ति भी भक्तिशास्त्रका प्रवर्त्तक हो सकता है, उन अनन्त-अद्भुत- ऐश्वर्यसे युक्त श्रीचैतन्यमहाप्रभुकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1॥ अनुभाष्य— यत्प्रसादात् (यस्य कृपया) नीचः (विषयी) अपि भक्ति-शास्त्र-प्रवर्त्तकः (भक्तिशास्त्रलेखकः) स्यात्, तम् अनन्ताद्भुतैश्वर्यम् (अशेषापूर्व्वैश्वर्यपूर्णं) श्रीचैतन्यमहाप्रभुम् अहं वन्दे। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 1॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥ 2॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुकी जय हो, श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, श्रीअद्वैतचन्द्र प्रभुकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ 2॥ बन्दी श्रीसनातनको श्रीरूपके द्वारा लिखित पत्र-प्राप्ति :- एथा गौड़े सनातन आछे बन्दिशाले। श्रीरूप-गोसाञिर पत्री आइल हेनकाले॥ 3॥ अनुवाद—जब श्रीसनातन गौड़देशमें कारागारमें बन्द । 221

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