श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1668, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/3-13 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला थे, तब उनके पास श्रीरूप-गोस्वामीका एक पत्र आया॥ ३॥ अमृतप्रवाह भाष्य- 'पत्री' - उद्भटचन्द्रिका-ग्रन्थके टीकाकारने लिखा है कि निम्नलिखित श्लोक श्रीरूपने बाक्लासे लिखकर गौड़देशके कारागारमें श्रीसनातनके पास भेजा था। इस श्लोकमें महाप्रभुके मथुरा जानेका सङ्केत होनेके कारण इसे श्रीरूप गोस्वामीकी पत्री कहकर विश्वास किया जा सकता है- “यदुपतेः क्व गता मथुरापुरी, रघुपतेः क्व गतोत्तरकोशला। इति विचिन्त्य कुरुष्व मनः स्थिरं, न सदिदं जगदित्यवधारय॥” [अर्थात् “यदुपतिकी मथुरापुरी कहाँ गयी है, रघुपतिकी ही उत्तरकोशला (अयोध्या) कहाँ गयी है-इसपर विशेषरूपसे चिन्ता करके मन स्थिर कीजिये और यह दृश्यमान् जगत् नित्य नहीं है, - इससे अवगत होइये।”]॥३॥ श्रीसनातनका आनन्द और कारागार-रक्षककी प्रशंसा :- पत्री पाञा सनातन आनन्दित हैला। यवन-रक्षक-पाश कहिते लागिला ॥ 4 ॥ “तुमि एक जिन्दापीर महाभाग्यवान्। केताब-कोराण-शास्त्रे आछे तोमार ज्ञान॥5॥ एक बन्दी छाड़े यदि निज-धर्म देखिया। संसार हइते तारे मुक्त करेन गोसाञा ॥ 6 ॥ प्रत्युपकारकी प्रार्थना :- पूर्वे आमि तोमार करियाछि उपकार। तुमि आमा छाड़ि' कर प्रत्युपकार ॥ 7 ॥ शुद्धहरिभजनके लिये लौकिक सुनीतिके विचारसे घृणित चेष्टाकी भी श्रीसनातनके द्वारा अनुकूलरूपमें नियुक्ति - यही सत्य-धर्म :- पाँच सहस्र मुद्रा दिब, तुमि कर अङ्गीकार। पुण्य, अर्थ,-दुइ लाभ हइबे तोमार ॥” 8 ॥ अनुवाद-पत्रको प्राप्त करके श्रीसनातन बहुत प्रसन्न हुए। तब वे कारागार-अध्यक्षके पास गये और उनसे कहा, - “आप एक जिन्दापीर हैं और महासौभाग्यशाली हैं। आपको कुरान और अन्य शास्त्रोंका पूर्ण ज्ञान भी है। यदि कोई अपने धर्मका पालन करते हुए किसी एक बन्दीको मुक्त कर देता है, तब फिर खुदा उसे संसारसे मुक्त कर देते हैं। पहले मैंने आपके ऊपर उपकार किया था और अब मैं कठिनाईमें हूँ, इसलिये आप मुझे कारागारसे मुक्त करके उसका प्रत्युपकार करो। मैं आपको पाँच हजार स्वर्ण मुद्राएँ भी दूँगा, आप उसे स्वीकार करें। मुझे छोड़नेसे आपको पुण्य और धन-इन दोनोंकी प्राप्ति होगी॥” 4-8॥ अनुभाष्य - 'जिन्दापीर' - जीवित पीर । 'गोसाञा' - खुदा, भगवान् ॥ 5-6 ॥ कारागार-रक्षकको राजाका भय :- तबे सेइ यवन कहे, - “शुन, महाशय। तोमारे छाड़िब, किन्तु करि राजभय ॥”9॥ अनुवाद-तब उस यवनने कहा, - “सुनो, महाशय ! मैं आपको छोड़ना तो चाहता हूँ, किन्तु मुझे बादशाहका भय है॥”9॥ श्रीसनातनके द्वारा परामर्श देना :- सनातन कहे, - “तुमि ना कर राजभय। दक्षिण गियाछे, यदि लेउटि' आओयय॥ 10॥ ताँहारे कहिओ-सेइ बाह्यकृत्ये गेल। गङ्गार निकट गङ्गा देखि झाँप दिल ॥ 11 ॥ अनेक देखिल, तार लाग् ना पाइल। दाड़ुका-सहित डुबि काँहा बहि' गेल॥ 12 ॥ किछु भय नाहि, आमि ए-देशे ना रब। दरवेश हञा आमि मक्काके याइब ॥ ”13॥ अनुवाद - श्रीसनातनने उससे कहा, - “आप बादशाहका भय मत कीजिये। अभी तो वे दक्षिणमें युद्ध करनेके लिये गये हैं, जब वे लौटकर आयेंगे, तो उनसे कहना - वे (साकर मल्लिक) गङ्गाके निकट मलत्याग करनेके लिये गङ्गा तटपर गये थे और 222 ।