भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1669

बीसवाँ अध्याय 20/10-23 ] गङ्गाको देखकर उन्होंने उसीमें छलाँग लगा दी। हमने उन्हें बहुत खोजा, किन्तु उनका कहीं भी पता नहीं चला। वे बेड़ीके साथ ही डूबकर न जाने कहाँ बह गये? आपको भय करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इस गौड़देशमें नहीं रहूँगा, दरवेश (फकीर) बनकर मक्कामें चला जाऊँगा॥" 10-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'दाड़ुका'—बेड़ी॥ 12॥ अनुभाष्य—'लेउटि' आओयय'—लौट आनेपर। यह पश्चिम भारतकी हिन्दी भाषा है॥ 10॥ परन्तु कारागार-रक्षक इससे सन्तुष्ट नहीं होनेपर उसे और अधिक रिश्वत-देनेकी चेष्टा :- तथापि यवन-मन प्रसन्न ना देखिला। सात-हाजार मुद्रा तार आगे राशि कैला॥ 14॥ अनुवाद—इस प्रस्तावसे भी उस यवनके मनको सन्तुष्ट नहीं देखकर श्रीसनातनने सात हजार मुद्राएँ उसके आगे रख दीं॥ 14॥ श्रीसनातनकी कारागारसे मुक्ति :- लोभ हइल यवनेर मुद्रा देखिया। रात्रे गङ्गापार कैल दाडुका काटिया॥ 15॥ अनुवाद—उन मुद्राओंको देखकर उस यवनमें लोभ जाग उठा। उसने रात्रिके समय श्रीसनातन गोस्वामीकी बेड़ियोंको काटकर उन्हें गङ्गा पार करने दी॥ 15॥ ईशानके साथ श्रीसनातनका पातड़ा-पर्वतपर आगमन :- गड़द्वार-पथ छाड़िला, नारे ताँहा याइते। रात्रि-दिन चलि' आइला पातड़ा-पर्वते॥ 16॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी इस प्रकार कारागारसे मुक्त हो गये, परन्तु वे किलोंके सामने राजमार्गसे नहीं जा सकते थे, इसलिये उस मार्गको उन्होंने छोड़ दिया। वे रात-दिन चलते-चलते पातड़ा-पर्वतपर आ पहुँचे॥ 16॥ (लुटेरे) जमींदारके साथ भेंट :- तथा एक भौमिक हय, तार ठाञि गेला। 'पर्वत पार कर आमाय'—विनति करिला॥ 17॥ अनुवाद—वहाँपर एक जमींदार रहता था, श्रीसनातन गोस्वामी उसके पास गये और उससे विनती की—'आप हमें पर्वत पार करा दीजिये॥' 17॥ जमींदारको ज्योतिषीसे श्रीसनातनके पास धन होनेका पता चलना और श्रीसनातनकी हत्याका सङ्कल्प :- सेइ भूञार सङ्गे हय हातगणिता। भूञार काणे कहे सेइ जानि' एइ कथा॥ 18॥ “इँहार ठाञि सुवर्णेर अष्ट मोहर हय।” शुनि' आनन्दित भूञा सनातने कय॥ 19॥ श्रीसनातनका जमींदारके द्वारा आदर-सम्मान; श्रीसनातनका स्नान और भोजन :- “रात्र्ये पर्वत पार करिब निज-लोक दिया। भोजन करह तुमि रन्धन करिया॥” 20॥ अनुवाद—उस जमींदारके साथमें एक ज्योतिषी था। उस ज्योतिषीने जमींदारके कानमें कहा,—“इनके पास सोनेकी आठ मोहरें हैं।” यह बात सुनकर जमींदारने प्रसन्न होकर श्रीसनातन गोस्वामीसे कहा,—“रातमें मैं अपने लोगोंको आपके साथ भेजकर आपको पर्वत पार करा दूँगा। अभी आप रसोई बनाकर भोजन ग्रहण कीजिये॥” 18-20॥ एत बलि' अन्न दिल करिया सम्मान। सनातन आसि' तबे कैल नदीस्नान॥ 21॥ दुइ उपवासे कैला रन्धन-भोजने। राजमन्त्री सनातन विचारिला मने॥ 22॥ श्रीसनातनको सन्देह और आशङ्का, ईशानसे धनके विषयमें जानना :- 'एइ भूञा केने मोरे सम्मान करिल?' एत चिन्ति' सनातन ईशाने पुछिल॥ 23॥ । 223