भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1635

उन्नीसवाँ अध्याय 19/121-131 अपने अनुरूप, - ऐसे अपने विलासरूप श्रीरूप गोस्वामीमें महाप्रभुने (भक्तिरस शास्त्रका) विस्तार किया था ॥ 121 ॥ अनुभाष्य- प्रियस्वरूपे (प्रियः भक्तः तत्स्वरूपः यः तस्मिन् भक्तरूपे) दयितस्वरूपे (दत्तम् आत्मस्वरूपं यस्मै तस्मिन्) प्रेमस्वरूपे (प्रेममय-निजाभिन्न-रूपे) सहजाभिरूपे (सहजं स्वाभाविकम् अभिरूपं मनोज्ञं रूपं यस्य तस्मिन्) निजानुरूपे (प्रेमप्रकाशकतया सदृशं रूपं यस्य तस्मिन्) एकरूपे (एकं मुख्यं रूपं यस्य तस्मिन्) स्वविलासकूपे (स्वस्य स्वस्वरूपस्य विलासः लीलार्थं रूपं यस्य तस्मिन्) रूपे (श्रीरूप-गोस्वामिनि) प्रभुः (श्रीमन्महाप्रभुः) ततान (श्रीरूपद्वारेव भक्तिरसशास्त्रं प्रकाशितवान्)। श्लोक-भावानुवाद-प्रिय भक्त स्वरूप है जिनका, उन भक्तरूप, जिन्हें महाप्रभुने अपना स्वरूप दे दिया है, जो प्रेममय महाप्रभुसे अभिन्नरूप हैं, स्वाभाविक मनोज्ञ रूप है जिनका, प्रेमका प्रकाश होनेके कारण महाप्रभुके जैसा रूप है जिनका, जो महाप्रभुका ही एक मुख्य रूप हैं और अपने स्वरूपका विलास करनेके लिये अर्थात् लीला करनेके लिये जिनका रूप है, ऐसे श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा महाप्रभुने भक्तिशास्त्रोंको प्रकाशित करवाया ॥ 121 ॥ एइमत कर्णपूर लिखे स्थाने-स्थाने। प्रभु कृपा कैला यैछे रूप-सनातने ॥ 122 ॥ अनुवाद-इस प्रकार श्रीकविकर्णपूरने स्वरचित ग्रन्थमें स्थान-स्थानपर महाप्रभुने जिस प्रकार श्रीरूप-सनातनपर कृपा की थी, उसका वर्णन किया है ॥ 122 ॥ अनुभाष्य- 'स्थाने स्थाने'-श्रीचैतन्यचन्द्रोदय ग्रन्थमें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर ॥ 122 ॥ श्रीरूप-सनातन-सभी श्रीगौरभक्तोंके सर्वाधिक प्रिय :- महाप्रभुर यत बड़ बड़ भक्त मात्र। रूप-सनातन-सबार कृपा-गौरव-पात्र ॥ 123 ॥ अनुवाद-श्रीरूप-सनातन महाप्रभुके सभी बड़े-बड़े भक्तोंके कृपा तथा गौरवके पात्र थे ॥ 123 ॥ सभीके आदरका दृष्टान्त; वृन्दावन दर्शन करनेवालोंसे श्रीरूप-सनातनके सम्बन्धमें आग्रहपूर्वक जिज्ञासा :- केह यदि देशे याय देखि' वृन्दावन। ताँरे प्रश्न करेन प्रभुर पार्षदगण ॥ 124 ॥ “कह,-ताँहा कैछे रहे रूप-सनातन? कैछे रहे, कैछे वैराग्य, कैछे भोजन ? ॥ 125 ॥ कैछे अष्टप्रहर करेन श्रीकृष्ण-भजन?” तबे प्रशंसिया कहे सेइ भक्तगण ॥ 126 ॥ श्रीरूप-सनातनके वैराग्ययुक्त-भक्तिरसके पानकी मत्तताका वर्णन :- "अनिकेत दुँहे, वने यत वृक्षगण। एक एक वृक्षेरे तले एक एक रात्रि शयन ॥ 127 ॥ विप्रगृहे स्थूलभिक्षा, काँहा माधुकरी। शुष्क रुटी-चाना चिबाय, भोग परिहरि' ॥ 128 ॥ करों या-मात्र हाते, काँथा, छिँड़ा-बहिर्वास। कृष्णकथा, कृष्णनाम, नर्त्तन-उल्लास ॥ 129 ॥ अष्टप्रहर कृष्णभजन, चारिदण्ड शयने। नाम-सङ्कीर्त्तन-प्रेमे सेह नहे कोन दिने ॥ 130 ॥ कभु भक्तिरसशास्त्र करये लिखन। चैतन्यकथा शुने, करे चैतन्य-चिन्तन ॥ " 131 ॥ अनुवाद-जो कोई भी श्रीवृन्दावनके दर्शन करके अपने गाँवमें पहुँचता, उससे महाप्रभुके परिकर प्रश्न करते, - "बतलाओ तो, वहाँ रूप और सनातन कैसे रहते हैं? वे क्या करते हैं? उनका वैराग्य कैसा है? वे क्या भोजन करते हैं? वे कैसे अष्टप्रहर श्रीकृष्णका भजन करते हैं?" तब वृन्दावनसे लौटा भक्त श्रीरूप-सनातनकी प्रशंसा करते हुए कहता, - "दोनोंका ही रहनेका कोई निर्दिष्ट स्थान नहीं है। वे दोनों एक-एक वृक्षके नीचे एक-एक रात्रि व्यतीत करते हैं। वे कभी तो ब्राह्मणके घरमें स्थूल भिक्षा ग्रहण करते हैं और कभी कहींपर माधुकरी माँगकर खा लेते हैं। । 189