भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1671

बीसवाँ अध्याय 20/33-43 ] अनुवाद—तब जमींदारने श्रीसनातन गोस्वामीके साथ चार सेवक भेजे। रात-रातमें वनके मार्गसे उन्होंने पर्वत पार किया॥33॥ श्रीसनातनके द्वारा ईशानसे बचे हुए धनका पूछना और देशमें भेजना :— पार हञा गोसाञि तब पुछिला ईशाने। “जानि, —शेष द्रव्य किछु आछे तोमा-स्थाने ॥” 34॥ ईशान कहे, —“एक मोहर आछे अवशेष।” गोसाञि कहे, —“मोहर लञा याह' तुमि देश॥” 35॥ अनुवाद—पर्वतको पार करके श्रीसनातन गोस्वामीने ईशानसे पूछा,—“मैं जानता हूँ कि अभी भी कुछ मूल्यवान वस्तु तुम्हारे पास बची है।” ईशानने कहा,—“मेरे पास अब एक मोहर बची है।” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“तुम मोहरको लेकर अपने घर लौट जाओ॥”34-35॥ अकिञ्चन, निसहाय श्रीसनातनका अकेले ही जाना :— तारे विदाय दिया गोसाञि चलिला एकला। हाते करोंया, छिड़ा कान्था, निर्भय हइला ॥ 36 ॥ अनुवाद—ईशानको विदायी देकर श्रीसनातन गोस्वामी अकेले चल दिये। अब उनके हाथमें जलका पात्र और कन्धेपर पुराने वस्त्रोंको जोड़कर बना कम्बल था। श्रीसनातन गोस्वामी अब निश्चिन्त हो गये॥36॥ हाजिपुरमें आगमन :— चलि' चलि' गोसाञि तब आइला हाजिपुरे। सन्ध्याकाले बसिला एक उद्यान-भितरे ॥ 37 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामी चलते-चलते हाजिपुर आ पहुँचे। वे सन्ध्याके समय वे एक उद्यानके अन्दर जाकर बैठे॥ 37॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'हाजिपुर'—गङ्गा-नदीके और गण्डक-नदके सङ्गम स्थलपर पटनाके दूसरी ओर हाजिपुर है॥ 37॥ वहाँ बहनोई राजसेवक श्रीकान्तके साथ भेंट :— सेइ हाजिपुरे रहे, —श्रीकान्त ताहार नाम। गोसाञिर भगिनीपति, करे राजकाम॥ 38॥ तिन लक्ष मुद्रा राजा दियाछे तार स्थाने। घोड़ा मूल्य लञा पाठाय पातसार स्थाने ॥ 39 ॥ अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीके बहनोई श्रीकान्त हाजिपुरमें रहते थे और राजकार्य करते थे। बादशाहने उनके पास तीन लाख स्वर्ण मुद्राएँ भेजी थीं। उस धनसे वे घोड़ोंको खरीदकर बादशाहके पास भेजते थे॥ 38 ॥ श्रीसनातनके साथ वार्तालाप :— टुङ्गिर उपर बसि' सेइ गोसाञिरे देखिल। रात्र्ये एकजने-सङ्गे गोसाञि-पाश आइल ॥ 40 ॥ दुइजने मिलि' तथा इष्टगोष्ठी कैल। बन्धन-मोक्षण-कथा सकलि गोसाञि कहिल ॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीकान्त एक ऊँचे स्थानपर बैठे थे और वहींसे उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको देखा। वे रात्रिके समय एक व्यक्तिको अपने साथ लेकर श्रीसनातन गोस्वामीके पास आये। श्रीकान्त और श्रीसनातन गोस्वामीने मिलकर वहींपर ही वार्तालाप किया। श्रीसनातन गोस्वामीने अपने कारागारसे छूटनेकी सारी बात उन्हें बतलायी ॥ 40-41 ॥ श्रीकान्तका श्रीसनातनको वहाँ रहनेके लिये अनुरोध :— तेंहो कहे,—“दिन-दुइ रह एइस्थाने। भद्र हओ, छाड़' एइ मलिन वसने ॥” 42 ॥ श्रीसनातनकी असम्मति और गङ्गा पार करानेका अनुरोध :— गोसाञि कहे, —“एकक्षण इहा ना रहिब। गङ्गा पार करि' देह', एक्षणे चलिब ॥” 43 ॥ अनुवाद—श्रीकान्तने कहा,—“आप दो दिन यहाँपर रहिये। इन मैले वस्त्रोंको त्यागकर सज्जन व्यक्तिकी । 225