भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1672, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1672

[ 20/42-52 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला भाँति वस्त्र पहनो।” श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,-“मैं एक क्षण भी यहाँपर नहीं रहूँगा। आप मुझे गङ्गा पार करा दीजिये, मैं अभी चला जाऊँगा॥” 42-43 ॥ श्रीसनातनको ऊनी कम्बल देना और गङ्गा पार करवाना :- यत्न करि' तैं हो एक भोटकम्बल दिल। गङ्गा पार करि' दिल-गोसाञि चलिल ॥ 44 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामीके मना करनेपर भी बहुत अनुरोध करके श्रीकान्तने उन्हें एक बहुत अच्छा ऊनी कम्बल दिया और गङ्गा पार करा दी। श्रीसनातन गोस्वामी आगे बढ़ चले ॥ 44 ॥ श्रीसनातनका काशीमें आगमन :- तबे वाराणसी गोसाञि आइला कतदिने। शुनि' आनन्दित हइला प्रभुर आगमने ॥ 45 ॥ अनुवाद-कुछ दिनोंमें श्रीसनातन गोस्वामी वाराणसी आ पहुँचे। महाप्रभुके वाराणसीमें आनेके विषयमें सुनकर उन्हें बहुत आनन्द हुआ॥ 45 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके घरपर पहुँचना :- चन्द्रशेखरेर घरे आसि' द्वारेते बसिला। महाप्रभु जानि' चन्द्रशेखरे कहिला ॥ 46 ॥ बाहरी वेशके प्रति निरपेक्ष वास्तविक वैष्णव श्रीसनातनको लानेके लिये शेखरको आदेश :- “द्वारे एक 'वैष्णव' हय, बोलाह ताँहारे।” चन्द्रशेखर देखे, 'वैष्णव' नाहिक द्वारे ॥ 47 ॥ श्रीसनातनके बाहरी वैष्णव-वेशको नहीं देखनेपर लौटकर आना :- “द्वारेते वैष्णव नाहि”—प्रभुरे कहिल। 'केह हय?' करि' प्रभु ताहारे पुछिल ॥ 48 ॥ अनुवाद-श्रीसनातन गोस्वामी श्रीचन्द्रशेखरके घर पहुँचकर बाहर द्वारपर बैठ गये। श्रीसनातन गोस्वामीके आगमनको जानकर महाप्रभुने श्रीचन्द्रशेखरसे कहा, — “द्वारपर एक वैष्णव हैं, उन्हें बुलाकर ले आओ।” श्रीचन्द्रशेखरने जाकर देखा कि द्वारपर तो कोई 'वैष्णव' नहीं है। श्रीचन्द्रशेखरने आकर महाप्रभुसे कहा, – “द्वारपर तो कोई वैष्णव नहीं हैं।” महाप्रभुने उनसे पूछा, 'क्या कोई द्वारपर है?'॥ 46-48 ॥ दरवेश वेशधारी श्रीसनातनको लानेके लिये महाप्रभुका आदेश :- तैं हो कहे,- “एक 'दरवेश' आछे द्वारे।” 'ताँरे आन' प्रभुर वाक्ये कहिल आसि' ताँरे ॥ 49 ॥ श्रीचन्द्रशेखरका श्रीसनातनको 'दरवेश' कहकर सम्बोधन :- “प्रभु तोमाय बोलाय, आइस, दरवेश !” शुनि' आनन्दे सनातन करिला प्रवेश ॥ 50 ॥ श्रीसनातनको देखकर तेजीसे महाप्रभुका आगमन और आलिङ्गन :- ताँहारे अङ्गने देखि' प्रभु धाञा आइला। ताँरे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला ॥ 51 ॥ अनुवाद-श्रीचन्द्रशेखरने कहा,-“द्वारपर एक 'फकीर' है।” महाप्रभुने कहा, - 'उन्हींको ले आओ।' श्रीचन्द्रशेखरने द्वारपर आकर श्रीसनातन गोस्वामीको महाप्रभुके ये वचन कहे, “हे फकीर ! आओ, महाप्रभु तुम्हें बुला रहे हैं।” श्रीचन्द्रशेखरकी बात सुनकर श्रीसनातन गोस्वामी बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने घरके अन्दर प्रवेश किया। श्रीसनातन गोस्वामीको आँगनमें देखकर महाप्रभु दौड़े हुए चले आये और उनको आलिङ्गन करके महाप्रभु प्रेममें आविष्ट हो गये ॥ 49-51 ॥ आलिङ्गनके फलस्वरूप श्रीसनातनमें प्रेम और उनकी दैन्य-उक्ति :- प्रभुस्पर्शे प्रेमाविष्ट हइला सनातन। 'मोरे ना छुइह'-कहे गद्गद-वचन ॥ 52 ॥ अनुवाद-महाप्रभुके स्पर्शसे श्रीसनातन गोस्वामी भी प्रेममें आविष्ट हो गये। श्रीसनातन गोस्वामीने गद्गद वाणीसे कहा, - 'आप मुझे मत छुइये ॥ '52 ॥ 226 ।