भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1673

बीसवाँ अध्याय 20/53-59 ] महाप्रभु और श्रीसनातन, दोनोंका ही प्रेम-क्रन्दन, श्रीचन्द्रशेखरका विस्मय :- दुइजने गलागलि रोदन अपार। देखि' चन्द्रशेखरेर हइल चमत्कार ॥ 53 ॥ अनुवाद—दोनों परस्पर गले लगकर बहुत रोने लगे। उन दोनोंकी ऐसी अवस्थाको देखकर श्रीचन्द्रशेखरको बहुत आश्चर्य हुआ ॥ 53 ॥ स्नेहपूर्वक श्रीसनातनको अपने निकट आसन देना :- तबे प्रभु ताँर हात धरि' लञा गेला। पिण्डार उपरे ताँरे आपन-पाश बसाइला ॥ 54 ॥ अपने हाथोंसे श्रीसनातनके अङ्गोंका मार्जन, श्रीसनातनका दीनतापूर्वक कहना :- श्रीहस्ते करेन ताँर अङ्ग सम्मार्जन। तँहो कहे, — “मोरे, प्रभु, ना कर स्पर्शन ॥” 55 ॥ अनुवाद—तब महाप्रभु श्रीसनातनका हाथ पकड़कर उन्हें अपने साथ ले गये और उन्होंने श्रीसनातन गोस्वामीको अपने निकट चबूतरेपर बैठाया। महाप्रभु अपने श्रीहस्तकमलोंसे श्रीसनातन गोस्वामीके अङ्गोंका सम्मार्जन करने लगे। श्रीसनातन गोस्वामी कहने लगे, — “हे प्रभो, आप मुझे स्पर्श मत कीजिये ॥” 54-55 ॥ महाप्रभुके द्वारा उन्हें महाभागवतके लिये उचित गौरव देना :- प्रभु कहे, — “तोमा स्पर्शि आत्म पवित्रिते। भक्ति-बले पार तुमि ब्रह्माण्ड शोधिते ॥ 56 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा, — “मैं तो अपनेको पवित्र करनेके लिये आपको स्पर्श कर रहा हूँ, क्योंकि आप अपनी भक्तिके बलसे ब्रह्माण्डको पवित्र कर सकते हैं ॥ 56 ॥ श्रीमद्भागवत (1/13/10)में— भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं प्रभो। तीर्थीकुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेन गदाभृता ॥ 57 ॥ अनुवाद—आपके जैसे भागवतजन स्वयं तीर्थस्वरूप हैं। आप लोग अपने अन्तःस्थित भगवान्की पवित्रताके बलसे पापियोंके पापोंके द्वारा मलिन सभी तीर्थोंको पवित्र करते हैं ॥ 57 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 1/63 संख्या देखें ॥ 57 ॥ हरिभक्तिविलास (10/91) में :- न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्वपचः प्रियः। तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥ 58 ॥ अनुवाद—चतुर्वेदपाठी अर्थात् चौबे ब्राह्मण होनेपर ही 'भक्त' होता है, ऐसा नहीं है। मेरा भक्त चण्डाल होनेपर भी मुझे प्रिय है; भक्त ही वास्तवमें दान-पात्र एवं ग्रहण-पात्र है; भक्तमात्र ही मेरे समान पूजनीय है ॥” 58 ॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 19/50 संख्या देखें ॥ 58 ॥ श्रीमद्भागवत (7/9/10) में— विप्राद्द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- पादारविन्दविमुखात् श्वपचं वरिष्ठम्। मन्ये तदर्पित-मनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ 59 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 59 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णके चरणकमलोंसे विमुख बारह-गुणोंसे युक्त ब्राह्मणकी अपेक्षा भी जिसके मन, वचन, चेष्टा, अर्थ और प्राण श्रीकृष्णमें समर्पित हैं, ऐसे चण्डालको भी मैं श्रेष्ठ मानता हूँ; क्योंकि वह (चण्डाल कुलमें उत्पन्न भक्त) अपने कुलको पवित्र करता है, और अत्यधिक सम्मानसे युक्त ब्राह्मण वैसा नहीं कर सकता ॥ 59 ॥ अनुभाष्य—धर्मराज युधिष्ठिरको देवर्षि नारद भगवान् श्रीनृसिंहके द्वारा किये गये हिरण्यकशिपुके वध-वृत्तान्तके वर्णन-प्रसङ्गमें वधके बाद भक्त प्रह्लादके द्वारा किये गये भगवान् नृसिंहके स्तवका वर्णन कर रहे हैं, — । 227