श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1676, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/68-78 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला यह स्वीकार करेंगे कि बाउल-लोग कभी भी श्रीचैतन्य-सम्प्रदायके वैष्णव नहीं कहला सकते। श्रीसनातनको 'फकीर' कहकर उल्लेख करनेसे साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदि अधिकांश लोग मुसलमानके फकीर-वेशको धारण करके उनके जैसे आचार-व्यवहार करते हैं और स्वयंको चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हैं। यदि कोई उनसे पूछे कि तुम लोग प्रायः मुसलमानके फकीरका वेश धारण और उनके जैसा आचार-व्यवहार भी करते हो और चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव कहकर अपना परिचय देते हो, इसका क्या प्रमाण है? इस प्रश्नके उत्तरमें वे कहते हैं कि इसका प्रमाण श्रीसनातन गोस्वामी हैं, वे फकीर थे। किन्तु जब महाप्रभुने श्रीसनातनके दाड़ी-मूँछ और सिरके केश मुण्डन करवाकर वैष्णव-वेश धारण करवाया था, तब उस स्थानपर ही साँई, दरवेश, चरणपाली, दुलालचाँदी आदिका प्रमाण परिसमाप्त हो गया है। इस कारण साँई, दरवेशादि लोगोंका चैतन्य-सम्प्रदाय-वैष्णव होना तो दूर रहे, अपितु उनको एक प्रकार मोहम्मद-सम्प्रदाय ही कहा जाना चाहिये। (—जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिविनोद ठाकुर-कृत 'श्रीश्रीसनातन गोस्वामी प्रभु' प्रबन्ध। श्रीगौड़ीय-पत्रिका, 7वाँ वर्ष, 4र्थ संख्या) ॥ 68-69 ॥ श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें श्रीसनातनकी असम्मति :— सेइ वस्त्र सनातन ना कैल अङ्गीकार। शुनिया प्रभुर मने आनन्द अपार ॥ 71 ॥ अनुवाद—श्रीचन्द्रशेखरके द्वारा लाये गये उन नये वस्त्रोंको श्रीसनातनने स्वीकार नहीं किया। इस बातको सुनकर महाप्रभुके मनमें अपार आनन्द हुआ॥ 71 ॥ दोपहरमें श्रीतपनमिश्रके घरमें महाप्रभुका भोजन, श्रीसनातनको महाप्रभुके उच्छिष्टकी प्राप्ति :— मध्याह्न करिया प्रभु गेला भिक्षा करिवारे। सनातने लञा गेला तपनमिश्रेर घरे ॥ 72 ॥ अनुवाद—दोपहरका स्नान करनेके बाद महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीको अपने साथ लेकर भोजनके लिये श्रीतपन मिश्रके घरपर गये॥ 72 ॥ पादप्रक्षालन करि' भिक्षाते बसिला। “सनातने भिक्षा देह”—मिश्ररे कहिला ॥ 73 ॥ अनुवाद—चरणोंको धोनेके बाद महाप्रभु भोजनके लिये बैठे। महाप्रभुने श्रीतपनमिश्रसे कहा, —“सनातनको भोजन प्रदान करो॥”73 ॥ मिश्र कहे, —“सनातनेर किछु कृत्य आछे। तुमि भिक्षा कर, प्रसाद ताँरे दिब पाछे॥” 74 ॥ अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने कहा, —“सनातनका अभी कुछ कार्य बाकी है। आप भोजन ग्रहण कीजिये, मैं उन्हें बादमें प्रसाद दूँगा॥”74 ॥ भिक्षा करि' महाप्रभु विश्राम करिला। मिश्र प्रभुर शेषपात्र सनातने दिला ॥ 75 ॥ अनुवाद—भोजन करनेके बाद महाप्रभुने थोड़ा विश्राम किया। श्रीतपनमिश्रने महाप्रभुका उच्छिष्ट प्रसाद श्रीसनातन गोस्वामीको दिया॥ 75 ॥ मिश्रके द्वारा दिये नये वस्त्रोंको पहननेमें श्रीसनातनकी आपत्ति :— मिश्र सनातने दिला नूतन वसन। वस्त्र नाहि निला, तेँहो करे निवेदन ॥ 76 ॥ वैष्णव-उच्छिष्ट पुराने वस्त्र-ग्रहण करनेकी श्रीसनातनकी इच्छा :— “मोरे वस्त्र दिते यदि तोमार हय मन। निज परिधान एक देह' पुरातन॥” 77 ॥ एक वस्त्रको दो टुकड़ोंमें बाँटकर बहिर्वास और उसके उपयोगी डोर-कौपीन बनाना :— तबे मिश्र पुरातन एक धुति दिला। तेँहो दुइ बहिर्वास-कौपीन करिला ॥ 78 ॥ 230