श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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बीसवाँ अध्याय 20/76-81 ] अनुवाद—श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको एक नया वस्त्र दिया, परन्तु उन्होंने वह वस्त्र नहीं लिया। उन्होंने श्रीतपनमिश्रसे निवेदन किया, — “यदि आपकी मुझे वस्त्र देनेकी इच्छा ही है, तो फिर मुझे अपना पहना हुआ एक पुराना वस्त्र दीजिये।” तब श्रीतपनमिश्रने श्रीसनातन गोस्वामीको अपनी व्यवहार की गयी एक पुरानी धोती दी। श्रीसनातन गोस्वामीने उस धोतीको फाड़कर उसमेंसे ही दो बहिर्वास और दो डोर-कौपीन बनाये॥ 76-78 ॥ अमृतानुकणा—इस जगत्में अपनी इन्द्रियोंके द्वारा प्राप्त ज्ञानको श्रेष्ठ माननेवालोंके लिये वर्ण-चिह्न और आश्रम-चिह्नकी व्यवस्था पूर्ण रूपसे अनावश्यक नहीं है। तो भी बहुत बार ऐसे लोग चिह्नमात्र देखनेसे धोखा खा जाते हैं। जिस प्रकार सिंदूर वर्णके मेषोंको देखकर गाय आदि पशु भयभीत हो जाते हैं, उसी प्रकार ये लोग वैष्णवोंके बाह्य चिह्नोंसे धोखा खाकर लज्जित होते हैं। इसलिये इनकी अन्तर्मुखी-प्रवृत्ति नहीं होनेके कारण इस प्रकारका अपमान अवश्यम्भावी है।” “गौड़ीय-वैष्णव परमहंस हो सकते हैं, परन्तु उनके वेशको देखकर कि वे वैष्णव अथवा अवैष्णव हैं, ऐसा कोई निर्णय नहीं कर सकता। श्रीसनातन गोस्वामीके वेशमें वर्णाश्रमके चिह्न नहीं थे, और श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती गोस्वामीके वेशमें गेरुए वस्त्र और त्रिदण्ड देखा जाता है। श्रीपरमानन्द पुरी, श्रीईश्वरपुरी आदिके वेशमें एक दण्ड और गेरुए वस्त्र दिखायी देते हैं। (इसलिये) त्रिदण्डी और एकदण्डी या निर्दण्डी (बिना दण्डके), सभी गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। वे कर्म-त्रिदण्ड, ज्ञान-त्रिदण्ड और भक्ति-निर्दण्ड आदि आश्रम-चिह्न परित्याग करनेके लिये वेश ले सकते हैं। और वर्णाश्रममें अवस्थित गौड़ीय वैष्णवोंका भी अभाव नहीं है। वे अपने वर्णचिह्न और आश्रमवेशको रखकर भी गौड़ीय वैष्णव हो सकते हैं। और भक्तचिह्न धारण करके किसीको कोई वर्णाश्रममें अवस्थित होनेमें बाधा नहीं दे सकता। गेरुए-वस्त्रके माहात्म्यका और त्रिदण्डके माहात्म्यका शास्त्रोंमें प्रचुर परिमाणमें उल्लेख किया गया है। परन्तु चिह्नके द्वारा और वेशग्रहणकी रीतिको देखकर गौड़ीय-वैष्णवको निर्देश नहीं कर सकते। हरिभजनमें निष्कपटता ही वैष्णव-परिचयका एकमात्र निर्देश है। जो लोग कर्मकाण्डको वैष्णवके कन्धेपर मढ़कर वैष्णवको कर्मी या ज्ञानीमात्र जानते हैं, वे सुविचार करनेमें असमर्थ और वैष्णवविरोधी हैं। लँगोट-बाह्य-वस्त्रादि दिखाकर जो वैष्णवताको लज्जित करते हैं और भजनको लक्ष्य नहीं करके 'नवमीमें लौकी खाना मना है' आदि नियमोंको ही वैष्णवाचार कहकर सिद्ध करनेमें व्यस्त हैं। वे श्रीमद्भागवतके विचारके अनुसार 'त्रिधातुके (कफ-वात-पित्तके) शरीर'को लेकर ही प्रमत्त हैं, इसलिये वैष्णव-वेशको स्थिर करते हुए (वे) लोकदृष्टिके अनुगमनसे वैष्णवोंको पहचाननेमें असमर्थ हैं। [—जगद्गुरु श्रीमद्भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद-कृत 'गौड़ीयका वेश' प्रबन्ध। (साप्ताहिक 'गौड़ीय' 2रा वर्ष, श्रीगौड़ीय-पत्रिका 17वाँ वर्ष)] ॥ 78 ॥ महाराष्ट्र महाराष्ट्र सेइ विप्र ताँरे कैल महा-निमन्त्रणे ॥ 79 ॥ काशीमें रहते समय श्रीसनातनको ब्राह्मणके द्वारा प्रतिदिन अपने घरमें निमन्त्रण :— “सनातन, तुमि यावत् काशीते रहिबा। तावत् आमार घरे भिक्षा ये करिबा ॥” 80 ॥ अनुवाद—महाप्रभुने महाराष्ट्र गोस्वामीसे मिलवाया। उस ब्राह्मणने श्रीसनातन गोस्वामीको लम्बा निमन्त्रण दिया, — “हे सनातन ! आप जब तक काशीमें रहोगे, तब तक मेरे घरपर ही भोजन ग्रहण करना ॥” 79-80 ॥ श्रीसनातनके द्वारा स्थूल भिक्षामें असम्मति, माधुकरी-भिक्षाकी इच्छा :— सनातन कहे, — “आमि माधुकरी करिब। ब्राह्मणेर घरे केने एकत्र भिक्षा लब?” ॥ 81 ॥ । 231