भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1678

[ 20/81-89 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं माधुकरी करूँगा। ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन क्यों ग्रहण करूँगा?”॥81॥

अमृताणुकणिका—भ्रमर पुष्पोंसे मधु ग्रहण करता है, इसलिये उसे मधुकर कहते हैं। वह एक ही पुष्पसे मधु नहीं ग्रहण करता, अपितु अनेक पुष्पोंसे मधु संग्रह करता है। श्रीसनातन गोस्वामीका विचार था कि यदि वे प्रतिदिन एक ही ब्राह्मणके घरमें पूरा भोजन करेंगे तो उन ब्राह्मणको कष्ट होगा। इसलिये उन्होंने कहा कि वे अपने शरीर निर्वाहके लिये जितना आवश्यक है, उतना भोजन अल्प मात्रामें दो-तीन ब्राह्मणोंके घरसे भिक्षा करेंगे॥81॥

श्रीसनातनके युक्त वैराग्यसे महाप्रभुको आनन्द :— सनातनेर वैराग्ये प्रभुर आनन्द अपार। भोटकम्बल-पाने प्रभु चाहे बारे बार ॥82॥

अनुवाद—महाप्रभु श्रीसनातन गोस्वामीके वैराग्यको देखकर बहुत प्रसन्न थे, परन्तु वे बार-बार उनके बहुमूल्य कम्बलकी ओर देखते थे॥82॥

बहुमूल्य कम्बल महाप्रभुको पसन्द नहीं, ऐसा जानकर पुराने-फटे कपड़ोंसे बनी गुदड़ी-ग्रहण :— सनातन जानिल एइ प्रभुरे ना भाय। भोट त्याग परिवारे चिन्तिला उपाय ॥83॥

अनुवाद—महाप्रभुके बार-बार कम्बलको देखनेसे श्रीसनातन गोस्वामी समझ गये कि यह कम्बल उन्हें अच्छा नहीं लग रहा है। श्रीसनातन गोस्वामीने तब उस कम्बलको त्याग करनेके उपायपर विचार किया॥83॥

एत चिन्ति' गेला गङ्गाय मध्याह्न करिते। एक गौड़ीया दियाछे कान्था धुञा शुक्लाइते ॥84॥

अनुवाद—उपायका विचार करके श्रीसनातन गोस्वामी गङ्गामें दोपहरका स्नान करनेके लिये गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक गौड़ीयने अपने पुराने वस्त्रोंसे बने कम्बलको (गुदड़ीको) धोकर धूपमें सुखानेके लिये डाल रखा था॥84॥

तारे कहे,—“ओरे भाइ, कर उपकारे। एइ भोट लञा एइ काँथा देह' मोरे ॥”85॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने उस गौड़ीयसे कहा,—“हे भाई, मुझपर उपकार करो। इस ऊनी कम्बलको लेकर मुझे अपनी यह गुदड़ी दे दो॥”85॥

सेइ कहे,—“रहस्य कर प्रामाणिक हञा? बहुमूल्य भोट दिबा केने काँथा लञा?”॥86॥

अनुवाद—उस गौड़ीयने कहा,—“आप सज्जन व्यक्ति होकर भी मुझसे परिहास कर रहे हैं? आप किसलिये बहुमूल्य कम्बल देकर बदलेमें गुदड़ी लेंगे?”॥86॥

अनुभाष्य—'प्रामाणिक'—आदर्श विचार-चरित्रवाला, पण्डित ॥ 86 ॥

तेंहो कहे,—“रहस्य नहे, कहि सत्यवाणी। भोट लह, तुमि देह' मोरे काँथाखानि ॥”87॥

अनुवाद—श्रीसनातन गोस्वामीने कहा,—“मैं परिहास नहीं कर रहा, मैं सत्य कह रहा हूँ। इस ऊनी कम्बलको लेकर तुम मुझे यह गुदड़ी दे दो॥”87॥

एत बलि' काँथा लइल, भोट ताँरे दिया। गोसाञिर ठाँइ आइला काँथा गले दिया ॥88॥

अनुवाद—यह कहकर श्रीसनातन गोस्वामीने उसे बहुमूल्य ऊनी कम्बल देकर गुदड़ी ले ली। फिर उस गुदड़ीको अपनी कन्धोंपर लपेटकर वे महाप्रभुके पास आये॥ 88॥

महाप्रभुके द्वारा बहुमूल्य कम्बलके विषयमें पूछना, श्रीसनातनके द्वारा पूरी घटनाका वर्णन :— प्रभु कहे,—“तोमार भोटकम्बल कोथा गेल?” प्रभुपदे सब कथा गोसाञि कहिल ॥ 89 ॥

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