श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1680, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/97-103 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वाभाविकप्रभुत्वं, भक्तिरसश्च, तेषाम् आश्रयं- 'दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम्' इति वचनोद्दिष्टं वस्तु तत् एव) तत्त्वम् (अद्वयज्ञानम्) उपदिदेश (उपदिष्टवान्)। श्लोक-भावानुवाद-भगवान् श्रीचैतन्य महाप्रभुने अतुल-करुणापूर्वक श्रीसनातन-गोस्वामीको श्रीकृष्णके स्वरूपके (सर्वेश्वरेश्वरेश्वर सच्चिदानन्दघन किशोरशेखर यशोदानन्दनस्वरूप), माधुर्यके (असमोध्र्व सर्वमनोहर स्वाभाविक-रूपगुणलीलादिके परम सौन्दर्ययुक्त), ऐश्वर्यके (असमोध्र्व अनन्त स्वाभाविक प्रभुता), भक्तिरसके एवं उसके आश्रयके ("दशम स्कन्धमें भागवतके दशम लक्षण आश्रय-विग्रह" - इस वचनके द्वारा उद्दिष्ट वस्तुके भी) तत्त्वका (अद्वयज्ञानका) उपदेश दिया॥ 97 ॥ 'सनातनशिक्षा'का वर्णन आरम्भ; दीनतापूर्वक प्रणिपात- परिप्रश्न और सेवापूर्वक लोक-शिक्षाके लिये नित्यसिद्ध श्रीसनातनके द्वारा बद्धजीवका अभिनय करते हुए शिष्यकी भाँति कीर्तन-विग्रह जगद्गुरु महाप्रभुसे तत्त्व-जिज्ञासा :- तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया। दैन्य विनति करे दन्ते तृण लञा ॥ 98 ॥ “नीच जाति, नीच सङ्गी, पतित अधम। कुविषय-कूपे पड़ि' गोङाइनु जनम ! ॥ 99 ॥ आपनार हिताहित किछुइ ना जानि ! ग्राम्य-व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि ॥ 100 ॥ कृपा करि' यदि मोरे करियाछ उद्धार। आपन-कृपाते कह 'कर्त्तव्य' आमार ॥ 101 ॥ जीवके स्वरूप और बन्धनसे उत्पन्न दुःखके कारणकी जिज्ञासा :- के आमि, केने आमाय जारे तापत्रय। इहा नाहि जानि-केमने 'हित' हय ॥ 102 ॥ 'साध्य', 'साधन'-तत्त्व पुछिते ना जानि। कृपा करि' सब तत्त्व कह त' आपनि ॥" 103 ॥ अनुवाद-तब श्रीसनातन गोस्वामीने दाँतोमें तिनका दबाकर महाप्रभुके चरणोंको पकड़कर दीनतापूर्वक विनती करते हुए कहा, - "मैं नीच जातिका, नीच लोगोंका सङ्ग करनेवाला, अधम-पतित हूँ। पापरूपी कुएँमें पड़े रहकर ही मैंने अपना जन्म गँवा दिया है। मैं अपने हित और अहितके विषयमें कुछ भी नहीं जानता हूँ। लोग मुझे लौकिक व्यवहारमें पण्डित मानते हैं और मैं भी इसे सत्य मानता हूँ। आपने अपनी अहैतुकी कृपासे मेरा उद्धार किया है। अब स्वयं अपनी अहैतुकी कृपासे मुझे मेरे कर्त्तव्यसे भी अवगत कराइये। मैं कौन हूँ, मुझे (आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक) तीन ताप क्यों जलाते हैं? मैं यह नहीं जानता हूँ कि मेरा कल्याण कैसे होगा? मैं 'साध्य' और 'साधन-तत्त्व'के विषयमें पूछना भी नहीं जानता हूँ। इसलिये कृपा करके आप स्वयं ही मुझे सभी तत्त्वोंके विषयमें बतलाइये॥" 98-103 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीसनातनने जिज्ञासा की,-"मैं कौन हूँ? आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक-ये तीन ताप मुझे क्यों जला रहे हैं और मेरा कल्याण किस प्रकार होगा? मैं साध्य-साधन तत्त्वकी जिज्ञासा करनेमें असमर्थ हूँ, आप कृपा करके मुझे मेरे जानने योग्य विषय बतलाइये ॥ 102-103 ॥ अनुभाष्य- 'ग्राम्य-व्यवहार' -स्त्री-पुरुषगत लौकिक- व्यवहार। 'तापत्रय'-(1) आध्यात्मिक, (2) आधिभौतिक और (3) आधिदैविक-ये तीन प्रकारके दुःख हैं। (1) आध्यात्मिक ताप दो प्रकारके हैं-(क) शारीरिक, जैसे-ज्वर आदि रोग; (ख) मानसिक, जैसे-प्रिय आदिका वियोग। (2) आधिभौतिक ताप चार प्रकारके हैं-(क) जरायुज-प्राणियोंसे (गर्भसे उत्पन्न मनुष्य-पशु आदिसे) ताप (ख) अण्डज-प्राणियोंसे (अण्डेसे उत्पन्न कीट-पक्षी आदिसे) ताप; (ग) स्वेदज-प्राणियोंसे (शरीरके स्त्रावसे उत्पन्न जीवाणुओंसे) ताप; (घ) उद्भिज्ज-प्राणियोंसे (पृथ्वीसे उत्पन्न वृक्षादिसे) ताप; (3) आधिदैविक ताप अर्थात् वरदेवता जैसे इन्द्रादिसे उत्पन्न ताप-शीत, 234 |