श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1681, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/102-109 ] वज्रपात आदि और अपदेवता जैसे हिंसक स्वभाववाले यक्ष-पिशाचादिसे अशुभजनक कष्टादि-ताप ॥ 102 ॥ श्रीसनातनको नित्यसिद्ध जानकर केवल बद्धजीवोंके मङ्गलके उद्देश्यसे महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :- प्रभु कहे,-“कृष्ण-कृपा तोमाते पूर्ण हय। सब तत्त्व जान, तोमार नाहि तापत्रय ॥ 104 ॥ कृष्णभक्ति धर तुमि, जान तत्त्वभाव। जानिं दार्ढ्य लागि' पुछे, - साधुर स्वभाव ॥ 105 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,- “तुमपर भगवान् श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा है, इसलिये तुम सभी तत्त्वोंको जानते हो और तुम्हारे लिये तीनों तापोंका अस्तित्व ही नहीं है। तुम श्रीकृष्णभक्तिको धारण करते हो और सभी तत्त्वोंको भी जानते हो। किन्तु जाननेपर भी दृढ़ताके लिये पूछना साधुका स्वभाव होता है॥ 104-105 ॥ तत्त्व-जिज्ञासाकी ऐकान्तिक आवश्यकता, उसीसे ही अभीष्टसिद्धि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103) में उद्धृत नारदजीके वचन :- सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः। अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 106 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी दृढ़ मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 106 ॥ अनुभाष्य- सद्धर्मस्य (नित्योपादेय-भागवतधर्मस्य) अवबोधाय (तत्त्वज्ञानाय, तत्त्वं जिज्ञासितुमित्यर्थः) येषां (भक्त्युन्मुख-सुकृतिवतां पुंसां) निर्बन्धिनी (अचञ्चला) मतिः (रुचिः बुद्धर्वा) (वर्त्तते), एषां (शुद्धचित्तानां निर्मलचेतसाम्) अभीप्सितः (प्रार्थितः) सर्वार्थः (साध्यः) अचिरात् (शीघ्रम्) एव सिद्ध्यति (सफलो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-भागवतधर्मके तत्त्वको जाननेके जिज्ञासु जिन सुकृतिवान् व्यक्तियोंकी अचलबुद्धि होती है, ऐसे निर्मल चित्तवालोंको उनके द्वारा प्रार्थित साध्य-प्राप्तिमें शीघ्र सफलता मिलती है ॥ 106 ॥ महाप्रभुका श्रीसनातनको आचार्यरूपमें अङ्गीकार करना :- योग्यपात्र हओ तुमि भक्ति प्रवर्त्ताइते। क्रमे सब तत्त्व शुन, कहिये तोमाते ॥ 107 ॥ अनुवाद-तुम भक्तिका प्रवर्तन (प्रचार) करनेके लिये योग्यपात्र हो। क्रमशः तुम सब तत्त्वोंको सुनो, मैं तुम्हें सब बतला रहा हूँ॥ 107 ॥ श्रीश्रीसनातन-शिक्षारम्भ; (क-1) सर्वप्रथम जीवके स्वरूपका विचार :- जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्यदास'। कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति', 'भेदाभेद-प्रकाश' ॥ 108 ॥ सूर्याशु-किरण, येन अग्निज्वालाचय। स्वाभाविक कृष्णेर तिनप्रकार 'शक्ति' हय ॥ 109 ॥ अनुवाद-जीव श्रीकृष्णका 'नित्यदास' है, यही जीवका स्वरूप है, क्योंकि वह श्रीकृष्णकी तटस्था-शक्ति और उनका भेदाभेद-प्रकाश है। जीव सूर्य-स्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है अथवा वह प्रज्ज्वलित अग्निरूपी श्रीकृष्णकी चिङ्गारीके जैसा है। श्रीकृष्णकी स्वाभाविक तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं॥ 108-109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“मैं कौन हूँ?” इन प्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,- “तुम-जीव हो। क्या तुम जड़से उत्पन्न यह शरीर हो? ऐसा नहीं है। अथवा तुम मन-बुद्धि-अहङ्कारस्वरूप लिङ्ग-शरीर हो? वह भी नहीं है। तुम स्वरूपतः श्रीकृष्णके नित्यदास हो। तुम श्रीकृष्णकी तटस्थाशक्ति हो अर्थात् श्रीकृष्णके चिद्- जगत् और मायिक जगत्,-इन दोनोंके बीचकी सीमापर (तटपर) स्थित होनेके कारण तुम्हारा दोनों जगत्से सम्बन्ध है, तुम-तटस्था-शक्ति हो। श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा भेदाभेद-प्रकाशरूप दोनों प्रकारका 'सम्बन्ध' है। । 235