श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
बीसवाँ अध्याय 20/102-109 ] वज्रपात आदि और अपदेवता जैसे हिंसक स्वभाववाले यक्ष-पिशाचादिसे अशुभजनक कष्टादि-ताप ॥ 102 ॥ श्रीसनातनको नित्यसिद्ध जानकर केवल बद्धजीवोंके मङ्गलके उद्देश्यसे महाप्रभुके द्वारा उत्तर देना :- प्रभु कहे,-“कृष्ण-कृपा तोमाते पूर्ण हय। सब तत्त्व जान, तोमार नाहि तापत्रय ॥ 104 ॥ कृष्णभक्ति धर तुमि, जान तत्त्वभाव। जानिं दार्ढ्य लागि' पुछे, - साधुर स्वभाव ॥ 105 ॥ अनुवाद-महाप्रभुने कहा,- “तुमपर भगवान् श्रीकृष्णकी पूर्ण कृपा है, इसलिये तुम सभी तत्त्वोंको जानते हो और तुम्हारे लिये तीनों तापोंका अस्तित्व ही नहीं है। तुम श्रीकृष्णभक्तिको धारण करते हो और सभी तत्त्वोंको भी जानते हो। किन्तु जाननेपर भी दृढ़ताके लिये पूछना साधुका स्वभाव होता है॥ 104-105 ॥ तत्त्व-जिज्ञासाकी ऐकान्तिक आवश्यकता, उसीसे ही अभीष्टसिद्धि :- भक्तिरसामृतसिन्धु (1/2/103) में उद्धृत नारदजीके वचन :- सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः। अचिरादेव सर्वार्थः सिद्ध्यत्येषामभीप्सितः ॥ 106 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 106 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-सद्धर्मको उदित करानेके लिये जिनकी दृढ़ मति है, उनकी शीघ्र ही अभिलषित सर्वार्थ-सिद्धि होती है॥ 106 ॥ अनुभाष्य- सद्धर्मस्य (नित्योपादेय-भागवतधर्मस्य) अवबोधाय (तत्त्वज्ञानाय, तत्त्वं जिज्ञासितुमित्यर्थः) येषां (भक्त्युन्मुख-सुकृतिवतां पुंसां) निर्बन्धिनी (अचञ्चला) मतिः (रुचिः बुद्धर्वा) (वर्त्तते), एषां (शुद्धचित्तानां निर्मलचेतसाम्) अभीप्सितः (प्रार्थितः) सर्वार्थः (साध्यः) अचिरात् (शीघ्रम्) एव सिद्ध्यति (सफलो भवति)। श्लोक-भावानुवाद-भागवतधर्मके तत्त्वको जाननेके जिज्ञासु जिन सुकृतिवान् व्यक्तियोंकी अचलबुद्धि होती है, ऐसे निर्मल चित्तवालोंको उनके द्वारा प्रार्थित साध्य-प्राप्तिमें शीघ्र सफलता मिलती है ॥ 106 ॥ महाप्रभुका श्रीसनातनको आचार्यरूपमें अङ्गीकार करना :- योग्यपात्र हओ तुमि भक्ति प्रवर्त्ताइते। क्रमे सब तत्त्व शुन, कहिये तोमाते ॥ 107 ॥ अनुवाद-तुम भक्तिका प्रवर्तन (प्रचार) करनेके लिये योग्यपात्र हो। क्रमशः तुम सब तत्त्वोंको सुनो, मैं तुम्हें सब बतला रहा हूँ॥ 107 ॥ श्रीश्रीसनातन-शिक्षारम्भ; (क-1) सर्वप्रथम जीवके स्वरूपका विचार :- जीवेर 'स्वरूप' हय-कृष्णेर 'नित्यदास'। कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति', 'भेदाभेद-प्रकाश' ॥ 108 ॥ सूर्याशु-किरण, येन अग्निज्वालाचय। स्वाभाविक कृष्णेर तिनप्रकार 'शक्ति' हय ॥ 109 ॥ अनुवाद-जीव श्रीकृष्णका 'नित्यदास' है, यही जीवका स्वरूप है, क्योंकि वह श्रीकृष्णकी तटस्था-शक्ति और उनका भेदाभेद-प्रकाश है। जीव सूर्य-स्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है अथवा वह प्रज्ज्वलित अग्निरूपी श्रीकृष्णकी चिङ्गारीके जैसा है। श्रीकृष्णकी स्वाभाविक तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं॥ 108-109 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-“मैं कौन हूँ?” इन प्रश्नके उत्तरमें महाप्रभुने कहा,- “तुम-जीव हो। क्या तुम जड़से उत्पन्न यह शरीर हो? ऐसा नहीं है। अथवा तुम मन-बुद्धि-अहङ्कारस्वरूप लिङ्ग-शरीर हो? वह भी नहीं है। तुम स्वरूपतः श्रीकृष्णके नित्यदास हो। तुम श्रीकृष्णकी तटस्थाशक्ति हो अर्थात् श्रीकृष्णके चिद्- जगत् और मायिक जगत्,-इन दोनोंके बीचकी सीमापर (तटपर) स्थित होनेके कारण तुम्हारा दोनों जगत्से सम्बन्ध है, तुम-तटस्था-शक्ति हो। श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा भेदाभेद-प्रकाशरूप दोनों प्रकारका 'सम्बन्ध' है। । 235
[ 20/108-114 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चिन्मयधर्मके सम्बन्धसे तुम—श्रीकृष्णके अभेद-प्रकाश हो और अणुचैतन्य-धर्मके कारण बृहद्-चैतन्य श्रीकृष्णके भेद-प्रकाश हो। (श्रीकृष्णके साथ तुम्हारा) भेद और अभेद-युगपत् (एक ही समयमें) सिद्ध है। जीवके तटस्थ-स्वभावसे ही यह युगपत् भेदाभेद प्रकाश सिद्ध हुआ है। जीव सूर्यस्वरूप श्रीकृष्णका किरण-कण है; अथवा प्रज्वलित अग्निरूप श्रीकृष्णकी असंख्य चिङ्गारियाँ जीवसमूहका उदाहरण-स्थल है॥108-109॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/96 संख्या देखें॥108-109॥ विष्णुका सर्वव्यापिनी शक्तिके द्वारा लीला-विलास :- विष्णुपुराण (1/22/53)में— एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्स्ना विस्तारिणी यथा। परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथैदमखिलं जगत्॥110॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥ अमृतप्रवाह भाष्य—एक स्थानपर स्थित अग्निका प्रकाश अथवा आलोक जिस प्रकार विस्तृत होता है, परब्रह्मकी शक्ति भी अखिल जगत्में उसी प्रकार व्याप्त है॥110॥ अनुभाष्य— यथा एकदेशस्थितस्य (निर्दिष्टस्थानाधिष्ठितस्य) अग्नेः ज्योत्स्ना (प्रभा) विस्तारिणी (व्यापिनी), तथा इदम् अखिलं (सर्वं चिदचिन्मयं) जगत् परस्य ब्रह्मणः (कृष्णस्य) शक्तिः। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥110॥ (क-2) श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार :- कृष्णेर स्वाभाविक तिनशक्ति परिणति। चिच्छक्ति, जीवशक्ति, आर मायाशक्ति॥111॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी स्वाभाविक शक्तिकी तीन परिणति हैं-चित्-शक्ति, जीवशक्ति और मायाशक्ति॥111॥ तीन प्रकारकी शक्ति :- विष्णुपुराण (6/7/61)में— विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथापरा। अविद्या-कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते॥112॥ अनुवाद—विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसे मायारूपी 'अविद्या'से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है॥112॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/119 संख्या देखें॥112॥ (1) अन्तरङ्गा स्वरूपशक्ति अकाट्य-भावसे शक्तिमानकी आश्रित :- विष्णुपुराण (1/3/2)में— शक्तयः सर्वभावानामिन्त्यज्ञानगोचराः। यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भावशक्तयः। भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता॥113॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भावोंकी अचिन्त्यज्ञानसे गोचर समस्त शक्तियाँ ब्रह्ममें विद्यमान हैं; इस कारणसे ब्रह्मकी वे समस्त शक्तियाँ सृष्टि आदि भावशक्तिके रूपमें क्रिया करती हैं। हे तापस-श्रेष्ठ, अग्निका जिस प्रकार गर्मी प्रदान करनेवाला धर्म स्वतःसिद्ध है, उसी प्रकार सभी शक्तियाँ भी ब्रह्मका स्वतःसिद्ध धर्म हैं॥113॥ अनुभाष्य— हे तपतां (तापसानां) श्रेष्ठ, यथा पावकस्य (अग्नेः) उष्णता (दाहकत्वादिशक्तिः) [अस्ति, तथा] यतः (ब्रह्मणः) एव सर्वभावानाम् अचिन्त्यज्ञानगोचराः (मानवबुद्धेः अगोचराः) अतः तु [एव] ताः (तथाविधाः) सर्गाद्याः (चित्सर्गाद्याः) [अविच्छेद्यरूपेण] ब्रह्मणः शक्तयः [नित्यप्रकटिताः] भवन्ति। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥113॥ (2) तटस्था जीवशक्ति :- विष्णुपुराण (6/7/62-63)में— यया क्षेत्रज्ञशक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्वगा। संसारतापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान्॥114॥ 236 |
बीसवाँ अध्याय 20/114-118 ]
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञ-संज्ञिता। सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्त्तते॥ 115॥ अनुवाद—क्षेत्रज्ञ-शक्ति ही जीवशक्ति है; वह जीवशक्ति सर्वज्ञ होनेपर भी मायावृत्तिरूप अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर संसारके समस्त तापोंको नित्य भोग करती है। और, वही 'क्षेत्रज्ञ'-नामक शक्ति अविद्या- कुण्ठासे आवृत्त होकर, हे भूपाल, सभी जीवोंमें तारतम्यके सहित वर्तमान रहती है। तात्पर्य यह है, भगवान्की चिद्-शक्ति-सर्वश्रेष्ठा, जीवशक्ति-मध्यमा और अविद्या-कर्म कहलानेवाली मायाशक्ति-अधमा है। जीवशक्ति मायाके द्वारा आवृत्त होकर अर्थात् चिद्- शक्तिकी वृत्तिसे दूर होकर संसारके तापोंको भोगती है। वह चिद्-शक्तिसे दूर रहते हुए अपने द्वारा किये हुए कर्मोंके चक्रमें प्रवेश करके ऊँची-नीची अवस्थाएँ प्राप्त करती है॥114-115॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/155-156 संख्या देखें॥114-115॥ (3) बहिरङ्गा मायाशक्ति :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/5)में— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 116॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥ 116॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/118 संख्या देखें॥116॥ (ख) विरूप-विचार; बद्धजीवका भवरोग और उसके फलस्वरूप दुर्दशा और सजा :— कृष्ण भुलि' सेइ जीव—अनादि बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ 117॥ अनुवाद—श्रीकृष्णको भूलनेके कारण ही जीव अनादिकालसे श्रीकृष्णसे बहिर्मुख हुआ है, इसलिये माया उसे संसाररूपी दुःख प्रदान करती है॥117॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णका नित्यदास हूँ,—इस बातको भूल जानेसे ही जीवका मायाबन्धन है। तटस्थशक्तिरूप जीवकी चिद्-जगत् और मायिक जगत्के सन्धिःसीमापर रहनेके समय मायाभोगकी वासना करनेके कारण उसका मायामें प्रवेश हुआ है। मायामें प्रवेश करनेसे ही मायिक-कालकी गणना है। उस काल गणनासे पहले ही बहिर्मुखता होनेके कारण उसे 'अनादि' कहा जाता है; क्योंकि वह मायिक-कालसे पहले हुआ है॥117॥
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय। दण्ड्यजने राजा येन नदीते चुबाय॥ 118॥ अनुवाद—जैसे कभी राजा अपराधी व्यक्तिको दण्ड देनेके लिये उसे नदीमें डुबोने और पुनः उसे थोड़ी देरके लिये बाहर निकालनेका आदेश देता है जिससे वह मरे नहीं, उसी प्रकार माया जीवको उठाकर कभी तो स्वर्गमें ले जाती है और कभी उसे नरकमें डुबोती है॥118॥ अनुभाष्य—नित्यमुक्त जीव कभी भी श्रीकृष्णको नहीं भूलते, वे अनादिकालसे श्रीकृष्णोन्मुख रहकर हरिसेवारूपी अपनी नित्यवृत्तिमें स्थित रहते हैं। किन्तु जो सब जीव अपने श्रीकृष्ण-सेवाधिकारको भूलकर अनादिकालसे अपने कर्मफलोंसे उत्पन्न भोगवासनाके कारण मायाका अनुशीलन करके स्वयंको कर्मफलका भोक्ता मानते हैं, उनके कर्मफल-भोगका निर्णय मायाके द्वारा होता है। राजाके पुरस्कार और दण्डकी भाँति बद्धजीव भी मायाके द्वारा पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गमें देवताके पदपर आरूढ़ होकर सुख भोग करता है, पुनः पापके फलसे नरकादिमें क्लेश प्राप्त करता है॥118॥ अमृताणुकणिका—राजा जो अपराधी व्यक्तिको दण्ड देता है, वह केवल उसे दुःख भोग करानेके लिये नहीं होता। उस दुःख भोगका मुख्य उद्देश्य अपराधी व्यक्तिकी अपराध करनेकी वृत्तिको दूर करना होता है
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[ 20/118-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जिससे वह भविष्यमें अपराध करके दण्डका भागी न हो। इसलिये उद्देश्यके प्रति लक्ष्य करनेपर यह समझा जा सकता है कि राजाका दण्ड देना भी उस अपराधीके प्रति करुणा है। श्रीकृष्णको भूलकर जीव सुखकी आशासे इस जगत्में आता है। परन्तु (गीता 8/15)में भगवान् श्रीकृष्णने इस जगत्को 'दुःखालयमशाश्वतम्' कहा है। यहाँ जो सुख प्रतीत होता है, वह भी दुःखसे मिश्रित होता है और परिणाममें दुःख ही होता है। (गीता 9/20-21)में भगवान्ने कहा है,-'ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। अर्थात् अनेक पुण्य कर्मोंके फलस्वरूप जीव स्वर्गको प्राप्त करता है। वहाँ सुखभोग करनेपर पुण्य क्षीण होनेपर जीव पुनः मृत्युलोकमें पतित होता है।' इस प्रकार स्वर्गभोग भी नश्वर और अन्ततः दुःखपूर्ण है। अपने प्रयासोंसे जीव जन्म-मृत्युके हाथोंसे छुटकारा नहीं पा सकता, तब वह यह समझ जाता है कि सुखकी आशासे इस जगत्में आकर उसने बहुत बड़ी भूल की है। तब वह समझ सकता है कि कृष्ण- विमुखता ही उसकी मूल भूल है और भाग्यवशतः तब जीव कृष्णोन्मुख होनेकी चेष्टा कर सकता है। इसी उद्देश्यसे ही माया जीवको दुःख प्रदान करती है॥118॥ (ग) बद्धजीवका रोग; उसका उपाय और चिकित्सा अर्थात् पथ्य एवं औषधिके सेवनकी विधि :- श्रीमद्भागवत (11/2/37)में- भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ 119॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य- भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे॥119॥ अनुभाष्य-द्वारकापुरीमें श्रीवसुदेवकी जिज्ञासा करने पर देवर्षि नारदने भागवत-धर्मके वर्णनके प्रसङ्गमें विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया; राजा निमिके यज्ञमें नवयोगेन्द्रके आनेपर राजा निमिने उनसे भागवत-धर्मका वर्णन करनेकी प्रार्थना की, नवयोगेन्द्रोंमें एक 'कवि' ऋषि सर्वप्रथम भागवत धर्मके लक्षण बतलाकर बद्धजीवकी दुरावस्था और भगवद्भजनकी कर्त्तव्यताका उपदेश कर रहे हैं,- [यतः] ईशात् (भगवतः कृष्णात्) अपेतस्य (विमुखस्य बद्धजीवस्य) तन्मायया (तस्य भगवतः कृष्णस्य मायया बहिरङ्गशक्त्या) अस्मृतिः (भगवतः स्वरूपस्य असफूर्तिः धारणाभावः इत्यर्थः) [ततः] विपर्ययः (मायाकृत-कर्मफल-भोगपराभिमानः- स्वरूपस्मरणात् देहोऽस्मीति विवर्त्तमूल-बुद्धिवैपरीत्यमित्यर्थः) [ततः] द्वितीयाभिनिवेशतः (निज-भोगज-कल्पनात्-स्वरूपात् अन्यस्मिन् वस्तुनि देहादौ आवेशतः, स च देहाहङ्कारतः, स च स्वरूपामस्मरणात्) भयं (देहद्रविण-सुहृन्निमित्तं संसृतिः आशङ्काः वा) स्यात् (भवति)। अतः बुध (कृष्णोन्मुखो बुद्धिमान् जीवः) तम् (ईशम् अधोक्षजम् एव) गुरुदेवतात्मा (गुरुः एव देवता ईश्वरः, आत्मा प्रेष्ठश्च यस्य तथादृष्टिः सन्) एकया (केवलया अव्यभिचारिण्या एकान्तिक्या) भक्त्या (इतरज्ञान- कर्ममार्गानुसरणत्यागेन) आभजेत् (सम्यक् सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद-जब भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख बद्धजीवको भगवान् श्रीकृष्णकी माया (बहिरङ्गाशक्ति) के द्वारा भगवद् स्वरूपकी स्मृतिका अभाव होता है, तब उसे मायाकृत कर्मफलके भोक्ताके अभिमानसे और स्वरूपकी विस्मृतिसे मैं यह देह हूँ, ऐसी विपरीत बुद्धि होती है और तब द्वितीय-अभिनिवेश अर्थात् अपनेको भोक्ता मानकर अपने स्वरूपसे अन्य वस्तु-देहमें आवेश होनेके कारण देहमें आत्मबुद्धिके अहङ्कार और स्वरूपकी विस्मृतिके कारण देह-धन-सुहृदसे बिछुड़नेका 238 |
भय होता है। इसलिये श्रीकृष्ण-उन्मुख बुद्धिमान् जीव गुरुदेवको आराध्य-देवता और प्रियतम जानकर भगवान्की ऐकान्तिक भक्तिके द्वारा (श्रीकृष्णसे अतिरिक्त ज्ञान- कर्ममार्गके अनुसरणको त्यागकर) सम्यक्रूपसे सेवा करेंगे ॥ 119 ॥
(घ) चिच्छक्तिमान् परमेश्वरके अवरोह अथवा अवतारका वर्णन; मायाको जीतनेका एकमात्र उपाय :- साधु-शास्त्र-कृपाय यदि कृष्णोन्मुख हय। सेइ जीव निस्तारे, माया ताहारे छाड़य ॥ 120 ॥ अनुवाद-साधु और शास्त्रकी कृपासे जीव जब श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तब उस जीवका उद्धार होता है और माया उसे छोड़ देती है ॥ 120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णबहिर्मुखतासे ही जीवका पतन होता है-यह साधु और शास्त्रकी कृपासे ही जाना जाता है। इसे जानकर जो जीव पुनः श्रीकृष्णोन्मुख होता है, उसका ही उद्धार होता है और माया उसे अपने चङ्गलसे मुक्त कर देती है ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण-विमुख रहकर जीव संसारमें सुखभोगमें व्यस्त हो जाता है। वैष्णवकी कृपा और शास्त्रके अनुग्रहसे जीव कर्मफलभोग-वासनासे मुक्त होकर जब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होता है, तब वह भोग करने अथवा मुक्त होनेकी पिपासासे छुटकारा प्राप्त करता है। श्रीकृष्णसेवा-परायण बुद्धि होनेसे विषयभोग- वासनारूपी माया उसे छोड़ देती है। श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होनेपर तब जीव पुनः अहंग्रहोपासनामें मत्त होकर मुक्तिकामी ज्ञानी अथवा विषय-भोगवासनासे फलभोगकामी होकर श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तुओंमें आबद्ध नहीं होता, अपितु मायाके चङ्गलसे छुटकारा प्राप्त करता है ॥ 120 ॥
एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत भक्त ही मायाको जीतनेवाले :- श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 121 ॥
अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी इस त्रिगुणमयी मायासे अत्यन्त कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं, वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं ॥ 121 ॥ अनुभाष्य- एषा मम (परमेश्वरस्य) दैवी (अलौकिकी वैष्णवी) गुणमयी (सत्त्वरजस्तमोमयी) माया (बहिरङ्गा शक्तिः) दुरत्यया (भुक्तिमुक्तिवासनाबद्धजीवानां दुरतिक्रमा) हि (एव); मां (स्वरूपशक्तियुक्तं स्वयं भगवन्तं कृष्णं) ये (जनाः) प्रपद्यन्ते (सर्वात्मना आश्रयं कुर्वन्ति), ते (एव) एतां मायां (जीवविमोहिनीं प्रकृतिं) तरन्ति (अतिक्रामन्ति पराजयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-भुक्ति-मुक्तिकी वासनासे बद्ध जीवोंके लिये मुझ परमेश्वरकी इस अलौकिकी वैष्णवी (सत्त्व-रज-तमकी) त्रिगुणमयी बहिरङ्गा शक्तिका अतिक्रम करना अति दुष्कर है, किन्तु जो स्वरूपशक्तियुक्त स्वयं मुझ कृष्णका सभी प्रकारसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस जीव-विमोहिनी प्रकृतिको जय कर लेते हैं ॥ 121 ॥
जीवके प्रति अहैतुकी-कृपामय अधोक्षज विष्णुके द्वारा अपने अवतारका प्राकट्य :- मायामुग्ध जीवेर नाहि कृष्णस्मृति-ज्ञान। जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥ 122 ॥ अनुवाद-मायामुग्ध जीवको श्रीकृष्णका स्मृतिरूपी ज्ञान नहीं रहता, जीवपर कृपा करके ही श्रीकृष्णने वेदों और पुराणोंको प्रकाशित किया है ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मायामुग्ध जीव प्रतिक्षण प्रत्येक विषयमें स्वरूपविभ्रमके कारण अपने भोगफलको प्राप्त करनेमें लगे रहते हैं। कभी तो वे मायाबद्ध-बुद्धिसे फलभोगकी कामनासे छूटनेकी इच्छा करते हैं, कभी वे फलकामी बनकर अनित्य भोगोंका बहुत आदर करते हैं; दोनों अवस्थाओंमें ही, मायासे ढके होनेके कारण उनके श्रीकृष्ण-स्मरणका अभाव लक्षित होता है। इसलिये परमकरुणामय श्रीकृष्णने ऐसे भ्रान्तबुद्धि कुविचारपरायण
[ 20/122-128 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला और भोगपरायण व्यक्तियोंका अमङ्गलसे उद्धार करनेके लिये वेद-पुराणादि प्रकाशित किये हैं॥122॥ श्रीकृष्ण ही तीन प्रकाशोंसे श्रीकृष्णज्ञान देनेवालेके रूपमें अवतीर्ण—(1) वेद अथवा वेदान्त-भाष्य श्रीमद्भागवत, (2) भागवत-श्रेष्ठ गुरु, (3) अन्तर्यामी :— 'शास्त्र'-'गुरु'-'आत्म'-रूपे आपनेरे जानान। 'कृष्ण मोर प्रभु, त्राता'—जीवेर हय ज्ञान ॥123॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण 'शास्त्र', 'गुरु' और 'अन्तर्यामी'के रूपमें जीवको अपने तत्त्वसे अवगत कराते हैं। श्रीकृष्णका ज्ञान होनेपर जीव यह समझ पाता है कि 'श्रीकृष्ण ही मेरे स्वामी और मेरी रक्षा करनेवाले हैं'॥'123॥ अनुभाष्य—शास्त्र, गुरु और चैत्यगुरु—इन तीन रूपोंमें भगवान् उदित होकर बद्धजीवके हृदयमें 'जीवके प्रभु' अथवा 'जीवोंके उद्धार-कर्त्ता' आदि भावोंको प्रकाशित करा देते हैं॥123॥ (ङ) ईश्वर-विश्वासी मात्रको ही वेदके अपौरुषेय-ज्ञानके कारण ग्रन्थकारके द्वारा पूर्वोक्त तीन प्रकारके प्रमाणोंमेंसे सर्व-प्रत्यक्षीभूत वेद अथवा श्रुतिकी सहायतासे अपने वक्तव्य एकमात्र शुद्धभक्तिके श्रेष्ठ-अभिधेय होनेका संस्थापन; शास्त्रोंमें प्रतिपादित तीन प्रकारके अन्वेषणीय तत्त्व अथवा ब्रह्मवस्तु :— वेदशास्त्र कहे—'सम्बन्ध', 'अभिधेय', 'प्रयोजन'। 'कृष्ण'—प्राप्य-सम्बन्ध, 'भक्ति'—प्राप्येर साधन ॥124॥ श्रीकृष्ण ही सम्बन्ध, शुद्धभक्ति ही अभिधेय, प्रेम ही प्रयोजन :— अभिधेय-नाम—'भक्ति', 'प्रेम'—प्रयोजन। पुरुषार्थ-शिरोमणि—प्रेम महाधन ॥125॥ साधनभक्तिके साध्य प्रेमकी चेष्टा :— कृष्णमाधुर्य-सेवा-प्राप्त्येर कारण। कृष्णे सेवा करे, कृष्णरस-आस्वादन ॥ 126 ॥ अनुवाद—वेदशास्त्र 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और 'प्रयोजन'के विषयमें बतलाते हैं। जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' हैं, प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही भक्ति अथवा 'अभिधेय' है, और पुरुषार्थ-शिरोमणि महाधन स्वरूप प्रेम ही 'प्रयोजन' है। जीव जब श्रीकृष्णमाधुर्यके आनन्दको अनुभव करता है, तब वह श्रीकृष्णकी सेवा करता है। उस सेवाके द्वारा वह श्रीकृष्णरसका आस्वादन करता है॥124-126॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जीव मायामुग्ध होकर श्रीकृष्णस्मृति-ज्ञानसे वञ्चित हो गये हैं, ऐसा देखकर अपार-करुणामय श्रीकृष्ण वेद-पुराण-शास्त्रोंको प्रकाशित करके उन शास्त्रोंके रूपमें, शास्त्रोंके अर्थ-प्रदर्शक गुरुरूपमें और अन्तर्यामी आत्मारूपमें जीवको अपने तत्त्वसे अवगत कराते हैं। सभी वेदशास्त्रोंमें सम्बन्ध- ज्ञान, अभिधेय-ज्ञान और प्रयोजन-ज्ञानकी शिक्षा है। जीवके प्राप्य श्रीकृष्ण जो तत्त्व हैं, वे सम्बन्धज्ञानसे प्राप्त होते हैं। उन श्रीकृष्णको प्राप्त करनेके साधनका नाम—'भक्ति' है; उसे 'अभिधेय' कहते हैं। श्रीकृष्ण- प्राप्तिमें 'प्रेम' नामक एक विचित्र कार्य है, उसका नाम 'प्रयोजन' है॥123-125॥ अनुभाष्य—वेदशास्त्रोंमें 'सम्बन्ध', 'अभिधेय' और 'प्रयोजन'—ये तीन विषय कहे गये हैं। शुद्धजीवके प्राप्य श्रीकृष्ण ही 'सम्बन्ध' हैं; प्राप्य श्रीकृष्णसेवाका साधन ही 'अभिधेय' है; और धर्म-अर्थ-कामभोग और भोगरहित 'मोक्ष'—इन चारों पुरुषार्थोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ महान्धनरूप प्राप्य श्रीकृष्णप्रेम ही 'प्रयोजन' है॥125॥ चार प्रकारके अभिधेयोंमेंसे सभी शास्त्रोंमें एकमात्र शुद्धभक्तिके ही निर्विघ्न और अनायास प्राप्त होनेका वर्णन; उपमा—सर्वज्ञ अथवा सिद्ध महाजनोंका उपदेश :— इहाते दृष्टान्त—यैछे दरिद्रेर घरे। 'सर्वज्ञ' आसिं दुःख देखि' पुछये ताहारे ॥ 127 ॥ जीवका नित्यसिद्धभाव श्रीकृष्णप्रेम :— 'तुमि केने एत दुःखी, तोमार आछे पितृधन। तोमारे ना कहिल, अन्यत्र छाड़िल जीवन ॥'128॥ अनुवाद—इसका दृष्टान्त—जैसे किसी दरिद्र व्यक्तिके 240 ।
बीसवाँ अध्याय 20/127-132 ] घरमें एक ज्योतिषीने आकर उसके दुःखको देखकर उससे पूछा, - 'तुम इतने दुःखी क्यों हो? तुम्हारे पिताने तुम्हारे लिये बहुत धन छोड़ा है। परन्तु तुम्हारे पिताने अन्य किसी स्थानपर शरीर छोड़ा था, इसलिये वे तुम्हें धनके विषयमें बतला नहीं पाये।' 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जीवकी श्रीकृष्ण-बहिर्मुखताके कारण उसकी स्वरूपस्मृतिके लुप्त होनेपर श्रीकृष्णने वेद-पुराणादिका प्रवर्त्तन करके स्वयंको प्रकाशित किया है। 'दरिद्र और ज्योतिषीकी कथा'—उसकी उपमा है॥ 127 ॥ अनुभाष्य- 'सर्वज्ञ'-भाः 5/5/10-13 माध्व-भाष्य देखें ॥ 127 ॥ अमृताणुकणा-छान्दोग्योपनिषद् (8वाँ प्रपाठक)- “त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं xx अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेतामच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानाः। तद् यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः।” अर्थात् “इस जगत्में ये सब सत्यकामनाएँ आत्मामें विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप असत्यके आवरणमें आवृत हैं। किन्तु आत्मदर्शी व्यक्ति सत्यकाम होकर इस लोकमें स्थित, परलोकमें स्थित अथवा अन्य जो कुछ दुर्लभ है, उन सबको हृदयाकाशमें गमनके द्वारा प्राप्त करता है। जैसे, पृथ्वीमें छिपे स्वर्ण आदि गुप्तधनके सम्बन्धमें अज्ञ व्यक्ति उस भूमिके ऊपर बार-बार विचरण करनेपर भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता, वैसे ही सभी प्राणी अज्ञानके कारण हृदयमें अवस्थित ब्रह्मवस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते।” 'सर्वज्ञ'-(भःरःसिः 2/1/182)- “परचित्तस्थितं देशकालाद्यन्तरितं तथा। यो जानाति समस्तार्थं स सर्वज्ञो निगद्यते॥” अर्थात् “जो दूसरोंके हृदयकी बात और देश- कालादिकी ढकी हुई सभी बातोंको जानता है, उसको सर्वज्ञ कहते हैं॥" 127-128 ॥ साध्य-प्रेमके साधनभूत भक्तिकी अवश्य-कर्त्तव्यता; शास्त्रमें इसीका ही विधान :- सर्वज्ञेर वाक्ये करे धनेर उद्देशे। ऐछे वेद-पुराण जीवे 'कृष्ण' उपदेशे॥ 129 ॥ अनुवाद-उपरोक्त दृष्टान्तमें ज्योतिषीके वचन जैसे धनके विषयमें निर्देश करते हैं, उसी प्रकार वेद-पुराण जीवको 'श्रीकृष्ण'के विषयमें बतलाते हैं॥ 129 ॥ जीवोंके नित्य सम्बन्धी श्रीकृष्ण ही सभी शास्त्रोंके उद्दिष्ट :- सर्वज्ञेर वाक्ये मूलधन अनुबन्ध। सर्वशास्त्रे उपदेशे, 'श्रीकृष्ण' - सम्बन्ध ॥ 130 ॥ अनुवाद-ज्योतिषीके वचनोंसे जिस प्रकार दरिद्र व्यक्तिको अपने धनके विषयमें पता चल जाता है, उसी प्रकार सभी शास्त्रोंके उपदेशोंसे जीवको श्रीकृष्णसे अपने सम्बन्धके विषयमें पता चल जाता है॥ 130 ॥ नित्यसिद्ध भावका प्राकट्य ही बद्धजीवका साधन :- 'बापेर धन आछे' - जाने, धन नाहि पाय। सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर उपाय ॥ 131 ॥ अनुवाद - 'पिताके द्वारा छोड़ा गया धन है' - ज्योतिषीके वचनानुसार दरिद्र व्यक्तिको इसे जानकर भी उस धनकी प्राप्ति नहीं होती। ज्योतिषी ही उसे प्राप्तिका उपाय भी बतलाता है॥ 131 ॥ अभक्ति-मार्ग-(1) भोगकी प्राप्तिके लिये कर्ममार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'एइ स्थाने आछे धन' - बलि' दक्षिणे खुदिबे। 'भीमरुल-वरुली' उठिबे, धन ना पाइबे ॥ 132 ॥ अनुवाद - 'इस स्थानपर धन है'-यह बताकर ज्योतिषीने कहा-यदि तुम दक्षिण भागमें खोदोगे, तो । 241
[ 20/132-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ततैये और मधुमक्खियाँ निकलेंगे और तुम्हें धनकी प्राप्ति नहीं होगी॥ 132 ॥ (2) विभूति-सिद्धिकी प्राप्तिके लिये योगमार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 'यक्ष' एक हय। से विघ्न करिबे,—धने हात ना पड़य ॥ 133 ॥ अनुवाद—यदि तुम पश्चिम भागमें खोदोगे, तो वहाँ एक यक्ष है, वह ऐसी बाधा उत्पन्न करेगा, जिससे धन तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा ॥ 133 ॥ (3) सायुज्य प्राप्तिके लिये ज्ञान-मार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'उत्तरे' खुदिले आछे कृष्ण-'अजगरें'। धन नाहि पाबे, खुदिते गिलिबे सबारे ॥ 134 ॥ अनुवाद—उत्तर भागमें खोदनेपर देखोगे कि वहाँ काले रङ्गका अजगर है। तुम्हें धन तो मिलेगा नहीं, अपितु वही अजगर ही खोदनेवालेको निगल जायेगा ॥ 134 ॥ पूर्व अथवा पुराण अथवा नित्य शाश्वत धन श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र विपत्ति-रहित :- पूर्वादिके ताते माटी अल्प खुदिते। धनेर झारि पड़िबेक तोमार हातेते ॥ 135 ॥ अनुवाद—पूर्व दिशामें थोड़ी सी मिट्टी खोदनेपर ही धनकी मटकी तुम्हारे हाथ लगेगी ॥ 135 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वेद और पुराण शास्त्रोंमें अनेक प्रकारके उपायोंकी बात स्थान-स्थानपर लिखी है; उसमें किसी ओर ततैय्यारूप कर्मकाण्ड, किसी ओर ज्ञान- काण्डरूपी यक्ष, किसी ओर काले रङ्गका अजगर-रूपी योगगत कैवल्य, पुनः किसी ओर रक्षित धनका पात्र बहुत कम परिश्रमसे ही हाथमें आ जाता है। इसलिये वेदशास्त्रोंने कहा है कि कर्म, ज्ञान और योगको परित्यागकर भक्तिपथसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—'उपमेय',—जैसे, पूर्वदिशामें—श्रीकृष्णभक्ति, दक्षिणदिशामें—कर्मकाण्ड, पश्चिमदिशामें—सिद्धिकाण्ड (मतान्तरमें ज्ञानकाण्ड), उत्तरदिशामें—ज्ञानकाण्ड (मतान्तरमें योगकाण्ड)। और इनके 'उपमान',—जैसे, पूर्वदिशामें—पितृधन, दक्षिणदिशामें—ततैये और मधुमक्खी, पश्चिमदिशामें—यक्ष, उत्तरदिशामें—काला अजगर। दक्षिणा-मार्गीय साधन ही फलभोगपरक कर्मकाण्ड है; यमके द्वारा दण्डनीय 'दक्षिणा' ग्रहण करके फलका आरोप करते हैं। इस कर्ममार्गमें जीव भोगवासनारूपी ततैये, मधुमक्खी आदिके द्वारा डंक मारे जानेपर कष्ट प्राप्त करते हैं, इससे उनके भोगकी आशा पूर्ण नहीं होती, केवल उत्तरोत्तर वर्धित ही होती है। उत्तरा-मार्गीय साधन ही सिद्धिवाञ्छा-परायण योगमार्ग है; उसमें कैवल्यरूपी काले रङ्गका अजगर-सर्प शुद्धजीवकी सत्ताको ग्रास कर लेता है। किसीके मतानुसार, उत्तरा-मार्गीय साधन ही निष्काम-ज्ञानमार्ग है, वहाँ शुद्धजीवकी सत्ताको ब्रह्मसायुज्यरूपी काले सर्पने ग्रास कर रखा है। यक्ष धनका रक्षक है, धनको प्रदान करनेवाला नहीं। यक्षसे प्रार्थना करनेवालोंका विनाशके अतिरिक्त धनकी प्राप्ति दुराशामात्र है, अर्थात् धनके लोभसे प्रलोभित करके यक्ष अन्तमें धन पानेके अभिलाषी व्यक्तिका विनाश करनेवाला है; वास्तवमें ज्ञानमार्गमें अथवा योगमार्गमें सायुज्य अथवा कैवल्य, दोनों ही जीवकी सत्ताके संहारक हैं। श्रीकृष्णभक्ति ही बद्धजीवका 'पूर्व' अर्थात् सिद्धधन है। उसे प्राप्त करके शुद्धजीव नित्यकालके लिये धनी हो जाता है। भक्तिधन-हीन व्यक्ति जड़ीय नश्वर अभावोंसे ग्रस्त होकर कभी तो कर्मरूपी ततैयेके डंकसे छटपट करता है, धन प्राप्त नहीं करता; पुनः कभी श्रीकृष्णकी तरफ पीठ करके अहंग्रोपासनामें अथवा कैवल्यके साधनमें व्यस्त होकर योगरूपी यक्षके द्वारा प्रेमधनसे वञ्चित होता है; पुनः उत्तरमें अर्थात् 242 ।
शुद्धजीवसत्तासे रहित सायुज्य अथवा कैवल्यरूपी सर्पके मुखमें गिरकर भी धन प्राप्त नहीं करता ॥ 132-135 ॥
शुद्धभक्तिके बलसे श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति ही सभी शास्त्रोंका तात्पर्य :- ऐछे शास्त्र कहे, - कर्म, ज्ञान, योग त्यजि'। 'भक्त्ये' कृष्ण वश हय, भक्त्ये ताँरे भजि ॥ 136 ॥
अनुवाद-इसी प्रकार शास्त्र कहते हैं, -कर्म, ज्ञान और योगको त्यागकर भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करना चाहिये जिसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं ॥ 136 ॥
भगवान् भक्तके लिये ही प्राप्य; भक्तिके बलसे ही अशुद्ध भी पवित्र :- श्रीमद्भागवत (11/14/20-21) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 137 ॥
अनुवाद-हे उद्धव ! मेरी प्रति की गयी प्रबला भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता ॥ 137 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 137 ॥
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ 138 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-साधुओंका प्रिय मैं, अनन्य श्रद्धासे उत्पन्न भक्तिके द्वारा ही प्राप्त होता हूँ। भक्ति ही मुझमें निष्ठा रखनेवाले चण्डालका भी जन्मदोषसे उद्धार करती है ॥ 138 ॥
अनुभाष्य-उद्धवजीके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,-
सतां (नित्यसेवकानां सज्जनानां) प्रियः (सेव्यः) आत्मा (प्रेष्ठः) अहम् (स्वयं भगवान् कृष्णः) एकया (अव्यभिचारिण्या, अहैतुक्या) श्रद्धया (श्रद्धापूर्वकिया) भक्त्या ग्राह्यः (साध्यः, प्राप्यः, लभ्यः इत्यर्थः); मन्निष्ठा (कृष्णैकसेवनधर्म-तत्परा) भक्तिः श्वपाकान् (नीचकुलोद्द्भवान् जनान्) अपि सम्भवात् (प्राक्तन-दुष्कृति-जनित-शौक्र-जाति-दोषात्) पुनाति।
श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
सभी शास्त्रोंमें श्रीकृष्णप्राप्तिके साधन- 'भक्ति' को ही अभिधेय होनेका गान :- अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्तयेर उपाय। 'अभिधेय' बलि' तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥ 139 ॥
अनुवाद-इसलिये भक्ति ही श्रीकृष्ण-प्राप्तिका उपाय है। सभी शास्त्र इसी 'भक्ति'को ही 'अभिधेय' कहकर वर्णन करते हैं ॥ 139 ॥
दृष्टान्त :- धन पाइले यैछे सुखभोग-फल पाय। सुखभोग हैते दुःख आपनि पलाय ॥ 140 ॥
सम्बन्धयुक्त सेवाके फलसे श्रीकृष्णप्रीतकी वृद्धि; उसके साथ-ही-साथ मुक्ति अथवा अनर्थ-निवृत्ति :- तैछे भक्ति-फले कृष्णे प्रेम उपजाय। प्रेमे कृष्णास्वाद हैले भव नाश पाय ॥ 141 ॥
अनुवाद-धन प्राप्त होनेसे जैसे सुखभोगरूप फलकी प्राप्ति होती है और सुखभोगसे दुःख अपने आप ही दूर हो जाते हैं। इसी प्रकार भक्तिके फलसे श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और प्रेममें श्रीकृष्णआस्वादन होनेपर भवनाश (पुनः जन्म-मृत्युके चक्रका नाश) हो जाता है ॥ 140-141 ॥
श्रीकृष्णप्रीतिमूलक सेवाका मुख्य फल - श्रीकृष्णप्रेमानन्दकी प्राप्ति, गौणफल - विमुखताका दूर होना और मुक्ति :- दारिद्रय-नाश, भवक्षय,-प्रेमेर 'फल' नय। प्रेमसुख-भोग-मुख्य प्रयोजन हय ॥ 142 ॥
[ 20/142-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—दरिद्रताका नाश और भवक्षय—ये दोनों प्रेमके वास्तविक 'फल' नहीं हैं। प्रेमसुखका भोग ही भगवद्-सेवाका मुख्य प्रयोजन है॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णसेवा आस्वादनका मुख्य फल ही प्रेम-सुख है, श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता ही जीवकी दरिद्रता है। इस दरिद्रताका नाश एवं संसार-क्षय श्रीकृष्णसेवा आस्वादनके साथ-साथ गौण-फलके रूपमें उदित होते हैं, वास्तवमें वे मुख्य फल नहीं हैं॥ 142 ॥ वेदोंमें श्रीकृष्ण-सम्बन्ध, भक्ति-अभिधेय, प्रेम-प्रयोजन :- वेदशास्त्रे कहे सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन। कृष्ण, कृष्णभक्ति, प्रेम,—तिन महाधन ॥ 143 ॥ अनुवाद—वेदशास्त्रोंमें श्रीकृष्णको सम्बन्ध, उनकी भक्तिको अभिधेय और श्रीकृष्णप्रेमको प्रयोजन कहा गया है। इसलिये श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्ण- प्रेम—ये तीनों महाधन हैं॥ 143 ॥ सम्बन्ध ज्ञानके साथ-ही-साथ भवबन्धनका कटना :- वेदादि सकल शास्त्रे कृष्ण—मुख्यसम्बन्ध। ताँर ज्ञाने आनुषङ्गे याय मायाबन्ध ॥ 144 ॥ अनुवाद—वेदादि समस्त शास्त्रोंमें श्रीकृष्णको मुख्य सम्बन्ध कहा गया है। उनका ज्ञान होनेपर मायाका बन्धन तो आनुषङ्गिक रूपमें अपने आप ही दूर हो जाता है॥ 144 ॥ समस्त पुराणों और आगमोंमें विष्णुके ही परमेश्वर होनेका वर्णन :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/4/142)—में उद्धृत पद्मपुराणके वैशाख-माहात्म्यमें यमब्राह्मण-संवादमें— व्यामोहाय चराचरस्य जगतस्ते ते पुराणागमा- स्तां तामेव हि देवतां परमिकां जल्पन्तु कल्पावधि। सिद्धान्ते पुनरेक एव भगवान् विष्णुः समस्तागम- व्यापारेषु विवेचनव्यतिकरं नीतेषु निश्चीयते ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे-वे पुराण और आगम ग्रन्थ सभी चाहे चर-अचर प्राणियोंके मोहको उत्पन्न करनेके लिये अपने-अपने उद्दिष्ट देवताओंको 'प्रधान' कहकर 'कल्प'-काल तक जल्पना करते रहें, तो भी उन सभी आगमादिका भली-भाँति विचार करके देखनेपर सिद्धान्तके अनुसार विष्णुको ही एकमात्र भगवान् कहकर निश्चित किया गया है॥ 145 ॥ अनुभाष्य— चराचरस्य (स्थिरजङ्गमस्य) जगतः व्यामोहाय (अज्ञान- तमोवर्द्धनाय) ते ते पुराणागमाः (स्मृतितन्त्रादयः) कल्पावधि (कल्पकालपर्यन्तं) तां तां देवताम् एव परमिकां (श्रेष्ठां) जल्पन्तु (कथयन्तु इत्युपहासे); पुनः (किन्तु) समस्तागमव्यापारेषु (समस्तानां सकलानाम् आगमानां शास्त्राणां व्यापारेषु प्रयोजनेषु) विवेचनव्यतिकरं (विवेचनस्य व्यापारस्य दूषणत्वेन तदेव स्कन्दपुराणादि-विचारस्य व्यतिकरः आसङ्गः तं) नीतेषु (प्रापितेषु सत्सु) सिद्धान्ते (विषये) विष्णुः एव एकः भगवान् (सर्वेश्वरः इति) निश्चीयते (निर्द्धार्यते, संस्थाप्यते इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145 ॥ अन्वय और व्यतिरेक रूपसे समस्त-वेदोंसे श्रीकृष्ण ही जानने योग्य और प्रतिपाद्य :- मुख्य-गौण-वृत्ति, किंवा अन्वय-व्यतिरेके। वेदेर प्रतिज्ञा केवल कहये कृष्णके ॥ 146 ॥ अनुवाद—मुख्य या गौण वृत्तिसे अथवा अन्वय और व्यतिरेक भावसे वेदोंको जाननेपर यह उपलब्धि होती है कि वेदोंका प्रतिपाद्य विषय केवल श्रीकृष्ण ही हैं॥ 146 ॥ अनुभाष्य—रूढ़ि और लक्षणा-वृत्ति अथवा अन्वय और व्यतिरेक दर्शनसे भी श्रीकृष्ण ही वेदोंके प्रतिपाद्य-विषयरूपमें निर्दिष्ट हैं॥ 146 ॥ शास्त्र प्रमाण; श्रीमुखकी वाणी :- श्रीमद्भागवत (11/21/42-43)में— किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्। इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद्द्वेद कश्चन ॥ 147 ॥ 244 |
बीसवाँ अध्याय 20/147-149 ] मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्। एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्। मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति ॥ 148 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 147-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-समस्त वेदवचन किसका विधान करते हैं और किसे प्रतिपादित करते हैं, किसे लक्ष्य करके विकल्प करते हैं-वेदोंके ऐसे तात्पर्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता। मैं कह रहा हूँ कि समस्त वेदवचन मेरा ही साक्षात् विधान और नाम लेते हैं एवं मुझे ही विकल्पके द्वारा वर्णन करते हैं। मैं ही समस्त वेदार्थोंका एकमात्र तात्पर्य हूँ। वेद मायामात्रका विचार करके उसे अन्तमें सम्पूर्णरूपसे निषेध करके प्रसन्न (विचारादिसे शान्त) होते हैं॥ 147-148 ॥ अनुभाष्य-वेदोंकी विधि और निषेधके सम्बन्धमें उद्धवके द्वारा जिज्ञासा करनेपर श्रीकृष्णने पहले वैदिक कर्मकाण्डकी फलश्रुति और फिर विविध वैदिक छन्दोंका वर्णन करके गूढ़ रहस्यमय बड़ी कठिनाईसे जानने योग्य समस्त त्रिकाण्डात्मक वेदोंके एकमात्र प्रतिपाद्य विषय और जानने योग्य वस्तु जो वे स्वयं ही हैं, उस विषयमें बतला रहे हैं, - [बृहत्याः वैखर्याः श्रुतेः साकल्येन स्वरूपतो दुर्ज्ञेयत्वमुक्त्वा अर्थतोऽपि दुर्ज्ञेयत्वमाह-] किं विधत्ते (कर्म-देव-ज्ञान- त्रिकाण्डात्मक-वेदशास्त्रमध्ये कर्मकाण्डे विधिवाक्यैः किं विदधाति), किम् आचष्टे (देवताकाण्डे मन्त्रवाक्यैः किं प्रकाशयति कथयतीत्यर्थः), किम् अनूद्य (ज्ञानकाण्डे किम् आश्रित्य) विकल्पयेत् इति (एवम्) अस्याः (श्रुतेः) हृदयं (तात्पर्यं) लोके (इह जगति) मत् (मत्तः) अन्यः कश्चन न वेद (जानाति)। [ननु तर्हि त्वं मत्कृपया कथयेति कथयति-] मां (यज्ञरूपं) [विधिना] विधत्ते, [अभिधा-वृत्त्या] मामेव (तत्तद्देवतारूपं) अभिधत्ते, अहम् (एव) विकल्प्य (सन्देहं कृत्वा) अपोह्यते (निराक्रियते, तदप्यहमेव, न मत्तः पृथगस्ति)। [सर्ववेदार्थं संक्षेपतः कथयति-] एतावान् एव सर्ववेदार्थः (सर्वेषां वेदानां तात्पर्यम्)-शब्दः (वेदः) भिदाम् (अवतारादिरूपाम्) अनूद्य (उक्त्वा) मायामात्रं (जगत्) प्रतिषिध्य (निषिद्ध्य) अन्ते (शेषे) मां (परमार्थरूपम्) आस्थाय (आश्रित्य) प्रसीदति (निवृत्तव्यापारो भवति; मां श्रीकृष्णरूपमेवावलम्ब्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-[भगवद्-वाणी श्रुतियोंसे भगवद्-स्वरूपकी सम्पूर्णरूपमें दुर्ज्ञेयताका वर्णन करके उस स्वरूपकी अर्थके द्वारा भी सम्पूर्णरूपसे दुर्ज्ञेयताका वर्णन करते हैं-] कर्म-देव-ज्ञानका वर्णन करनेवाले त्रिकाण्डात्मक वेदशास्त्रोंके मध्य अर्थात् कर्मकाण्डमें विधि वाक्योंसे किसका स्थापन किया जाता है, देवता- काण्डमें मन्त्रवाक्योंसे किसको प्रकाशित किया जाता है, ज्ञानकाण्डमें किसका आश्रय लेकर वेदोंका प्रतिपादन होता है, इस प्रकारसे इन श्रुतियोंके तात्पर्यको इस जगत्में मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं जानता है। [तब यदि उद्धव कहें कि आप मेरे ऊपर कृपाकर उसका वर्णन कीजिये, तो भगवान् उत्तरमें कहते हैं-] कर्मकाण्ड विधिके द्वारा यज्ञपुरुषरूप मेरा ही स्थापन करता है [अभिधा-वृत्तिसे] मुझे ही विभिन्न देवताओंके रूपमें सम्बोधित करता है [अभिधत्ते] और मेरे विषयमें ही पहले सन्देह उत्पन्नकर फिर उसका निराकरण करता है [अपोह्यते], वह निराकरण भी मैं ही हूँ, वह मुझसे भिन्न नहीं है। [अब समस्त वेदान्तको संक्षेपमें कहते हैं-] सभी वेदोंका तात्पर्य यह है-शब्द-प्रमाणरूप वेद अवतारादि रूप भेदोंका निरूपण करके [अनूद्य] मायामात्र जगत्का निषेधकर अन्तमें परमार्थ-तत्त्व रूप मेरा ही आश्रय लेकर परम प्रसन्न होते हैं अर्थात् अपने विवेचनके कार्यसे निवृत्ति प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि मुझ कृष्ण रूपका ही अवलम्बनकर वेद कृतकृत्य होते हैं॥ 147-148 ॥ अनन्तस्वरूप-श्रीकृष्णकी अनन्त-शक्तिका वैभव :- कृष्णेर स्वरूप-अनन्त, वैभव-अपार। चिच्छक्ति, मायाशक्ति, जीवशक्ति आर॥ 149 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके अनन्त स्वरूप हैं, उनका वैभव भी अपार है। वे चिद्-शक्ति, मायाशक्ति और जीवशक्तिके आश्रय हैं॥ 149 ॥ । 245
[ 20/150-155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चित् और अचित् जगत्—उनकी शक्तिका परिणाम एवं श्रीकृष्णाश्रित :— वैकुण्ठ, ब्रह्माण्डगण—शक्ति-कार्य हय। स्वरूपशक्ति शक्ति-कार्येरे—कृष्ण समाश्रय ॥ 150 ॥ अनुवाद—वैकुण्ठ और मायिक ब्रह्माण्ड, सभी श्रीकृष्णकी शक्तिका कार्य हैं। श्रीकृष्ण ही स्वरूपशक्ति और मायाशक्तिके कार्यरूप वैकुण्ठ एवं मायिक ब्रह्माण्डोंके एकमात्र आश्रय हैं॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपशक्ति और समस्त शक्तियोंके कार्यरूप जगत्,—श्रीकृष्ण ही इनके एकमात्र परम आश्रय हैं॥ 150 ॥ भावार्थदीपिका (श्रीमद्भागवत 10/1/1)में :— दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम्। श्रीकृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥ 151 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण नामक दशम पदार्थ ही भागवतके दशम स्कन्धका लक्ष्य हैं, वे आश्रितोंके आश्रयविग्रह स्वरूप हैं, परमधाम और जगत्के आधार स्वरूप हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/95 संख्या देखें ॥ 150 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार; वे—अद्वयज्ञान, विभु-सच्चिदानन्द, सर्वावतारी, किशोर और व्रजेन्द्रनन्दन :— कृष्णेर स्वरूप-विचार शुन, सनातन। अद्वयज्ञान-तत्त्व, व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 152 ॥ सर्व-आदि, सर्व-अंशी, किशोर-शेखर। चिदानन्द-देह, सर्वाश्रय, सर्वेश्वर ॥ 153 ॥ अनुवाद—हे सनातन, श्रीकृष्णके स्वरूपके विषयमें सुनो। श्रीकृष्ण अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, तथापि वे व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन हैं। वे सबके आदि अर्थात् मूल हैं और वे सबके अंशी अर्थात् सभी उनके अंश हैं। उनका नित्य परम मनोहर किशोर स्वरूप है और उनकी देह पूर्ण चिदानन्दमय है। वे सबके परम आश्रय और समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं॥ 152-153 ॥ अनुभाष्य—हे सनातन, श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार यह है कि श्रीकृष्ण व्रजधाममें व्रजपति नन्दके पुत्र हैं। वे अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, उनके नाम, रूप, गुण और लीला,—इन चार प्रकारके तत्त्वोंमें मायाजनित परस्पर भेद अथवा विरोध नहीं देखा जाता अर्थात् श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलामें मायिक भेद-विधि कोई कार्य नहीं करती है। श्रीकृष्ण समस्त विष्णुतत्त्वों और वैष्णवतत्त्वोंके आदि तत्त्व हैं; उन्हींसे ही सभी अंश प्रकट हुए हैं; वे पूर्ण किशोर अवस्थावाले हैं, सच्चिदानन्द विग्रह हैं, सभीके प्रभु और समस्त वस्तुओंके आश्रय हैं॥ 152-153 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/1)में :— ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ 154 ॥ अनुवाद—सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥ 154 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/107 संख्या देखें॥ 154 ॥ श्रीकृष्ण ही श्रीगोविन्द एवं गोलोकधाममें विराजमान :— स्वयं भगवान् कृष्ण, 'गोविन्द'—पर-नाम। सर्वैश्वर्यपूर्ण याँर गोलोक—नित्यधाम ॥ 155 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। 'गोविन्द' उनका मुख्य नाम है। समस्त प्रकारके ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण गोलोक उनका नित्यधाम है॥ 155 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पर-नाम'—श्रेष्ठ अर्थात् मुख्य नाम; 'कृष्ण', 'गोविन्द' आदि—भगवान्के मुख्य नाम हैं॥ 155 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका आवास स्थल—समस्त ऐश्वर्यपूर्ण, अविनाशी और नित्यकालस्थित गोलोक-धाम है॥ 155 ॥ 246 ।
बीसवाँ अध्याय 20/156-161 ] श्रीमद्भागवत (1/3/28)में :— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥ 156॥ अनुवाद—राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥ 156॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/67 संख्या देखें॥ 156॥ तीन प्रकारके अभिधेयोंमें सम्बन्ध-तत्त्व अद्वयज्ञान श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी प्रतीति :— ज्ञान, योग, भक्ति,—तिन साधनेर वशे। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्—त्रिविध प्रकाशे॥ 157॥ अनुवाद—ज्ञान, योग और भक्ति—इन तीन प्रकारके साधनोंके द्वारा श्रीकृष्ण क्रमशः ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन प्रकारके रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥ 157॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो निर्विशेष ज्ञानके द्वारा उन अद्वयतत्त्वका अनुसन्धान करते हैं, उनके लिये वे निर्विशेष ब्रह्म ही प्रतीत होते हैं। जो अष्टाङ्गयोग मार्गसे उस परम वस्तुका अनुसन्धान करते हैं, उनके हृदयमें स्थित होकर जगत्के परमात्मा उदित होते हैं। जो शुद्धभक्तिके द्वारा परम-तत्त्वका साधन करते हैं, वे भगवान्का दर्शन करते हैं॥ 157॥ शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (1/2/11)में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ 158॥ अनुवाद—जो अद्वयज्ञान अर्थात् एक अद्वितीय वास्तव वस्तु है, उसीको तत्त्वज्ञानीजन परमार्थ कहते हैं। वही तत्त्ववस्तु ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीनों नामोंसे जानी जाती है॥ 158॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/11 संख्या देखें॥ 158॥ (1) निर्विशेष ब्रह्म—श्रीकृष्णके अङ्गकी प्रभा :— ब्रह्म—अङ्गकान्ति ताँर, निर्विशेष-प्रकाशे। सूर्य येन चर्मचक्षे ज्योतिर्मय भासे॥ 159॥ अनुवाद—ब्रह्म श्रीकृष्णकी अङ्ग-कान्ति हैं और उनका निर्विशेष प्रकाश हैं। जिस प्रकार साधारण नेत्रोंसे सूर्य ज्योतिर्मय ही दिखलायी देता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी निर्विशेष ज्ञानियोंके समक्ष निर्विशेष ब्रह्मके रूपमें प्रतीत होते हैं॥ 159॥ शास्त्र-प्रमाण :— ब्रह्मसंहिता (5/40)में— यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि- कोटिष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम्। तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 160॥ अनुवाद—कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंमें समस्त पृथ्वी आदि ऐश्वर्योंके द्वारा पृथक्कृत, निष्कल, अनन्त, असीम ब्रह्म जिनकी प्रभासे उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 160॥ अनुभाष्य—आदिलीला, 2/14 संख्या देखें॥ 160॥ (2) परमात्मा—श्रीकृष्णांश-वैभव :— परमात्मा यैँहो, तैँहो कृष्णेर एक अंश। आत्मार 'आत्मा' हन कृष्ण—सर्व-अवतंस॥ 161॥ अनुवाद—जो परमात्मा हैं, वे भी श्रीकृष्णका ही एक अंश हैं। किन्तु श्रीकृष्ण समस्त आत्माओंके भी 'आत्मा' होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ हैं॥ 161॥ अनुभाष्य—मायिक अनुभूतिके द्वारा सर्वव्यापी परमात्माको मायिक जगत्के अंशसमूहका अंशी कहकर सर्वव्यापक 'परमात्मा' कहा जाता है। किन्तु श्रीकृष्ण समस्त चित्-अचित् प्रकाशके और समस्त परमात्माओंके भी 'परमात्मा' होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ हैं॥ 161॥ । 247
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[ 20/162–165 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला श्रीकृष्ण ही परमात्मा :— श्रीमद्भागवत (10/14/55)में— कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय योऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥ 162 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अखिल आत्माओंके आत्म- स्वरूपके रूपमें इन श्रीकृष्णको जानो; जगत्के हितकी कामनासे वे यहाँ स्वरूपशक्तिके आश्रयमें मनुष्यकी भाँति प्रकट हुए हैं ॥ 162 ॥ अनुभाष्य—परीक्षितके द्वारा श्रीकृष्णको व्रजवासियोंके पुत्र और प्राणादि सभी वस्तुओंकी अपेक्षा प्रियतम समझनेके कारणकी जिज्ञासा करनेपर श्रीशुकदेव कह रहे हैं कि आत्मा ही सभी प्राणियोंको सबसे अधिक प्रियतम और आदरणीय है एवं श्रीकृष्ण ही सभी आत्माओंकी आत्मा हैं, इसलिये स्वाभाविक रूपसे ही वे सभीको आकर्षण करनेवाले और नित्यानन्द प्रदान करनेवाले हैं,— त्वम् एनं कृष्णं अखिलात्मनां (सकलदेहिनाम्) आत्मानं (प्राणस्वरूपं) अवेहि (जानीहि); यः (कृष्णः) अपि अत्र (जगति) जगद्धिताय (पृथिव्याः मङ्गलाय) मायया (स्वरूपशक्त्या) देही (नरः जीवः) इव आभाति (प्रकाशयति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 162 ॥ श्रीमद्भगवद्गीता (10/42)में :— अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥ 163 ॥ अनुवाद—अथवा हे अर्जुन! इस पृथक्-पृथक् उपदिष्ट ज्ञानसे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? तुम मात्र इतना ही जानो कि मैं अपने एकांशसे इस समस्त जगत्को धारणकर अवस्थित हूँ ॥ 163 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/20 संख्या देखें ॥ 163 ॥ (3) भक्तियोगमें ही श्रीकृष्णकी पूर्ण भगवत्-प्रतीति :— 'भक्त्ये' ओ भगवानेर अनुभव—पूर्णरूप। एकइ विग्रहे ताँर अनन्त स्वरूप ॥ 164 ॥ अनुवाद—भक्तिके द्वारा ही भगवान्का पूर्णरूपमें अनुभव होता है। यद्यपि उनका एक ही विग्रह है, तथापि वे अनन्त स्वरूपोंमें अपना विस्तार कर सकते हैं ॥ 164 ॥ एक ही श्रीकृष्णके तीन रूप—(क) स्वयंरूप, (ख) तदेकात्मरूप और (ग) आवेशरूप :— स्वयंरूप, तदेकात्मरूप, आवेश—नाम। प्रथमेइ तिनरूपे रहेन भगवान् ॥ 165 ॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्ण स्वयंरूप, तदेकात्मरूप और आवेशरूप—इन तीन मुख्य रूपोंमें होते हैं ॥ 165 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तिसे भगवान्की उपासना करनेसे उनका पूर्णरूपमें अनुभव होता है, उन एक नित्यविग्रहसे अनन्तस्वरूप प्रकाशित होते हैं। भगवान् पहले 'स्वयंरूप', 'तदेकात्मरूप' और 'आवेशरूप'—इन तीन रूपोंमें पूर्णरूपसे दिखायी देते हैं। स्वयंरूपमें 'स्वयं और प्रकाश'—इन दो रूपोंमें उनकी स्फूर्ति होती है। उनमेंसे स्वयंरूपमें व्रजमें गोपमूर्तिरूपमें श्रीकृष्ण उदित हुए। भागवतामृतके मतानुसार,—श्रीकृष्णकी गोपमूर्ति ही स्वयंरूप है; क्योंकि, वह उनके और किसी भी रूपकी अपेक्षा नहीं करती। उनका जो रूप स्वयंरूपसे अभेद है, किन्तु आकृति और वैभवादिमें भिन्न है, उसे ही 'तदेकात्मरूप' कहते हैं। जिन सब जीवोंमें भगवान्की शक्ति प्रवेश करके उनके माध्यमसे महान कार्य करती है, वे ही भगवान्के 'आवेश'-रूप हैं ॥ 164-165 ॥ अनुभाष्य—'स्वयंरूप'—(श्रीरूपप्रभु-कृत लघु- भागवतामृतके पूर्व खण्डका 12वाँ श्लोक)— “अनन्यापेक्ष यद्रूपं स्वयंरूपः स उच्यते” “श्रीकृष्णका जो रूप अन्य रूपोंकी अपेक्षा नहीं करता अर्थात् स्वतःसिद्ध श्रीकृष्णरूपको ही 'स्वयंरूप' कहा जाता है।” 'तदेकात्मरूप'—(लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डमें 14वाँ श्लोक)— 248 ।
बीसवाँ अध्याय 20/165-170 ] “यद्रूपं तदभेदेन स्वरूपेण विराजते। आकृत्यादिभिरन्यादृक् स तदेकात्मरूपकः॥” “जो रूप स्वयंरूपके साथ एक रूपमें ही प्रकाशित होता है, किन्तु आकृति और वैभवादिमें (अङ्ग-गठन और चरित्रादिमें) भिन्न रूपमें प्रकाशित होता है, उसे 'तदेकात्मरूप' कहते हैं; वह—स्वांश और विलासके भेदसे दो प्रकारका है।” 'आवेशरूप'—(लघुभागवतामृतके पूर्वखण्डका 18वाँ श्लोक)— “ज्ञानशक्त्यादिकलया यत्राविष्टो जनार्दनः। त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः॥” “जिन सब जीवोंमें श्रीजनार्दन ज्ञान-शक्ति आदि कलाओंके द्वारा आविष्ट होते हैं, उन सब महत्तम जीवोंको 'आवेश' कहा जाता है॥” 165 ॥ (क) 'स्वयंरूप'—दो प्रकार के; (1) 'स्वयं रूप' व्रजेन्द्रनन्दन और (2) 'स्वयंप्रकाश' :— 'स्वयंरूप' 'स्वयंप्रकाश'—दुइरूपे स्फूर्ति। स्वयंरूपे—एक 'कृष्ण' व्रजे गोपमूर्ति॥ 166 ॥ अनुवाद—भगवान्का स्वयंरूप (मूल रूप) 'स्वयंरूप' और 'स्वयंप्रकाश'—इन दो रूपोंमें प्रकाशित होता है। स्वयंरूपमें श्रीकृष्ण व्रजमें गोपबालकके रूपमें प्रकाशित हैं॥ 166 ॥ श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासमेंसे (2) स्वयं प्रकाश दो प्रकारके—(क) प्राभव, और (ख) वैभव; उनमेंसे (क) प्राभवप्रकाशरूपमें अनेकरूपोंसे लीला या विलास जैसे रासमें, जैसे महिषी-विवाहमें :— 'प्राभव'-'वैभव'रूपे द्विविध प्रकाशे। एक-वपु बहु रूप यैछे हैल रासे॥ 167 ॥ महिषी-विवाहे हैल बहुविध मूर्ति। 'प्राभव-प्रकाश'—एइ शास्त्र-परसिद्धि॥ 168 ॥ अनुवाद—भगवान्का स्वयंप्रकाश दो प्रकारका होता है—'प्राभव'-प्रकाश और 'वैभव'-प्रकाश। जैसे रासमें एक ही विग्रह (जितनी गोपियाँ थीं, उनके साथ एक-एक रूपमें) अनेक रूपोंमें प्रकाशित हुआ। इसी प्रकार द्वारकामें एक ही विग्रह (सोलह हजार एक सौ आठ) महिषियोंके साथ विवाहमें उतने ही रूपोंमें प्रकाशित हुआ। विग्रहके इन विस्तारोंको शास्त्रोंमें 'प्राभव-प्रकाश' कहा जाता है॥ 167-168 ॥ वे आत्मारामगणोंके भी मनका हरण करनेवाले, कभी भी प्राकृत नहीं :— सौभर्यादि-प्राय सेइ कायव्यूह नय। कायव्यूह हैले नारदेर विस्मय ना हय॥ 169 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 169 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सौभरि आदि ऋषियोंने योगबलसे कायव्यूह होकर अपना-अपना कार्य सम्पन्न किया था। किन्तु श्रीकृष्णके द्वारा अनेक मूर्तियोंका प्रकाश वैसा नहीं है; क्योंकि, योगमार्गके कायव्यूहको देखकर नारदमें विस्मय उत्पन्न नहीं होता॥ 169 ॥ अमृतानुकणिका—नारदजी स्वयं कायव्यूहकी सृष्टि करना जानते हैं, इसलिये उन्हें कायव्यूह देखकर आश्चर्य नहीं होता। कायव्यूह योगबलसे निर्मित होता है, परन्तु प्रकाश वैसा नहीं है, इसमें एक ही देह भिन्न स्थानोंपर प्रकट होती है। श्रीकृष्णके विभु होनेके कारण उनके लिये यह सम्भव है। कायव्यूहमें क्रियाकी समानता होती है अर्थात् मूल कायके द्वारा की गयी क्रिया अन्य कायव्यूहमें भी वैसे ही फलित होती है। प्रकाशमें रूपकी समानता होती है और क्रियाओंमें विभिन्नता होती है, जैसा कि नारदजीने द्वारकाके विभिन्न महलोंमें देखा॥ 169 ॥ श्रीमद्भागवत (10/69/2) :— चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत् पृथक्। गृहेषु द्व्यष्टसाहस्रं स्त्रिय एक उदावहत्॥ 170 ॥ अनुवाद—आश्चर्यका विषय यह है कि एक ही श्रीकृष्णने एक-एक स्वरूपमें प्रत्येक घरमें एक साथ सोलह हजार स्त्रियोंके साथ विवाह किया॥ 170 ॥ । 249
[ 20/170-174 ] श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुभाष्य-आदिलीला 1/74 संख्या देखें ॥ 170 ॥ (ख) वैभव-प्रकाशकी संज्ञा :- सेइ वपु, सेइ आकृति पृथक् यदि भासे। भावावेश-भेदे नाम 'वैभवप्रकाश' ॥ 171 ॥ अनुवाद-भाव और आवेशके भेदसे जो देह और आकृति स्वयंरूपसे पृथक् प्रकाशित होती है-उसे 'वैभवप्रकाश' कहते हैं॥ 171 ॥ एक ही अंशी श्रीकृष्णके असंख्य प्राभव और वैभव-प्रकाशमें अचिन्त्यशक्तिके कारण परस्परमें नाम-रूपादिकी विचित्रता :- अनन्त-प्रकाशे कृष्णेर नाहि मूर्त्तिभेद। आकार-वर्ण-अस्त्रभेदे नाम-विभेद ॥ 172 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण-स्वरूपके अनन्त रूपोंमें प्रकाशित होनेपर भी उन सबमें कोई पार्थक्य नहीं है, किन्तु आकार, वर्ण और अस्त्रके भेदसे उनके भिन्न-भिन्न नाम हैं॥ 172 ॥ श्रीमद्भागवत (10/40/7)में :- अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते। यजन्ति तन्मयास्त्वां वै बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकम् ॥ 173 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 173 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-(सात्वत और शैव तन्त्रादिमें) उल्लिखित विधिके द्वारा जो संस्कृतात्मा [अर्थात् दीक्षा ग्रहण करनेके बाद पवित्र हो गये] हैं, वे अनेक मूर्तियोंमें [प्रकाशित] एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन करते हैं॥ 173 ॥ अनुभाष्य-भगवान् श्रीबलराम और श्रीकृष्णको रथमें चढ़ाकर गोकुलसे मथुरा लेकर जानेके मार्गमें महात्मा अक्रूर यमुनाके जलमें प्रवेश करके वहाँ विष्णुलोकमें शेष, नारद और चतुःसनादिके साथ परम ऐश्वर्यमय भगवान्के दर्शन करके स्तव करते-करते सांख्य-योगत्रयी मार्गका विषय बतलाकर वैष्णव और शैव-पाशुपतादि दीक्षामें दीक्षित व्यक्तियोंके उपासना-मार्गके सम्बन्धमें वर्णन कर रहे हैं,- अन्ये (जनाः) च ते (त्वया) अभिहितेन (कथितेन) विधिना (पाञ्चरात्रिकविधानादिना) संस्कृतात्मानः (वैष्णव-शैव- दीक्षाया-दीक्षिताः संस्कृताः आत्मानः येषां ते) तन्मयाः (तन्मयत्वेन आत्मानम् अप्राकृतसेवनधर्मपरं भावयन्तः त्वदेकप्रधाना इति वा) बहुमूर्त्येकमूर्त्तिकं (वासुदेव-सङ्कर्षण- प्रद्युम्नानिरुद्ध-भेदेन तथा युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदेन च बहुमूर्त्ति महानारायणरूपेण मूर्त्तिकं च त्वां) वै (एव) यजन्ति (अर्चयन्ति)। श्लोक-भावानुवाद-अन्य जन जो वैष्णव-शैव- दीक्षामें दीक्षित हो गये हैं, वे आपके द्वारा कथित पाञ्चरात्रिक विधिके अनुसार आपमें चित्तको निवेश करके वासुदेव-सङ्कर्षण-प्रद्युम्न-अनिरुद्ध-भेदसे तथा युग-मन्वन्तर-लीलावतारभेदसे अनेक मूर्तियोंमें प्रकाशित महानारायणरूप एकमूर्त्तिस्वरूप आपका ही भजन करते हैं॥ 173 ॥ (ख) वैभव प्रकाश-(1) श्रीबलराम :- वैभवप्रकाश कृष्णेर-श्रीबलराम। वर्णमात्र-भेद, सब-कृष्णेर समान ॥ 174 ॥ अनुवाद-श्रीबलराम श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं। श्रीकृष्णसे इनका केवल वर्णका भेद है, अन्यथा वे प्रकारसे श्रीकृष्णके समान ही हैं॥ 174 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-स्वयंरूप, तदेकात्मरूप, आवेश, वैभव, प्राभवादि समझनेके लिये परस्परका सम्बन्ध संक्षेपमें नीचे प्रदर्शित हुआ। श्रीकृष्णके आदि तीन रूप- (1) 'स्वयंरूप'-व्रजमें गोपमूर्त्ति श्रीकृष्ण, (2) 'तदेकात्मरूप'- (क) 'स्वांशक'- (i) कारणब्धिशायी, गर्भोदशायी, क्षीरोदशायी, (ii) मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंहादि। (ख) 'विलास'- (i) प्राभव-वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध; 250
बीसवाँ अध्याय 20/174-181 ] (ii) वैभव-चौबीस मूर्तियाँ- (क) आवरण-चतुर्व्यूहगत वासुदेवादि चार मूर्तियाँ; (ख) प्रत्येककी तीन-तीन मूर्तियाँ करके बारह मूर्तियाँ-बारह महीनों और तिलकोंके आदर्श देवता; (ग) इन चारोंकी पुरुषोत्तम और अच्युतादि आठ विलासमूर्तियाँ। इन चौबीस मूर्तियोंके ही अस्त्रधारणके भेदसे भिन्न-भिन्न नाम हैं॥ 174॥ (2) श्रीकृष्णरूपी द्विभुज श्रीवासुदेव अथवा श्रीदेवकीनन्दन, (3) श्रीकृष्णरूपी चतुर्भुज श्रीवासुदेव अथवा श्रीदेवकीनन्दन :- वैभवप्रकाश यैछे देवकी-तनुज। द्विभुज-स्वरूप कभु, कभु हन चतुर्भुज॥ 175॥ उक्त चतुर्भुज-उक्त द्विभुजका ही प्रकाश-विग्रह :- ये-काले द्विभुज, नाम-वैभवप्रकाश। चतुर्भुज हैले, नाम-प्राभवविलास॥ 176॥ अनुवाद-श्रीदेवकीनन्दन स्वयंरूप श्रीकृष्णके वैभव-प्रकाश हैं। वे श्रीदेवकीनन्दन कभी द्विभुज-स्वरूपमें और कभी चतुर्भुज-स्वरूपमें प्रकाशित होते हैं। जिस समय वे द्विभुज होते हैं, तब उनका नाम वैभवप्रकाश होता है। जब वे चतुर्भुज होते हैं, तब उनका नाम प्रभावविलास होता है॥ 175-176॥ व्रजेन्द्रनन्दनमें गोप-अभिमान और श्रीवासुदेवमें क्षत्रिय-अभिमान :- स्वयंरूपेर गोपवेश, गोप-अभिमान। वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश, 'आमि-क्षत्रिय'-ज्ञान॥ 177॥ श्रीवासुदेवकी अपेक्षा श्रीनन्दनन्दनमें चार अधिक चमत्कारिताएँ :- सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य, वैदग्ध्य-विलास। व्रजेन्द्रनन्दने इहा अधिक उल्लास॥ 178॥ अनुवाद-स्वयंरूपमें श्रीकृष्णका गोपवेश और गोप-अभिमान होता है। श्रीवासुदेवके रूपमें वे क्षत्रिय वेश धारण करते हैं और 'मैं क्षत्रिय हूँ'-ऐसा ज्ञान रहता है॥ 177॥ अनुवाद-अनुभाष्य देखें॥ 178॥ अनुभाष्य-वसुदेव-नन्दनके सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य और वैदग्ध्य-विलासकी अपेक्षा नन्दनन्दनके ये चार विलास अधिक आनन्द प्रदान करनेवाले हैं॥ 178॥ श्रीनन्दनन्दनके माधुर्यसे श्रीवासुदेव भी मुग्ध और आकृष्ट :- गोविन्देर माधुरी देखि' वासुदेवेर क्षोभ। से माधुरी आस्वादिते उपजाय लोभ॥ 179॥ दृष्टान्तस्थल-मथुरा और द्वारकामें :- मथुराय यैछे गन्धर्वनृत्य-दरशने। पुनः द्वारकाते यैछे चित्र-विलोकने॥ 180॥ अनुवाद-श्रीगोविन्दके माधुर्यको देखकर श्रीवासुदेव भी क्षुब्ध हो जाते हैं और उनमें उस माधुरीका आस्वादन करनेका लोभ उत्पन्न हो जाता है। जैसे मथुरामें गन्धर्व नृत्यको देखकर और पुनः द्वारकामें श्रीगोविन्दके अङ्कित चित्रको देखकर श्रीवासुदेवका चित्त श्रीगोविन्दकी ओर आकर्षित हो गया था॥ 179-180॥ अनुभाष्य-नन्दनन्दनके लोभनीय माधुर्यको देखकर श्रीवासुदेव क्षुब्ध हो जाते हैं; उस माधुरीके आस्वादनमें लुब्ध होनेका प्रसङ्ग मथुरामें गन्धर्व नृत्य-दर्शनमें और द्वारकामें नन्दनन्दन श्रीकृष्णके चित्राङ्कनको देखकर सुस्पष्ट हुआ है॥ 179॥ ललितमाधव (4/19)में :- उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी-परिमलस्याभीरलीलस्य मे द्वैतं हन्त समक्षयन् मुहुरसौ चित्रीयते चारणः। चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं सत्यं सखे मामकं यस्य प्रेक्ष्य स्वरूपतां व्रजवधूसारूप्यमन्विच्छति॥ 181॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 181॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे सखे, यह चारण (नट) मेरे । 251
[ 20/181-186 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला द्वितीय स्वरूपकी भाँति मेरी अद्भुत-माधुरीसुगन्धयुक्त गोपलीलात्मिका लीलाको चित्रित कर रहा है। मेरा चित्त केलि-कौतूहलके द्वारा द्रवीभूत होकर मेरे अपने चरित्रका दर्शन करते हुए व्रजवधुओंके सारूप्य अर्थात् उनके जैसे स्वरूपको धारण करनेकी इच्छा कर रहा है॥ 181 ॥ अनुभाष्य- हे सखे, असौ चारणः (नटः) उद्गीर्णाद्भुतमाधुरी-परिमलस्य (उद्गीर्णः उत्थितः निर्गतः अद्भुतायाः अपूर्वायाः माधुर्याः परिमलः सुगन्धः यस्य तस्य) आभीरलीलस्य (गोपनन्दनन्दन-लीलामयस्य) मे (मम) द्वैतं (द्वितीयमूर्त्तिं) समक्षयन् (दर्शयन्) मुहुः (पुनः पुनः) चित्रीयते; यस्य स्वरूपतां (सादृश्यं) प्रेक्ष्य (दृष्ट्वा) हन्त (अहो) मामकं (मदीयं) चेतः (मनः) सत्यं केलिकुतूहलोत्तरलितं (केलिषु व्रजजनोचितक्रीड़ासु कुतूहलाय उत्सुक्याय उत्तरलितम् अतिशयेन द्रवीभूतं सत्) व्रजवधूसारूप्यं (श्रीवार्षभानव्याः सदृशरूपतां) अन्विच्छति (वाञ्छति)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 181 ॥ ललितमाधव (8/34)में :- अपरिकलितपूर्वः कश्चमत्कारकारी स्फुरतु मम गरीयानेष माधुर्यपूरः। अयमहपि हन्त प्रेक्ष्य यं लुब्धचेताः सरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥ 182 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण बोले,-"अहो! ये प्रगाढ़ माधुर्य-चमत्कारकारी अनिर्वचनीय चित्रित श्रेष्ठ पुरुष कौन हैं? इनपर दृष्टि पड़ते ही मैं क्षुब्धचित्तसे इन्हें देखता ही जा रहा हूँ और राधिकाकी भाँति इनका बलपूर्वक आलिङ्गन करनेकी मेरी इच्छा हो रही है॥" 182 ॥ अनुभाष्य-आदिलीला 4/146 संख्या देखें ॥ 182 ॥ (ख) तदेकात्मरूपकी संज्ञा :- सेइ वपु भिन्नाभासे किछु भिन्नाकार। भावावेशाकृति-भेदे 'तदेकात्म'-नाम ताँर ॥ 183 ॥ अनुवाद-जब वह विग्रह भिन्न-आभासमें और कुछ भिन्न आकारमें प्रकट होता है, तब वह भाव, आवेश अथवा आकृतिके भेदके कारण 'तदेकात्म' कहलाता है ॥ 183 ॥ वह दो प्रकारका-(1) विलास और (2) स्वांश :- तदेकात्मरूपे 'विलास', 'स्वांश'-दुइ भेद। विलास, स्वांशेर भेदे विविध विभेद ॥ 184 ॥ अनुवाद-तदेकात्मरूपमें 'विलास' और 'स्वांश'-ये दो भेद होते हैं। विलास और स्वांशके भेदसे विविध विभेद (अर्थात् एकसे विकसित होकर अनेक रूप) होते हैं ॥ 184 ॥ अनुभाष्य- 'विलास'-आदिलीला 1/77 संख्या देखें। 'स्वांश'-लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें 17वाँ श्लोक- “तादृशो न्यूनशक्तिं यो व्यक्ति स्वांश ईरितः। सङ्कर्षणादि मत्स्यादिर्यथा तत्वत्वधामसु॥” स्वयंरूपके साथ अभिन्न होकर भी जो विलासकी अपेक्षा न्यून (बहुत कम) शक्ति प्रकाश करते हैं, उन्हें 'स्वांश' कहते हैं। जैसे अपने-अपने धाममें विराजमान सङ्कर्षणादि पुरुषावतार, मत्स्यादि लीलावतार, मन्वन्तरावतार और युगावतारगण ॥ 184 ॥ दो प्रकारके विलास-(क) प्राभव और (ख) वैभव :- प्राभव-वैभव-भेदे विलास-द्विधाकार। विलासेर विलास-भेद-अनन्त प्रकार ॥ 185 ॥ अनुवाद-प्राभव और वैभवके भेदसे विलास दो प्रकारके होते हैं। विलासके भी विलास-भेद असंख्य प्रकारके हैं ॥ 185 ॥ (क) प्राभवविलास-मथुरा और द्वारका-पुरीमें आदि चतुर्व्यूहकी चार मूर्तियाँ :- प्राभवविलास-वासुदेव, सङ्कर्षण। प्रद्युम्न, अनिरुद्ध,-मुख्य चारिजन ॥ 186 ॥ अनुवाद-श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और 252 |
बीसवाँ अध्याय 20/186-193 ] श्रीअनिरुद्ध-ये मुख्य चतुर्व्यूह 'प्राभवविलास' कहलाते हैं॥ 186॥ उनमेंसे एक मूर्तिमें ही श्रीबलराम-व्रजमें गोपाभिमानी और पुरमें क्षत्रियाभिमानी; विलास-संज्ञाका कारण :- व्रजे गोपभाव रामेर, पुरे क्षत्रिय-भावन। वर्ण-वेश-भेद, ताते 'विलास' ताँर नाम ॥ 187 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके समान ही श्रीबलरामका व्रजमें गोपभाव और मथुरा एवं द्वारकामें उनका क्षत्रिय होनेका अभिमान है। परन्तु श्रीकृष्णसे वर्ण और वेशका भेद होनेके कारण उन्हें 'विलास' कहा जाता है॥ 187॥ वैभवप्रकाशके रूपमें और प्राभवविलास (आदि चतुर्व्यूह) के रूपमें भावके भेदसे एक ही श्रीबलराम :- वैभवप्रकाशे आर प्राभवविलासे। एकइ मूर्त्ये बलदेव भाव-भेदे भासे ॥ 188 ॥ अनुवाद-वैभवप्रकाशमें और प्राभवविलासमें भावके भेदसे एक ही बलदेव प्रकाशित होते हैं॥ 188 ॥ अनुभाष्य-श्रीबलदेव-श्रीकृष्णके वैभवप्रकाश हैं; वे ही आदि-चतुर्व्यूह श्रीवासुदेव, श्रीसङ्कर्षण, श्रीप्रद्युम्न और श्रीअनिरुद्ध, - इन चार प्राभव विलासोंमें भावभेदसे (श्रीसङ्कर्षणरूपमें) प्रकाशित हैं॥ 188 ॥ प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूह ही समस्त चतुर्व्यूहरूपी वैभवविलासगणोंका कारण :- आदि-चतुर्व्यूह-केह नाहि इँहार सम। अनन्त चतुर्व्यूहगणेर प्राकट्य-कारण ॥ 189 ॥ वे ही पुरीके (मथुराके और द्वारकाधामके) अधीश्वर :- कृष्णेर एइ चारि प्राभवविलास। द्वारका-मथुरा-पुरे नित्य इँहार वास ॥ 190 ॥ अनुवाद-आदि चतुर्व्यूहके समान कोई नहीं है अर्थात् वे अद्वितीय हैं। वे ही अनन्त चतुर्व्यूहोंके प्राकट्यका कारण हैं। श्रीकृष्णके इन चार प्राभवविलासोंका नित्य ही द्वारकापुरी और मथुरापुरीमें वास है॥ 189-190 ॥ अनुभाष्य-अनन्त चतुर्व्यूहोंके गण आदि-चतुर्व्यूहके समान नहीं हैं; आदि-चतुर्व्यूह-प्राभवविलास हैं, अन्य चतुर्व्यूहगण-वैभवविलास हैं; प्राभवविलास ही वैभवविलासके प्राकट्यका कारण है। परव्योमके ऊपरी भागमें गोलोकके तीन प्रकारके प्रकोष्ठोंमें मथुरा और द्वारकापुरीमें श्रीकृष्णका प्राभवविलास नित्य अवस्थित है। गोकुलमें वैभवप्रकाश श्रीबलदेव नित्य विराजमान हैं। चारों प्राभवविलासोंमेंसे प्रत्येकके चारों हाथोंमें अस्त्रके भेदसे चौबीस मूर्तियोंके रूपमें वैभवविलास प्रकाशित हैं॥ 189-190 ॥ (1) आदि चतुर्व्यूहसे ही नाम और अस्त्रकी विचित्रतासे 24 प्रकारके 'वैभवविलास' :- एइ चारि हैते चब्बिश मूर्त्ति परकाश। अस्त्रभेदे नाम-भेद-वैभवविलास ॥ 191 ॥ अनुवाद-इन चारोंसे ही चौबीस मूर्तियाँ प्रकाशित होती हैं। चारों हाथोंमें धारण करनेवाले अस्त्रोंके भेदसे इनके नामोंमें भेद है। ये वैभवविलास कहलाते हैं॥ 191 ॥ (क) पुरमें आदि-चतुर्व्यूहके साथ श्रीकृष्ण ही वैकुण्ठमें दूसरे चतुर्व्यूहके साथ श्रीनारायणरूपमें विलासविग्रह :- पुनः कृष्ण चतुर्व्यूह लञा पूर्वरूपे। परव्योम-मध्ये वैसे नारायणरूपे ॥ 192 ॥ ताँहा हैते पुनः चतुर्व्यूह-परकाश। आवरणरूपे चारिदिके याँर वास ॥ 193 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्ण पुनः विस्तार करते हैं और पहलेकी भाँति चतुर्व्यूहको अपने साथ लेकर परव्योममें श्रीनारायणके रूपमें वास करते हैं। मूल चतुर्व्यूहसे पुनः द्वितीय चतुर्व्यूह प्रकाशित होता है, जिनके वासस्थान श्रीनारायणको चारों ओरसे आवृत करते हैं॥ 192-193 ॥ अनुभाष्य-ऊपरी गोलोकके नीचेवाले भागमें परव्योममें श्रीकृष्ण ही चतुर्भुजरूप होकर श्रीनारायणरूपमें विराजमान हैं। परव्योमनाथ श्रीनारायणसे पुनः आवरणरूपमें चारों ओर अनन्त चतुर्व्यूह प्रकाशित होते हैं॥ 192-193 ॥ । 253
[ 20/194-202 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला (ख) दूसरे चतुर्व्यूहमें प्रत्येकका तीन-मूर्तिके रूपमें प्रकाश-विग्रह-बारह मासों और बारह तिलकोंके बारह देवता :- चारिजनेर पुनः पृथक् तिन तिन मूर्ति। केशवादि यथा हैते विलासेर पूर्ति ॥ 194 ॥ अनुवाद-द्वितीय चतुर्व्यूह पुनः पृथक् तीन-तीन मूर्तियाँ धारण करते हैं जिनसे श्रीकेशवादि विलास- रूपोंकी पूर्ति होती है ॥ 194 ॥ इन बारह मूर्तिरूपमें वैभवविलासका परिचय :- चक्रादि-धारण-भेदे नाम-भेद सब। वासुदेवेर मूर्ति-केशव, नारायण, माधव ॥ 195 ॥ सङ्कर्षणेर मूर्ति-गोविन्द, विष्णु, श्रीमथुसूदन। ए अन्य गोविन्द-नहे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 196 ॥ प्रद्युम्नेर मूर्ति-त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर। अनिरुद्धेर मूर्ति-हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर ॥ 197 ॥ अनुवाद-चक्रादि धारणके भेदसे सबके नामोंका भेद है। श्रीवासुदेवकी मूर्तियाँ-श्रीकेशव, श्रीनारायण और श्रीमाधव हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तियाँ-श्रीगोविन्द, श्रीविष्णु और श्रीमथुसूदन हैं। श्रीसङ्कर्षणकी मूर्तिके रूपमें वर्णित श्रीगोविन्द अन्य श्रीगोविन्द हैं, व्रजेन्द्रनन्दन नहीं। श्रीप्रद्युम्नकी मूर्तियाँ-त्रिविक्रम, वामन और श्रीधर हैं और श्रीअनिरुद्धकी मूर्तियाँ-हृषिकेश, पद्मनाभ और दामोदर हैं ॥ 195-197 ॥ वे ही बारह मासोंके बारह देवता :- द्वादश-मासेर देवता-एइ बार जन। मार्गशीर्षे-केशव, पौषे-नारायण ॥ 198 ॥ माघेर देवता-माधव, गोविन्द-फाल्गुने। चैत्रे-विष्णु, वैशाखे-श्रीमधुसूदने ॥ 199 ॥ ज्येष्ठे-त्रिविक्रम, आषाढ़े-वामन देवेश। श्रावणे-श्रीधर, भाद्रे-देव हृषीकेश ॥ 200 ॥ आश्विने-पद्मनाभ, कार्तिके-दामोदर। 'राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र-कोडर ॥ 201 ॥ अनुवाद-बारह मासोंके देवता-यही बारह जन हैं। मार्गशीर्षके देवता श्रीकेशव, पौषके श्रीनारायण, माघके श्रीमाधव, फाल्गुनके श्रीगोविन्द, चैत्रके श्रीविष्णु, वैशाखके श्रीमथुसूदन, ज्येष्ठके श्रीत्रिविक्रम, आषाढ़के श्रीवामनदेव, श्रावणके श्रीधर, भाद्रके श्रीहृषीकेश, आश्विनके श्रीपद्मनाभ और कार्तिकके श्रीदामोदर हैं। ये श्रीदामोदर व्रजेन्द्रनन्दन 'श्रीराधा-दामोदर'से भिन्न हैं ॥ 198-201 ॥ पुनः वे ही बारह तिलक-मन्त्रोंके बारह मूर्ति देवता :- द्वादश-तिलक-मन्त्र एइ द्वादश नाम। आचमने एइ नामे स्पर्शि तत्तत्स्थान ॥ 202 ॥ अनुवाद-बारह तिलक-मन्त्रोंके भी यही बारह नाम हैं। आचमन करते समय इन नामोंका उच्चारण करते हुए ही उन-उन स्थानोंको स्पर्श करते हैं ॥ 202 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'आचमन'- आह्निकपूजाके बाद मुखसे जिस जल स्पर्शरूप आचमनका विधान है, वह ॥ 202 ॥ अनुभाष्य-बारह तिलकमन्त्रोंमें बारह विष्णूनाम (हःभःविः चतुर्थ विः 170-172 संख्या)- “ललाटे केशवं ध्यायेन्नारायणमथोदरे। वक्षःस्थले माधवन्तु गोविन्दं कण्ठकूपके॥ विष्णुञ्च दक्षिणे कुक्षौ बाहौ च मधुसूदनम्। त्रिविक्रमं कन्धरे तु वामनं वामपार्श्वके॥ श्रीधरं वामबाहौ तु हृषीकेशन्तु कन्धरे। पृष्ठे च पद्मनाभञ्च कट्यां दामोदरं न्यसेत् ॥” “ललाटमें केशव, उदरमें श्रीनारायण, वक्षःस्थलमें माधव, कण्ठकूपमें श्रीगोविन्द, पेटके दायें भागमें विष्णु, दाहिनी भुजामें मधुसूदन, दायें कन्धेमें त्रिविक्रम, पेटके बायें भागमें वामन, बायीं भुजामें श्रीधर, बायें कन्धेमें हृषिकेश, पीठमें पद्मनाभ और कमरमें दामोदरका ध्यान करके तिलकका न्यास (स्थापन) करें।” 254