श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/114-118 ]
तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञ-संज्ञिता। सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्त्तते॥ 115॥ अनुवाद—क्षेत्रज्ञ-शक्ति ही जीवशक्ति है; वह जीवशक्ति सर्वज्ञ होनेपर भी मायावृत्तिरूप अविद्याके द्वारा आवृत्त होकर संसारके समस्त तापोंको नित्य भोग करती है। और, वही 'क्षेत्रज्ञ'-नामक शक्ति अविद्या- कुण्ठासे आवृत्त होकर, हे भूपाल, सभी जीवोंमें तारतम्यके सहित वर्तमान रहती है। तात्पर्य यह है, भगवान्की चिद्-शक्ति-सर्वश्रेष्ठा, जीवशक्ति-मध्यमा और अविद्या-कर्म कहलानेवाली मायाशक्ति-अधमा है। जीवशक्ति मायाके द्वारा आवृत्त होकर अर्थात् चिद्- शक्तिकी वृत्तिसे दूर होकर संसारके तापोंको भोगती है। वह चिद्-शक्तिसे दूर रहते हुए अपने द्वारा किये हुए कर्मोंके चक्रमें प्रवेश करके ऊँची-नीची अवस्थाएँ प्राप्त करती है॥114-115॥ अनुभाष्य—मध्यलीला 6/155-156 संख्या देखें॥114-115॥ (3) बहिरङ्गा मायाशक्ति :— श्रीमद्भगवद्गीता (7/5)में— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥ 116॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥ 116॥ अनुभाष्य—आदिलीला 7/118 संख्या देखें॥116॥ (ख) विरूप-विचार; बद्धजीवका भवरोग और उसके फलस्वरूप दुर्दशा और सजा :— कृष्ण भुलि' सेइ जीव—अनादि बहिर्मुख। अतएव माया तारे देय संसार-दुःख॥ 117॥ अनुवाद—श्रीकृष्णको भूलनेके कारण ही जीव अनादिकालसे श्रीकृष्णसे बहिर्मुख हुआ है, इसलिये माया उसे संसाररूपी दुःख प्रदान करती है॥117॥
अमृतप्रवाह भाष्य—मैं श्रीकृष्णका नित्यदास हूँ,—इस बातको भूल जानेसे ही जीवका मायाबन्धन है। तटस्थशक्तिरूप जीवकी चिद्-जगत् और मायिक जगत्के सन्धिःसीमापर रहनेके समय मायाभोगकी वासना करनेके कारण उसका मायामें प्रवेश हुआ है। मायामें प्रवेश करनेसे ही मायिक-कालकी गणना है। उस काल गणनासे पहले ही बहिर्मुखता होनेके कारण उसे 'अनादि' कहा जाता है; क्योंकि वह मायिक-कालसे पहले हुआ है॥117॥
कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय। दण्ड्यजने राजा येन नदीते चुबाय॥ 118॥ अनुवाद—जैसे कभी राजा अपराधी व्यक्तिको दण्ड देनेके लिये उसे नदीमें डुबोने और पुनः उसे थोड़ी देरके लिये बाहर निकालनेका आदेश देता है जिससे वह मरे नहीं, उसी प्रकार माया जीवको उठाकर कभी तो स्वर्गमें ले जाती है और कभी उसे नरकमें डुबोती है॥118॥ अनुभाष्य—नित्यमुक्त जीव कभी भी श्रीकृष्णको नहीं भूलते, वे अनादिकालसे श्रीकृष्णोन्मुख रहकर हरिसेवारूपी अपनी नित्यवृत्तिमें स्थित रहते हैं। किन्तु जो सब जीव अपने श्रीकृष्ण-सेवाधिकारको भूलकर अनादिकालसे अपने कर्मफलोंसे उत्पन्न भोगवासनाके कारण मायाका अनुशीलन करके स्वयंको कर्मफलका भोक्ता मानते हैं, उनके कर्मफल-भोगका निर्णय मायाके द्वारा होता है। राजाके पुरस्कार और दण्डकी भाँति बद्धजीव भी मायाके द्वारा पुण्यकर्मके प्रभावसे स्वर्गमें देवताके पदपर आरूढ़ होकर सुख भोग करता है, पुनः पापके फलसे नरकादिमें क्लेश प्राप्त करता है॥118॥ अमृताणुकणिका—राजा जो अपराधी व्यक्तिको दण्ड देता है, वह केवल उसे दुःख भोग करानेके लिये नहीं होता। उस दुःख भोगका मुख्य उद्देश्य अपराधी व्यक्तिकी अपराध करनेकी वृत्तिको दूर करना होता है
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