श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1684, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/118-119 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला जिससे वह भविष्यमें अपराध करके दण्डका भागी न हो। इसलिये उद्देश्यके प्रति लक्ष्य करनेपर यह समझा जा सकता है कि राजाका दण्ड देना भी उस अपराधीके प्रति करुणा है। श्रीकृष्णको भूलकर जीव सुखकी आशासे इस जगत्में आता है। परन्तु (गीता 8/15)में भगवान् श्रीकृष्णने इस जगत्को 'दुःखालयमशाश्वतम्' कहा है। यहाँ जो सुख प्रतीत होता है, वह भी दुःखसे मिश्रित होता है और परिणाममें दुःख ही होता है। (गीता 9/20-21)में भगवान्ने कहा है,-'ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥ ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। अर्थात् अनेक पुण्य कर्मोंके फलस्वरूप जीव स्वर्गको प्राप्त करता है। वहाँ सुखभोग करनेपर पुण्य क्षीण होनेपर जीव पुनः मृत्युलोकमें पतित होता है।' इस प्रकार स्वर्गभोग भी नश्वर और अन्ततः दुःखपूर्ण है। अपने प्रयासोंसे जीव जन्म-मृत्युके हाथोंसे छुटकारा नहीं पा सकता, तब वह यह समझ जाता है कि सुखकी आशासे इस जगत्में आकर उसने बहुत बड़ी भूल की है। तब वह समझ सकता है कि कृष्ण- विमुखता ही उसकी मूल भूल है और भाग्यवशतः तब जीव कृष्णोन्मुख होनेकी चेष्टा कर सकता है। इसी उद्देश्यसे ही माया जीवको दुःख प्रदान करती है॥118॥ (ग) बद्धजीवका रोग; उसका उपाय और चिकित्सा अर्थात् पथ्य एवं औषधिके सेवनकी विधि :- श्रीमद्भागवत (11/2/37)में- भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्या- दीशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः। तन्माययातो बुध आभजेत्तं भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा॥ 119॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 119॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसे इतर (अन्य) जो माया है, उसमें अभिनिविष्ट जीवमें 'भय' उपस्थित होता है और उन ईश्वरसे बहिर्मुख होनेके कारण मायाजनित विपरीत स्मृति होती है; इसी कारण पण्डित व्यक्ति गुरुको 'देवता' और 'आत्म'-स्वरूप मानकर अनन्य- भक्तिके साथ उन परमेश्वरका भजन करेंगे॥119॥ अनुभाष्य-द्वारकापुरीमें श्रीवसुदेवकी जिज्ञासा करने पर देवर्षि नारदने भागवत-धर्मके वर्णनके प्रसङ्गमें विदेहराज निमि और नवयोगेन्द्रके संवादका वर्णन किया; राजा निमिके यज्ञमें नवयोगेन्द्रके आनेपर राजा निमिने उनसे भागवत-धर्मका वर्णन करनेकी प्रार्थना की, नवयोगेन्द्रोंमें एक 'कवि' ऋषि सर्वप्रथम भागवत धर्मके लक्षण बतलाकर बद्धजीवकी दुरावस्था और भगवद्भजनकी कर्त्तव्यताका उपदेश कर रहे हैं,- [यतः] ईशात् (भगवतः कृष्णात्) अपेतस्य (विमुखस्य बद्धजीवस्य) तन्मायया (तस्य भगवतः कृष्णस्य मायया बहिरङ्गशक्त्या) अस्मृतिः (भगवतः स्वरूपस्य असफूर्तिः धारणाभावः इत्यर्थः) [ततः] विपर्ययः (मायाकृत-कर्मफल-भोगपराभिमानः- स्वरूपस्मरणात् देहोऽस्मीति विवर्त्तमूल-बुद्धिवैपरीत्यमित्यर्थः) [ततः] द्वितीयाभिनिवेशतः (निज-भोगज-कल्पनात्-स्वरूपात् अन्यस्मिन् वस्तुनि देहादौ आवेशतः, स च देहाहङ्कारतः, स च स्वरूपामस्मरणात्) भयं (देहद्रविण-सुहृन्निमित्तं संसृतिः आशङ्काः वा) स्यात् (भवति)। अतः बुध (कृष्णोन्मुखो बुद्धिमान् जीवः) तम् (ईशम् अधोक्षजम् एव) गुरुदेवतात्मा (गुरुः एव देवता ईश्वरः, आत्मा प्रेष्ठश्च यस्य तथादृष्टिः सन्) एकया (केवलया अव्यभिचारिण्या एकान्तिक्या) भक्त्या (इतरज्ञान- कर्ममार्गानुसरणत्यागेन) आभजेत् (सम्यक् सेवेत)। श्लोक-भावानुवाद-जब भगवान् श्रीकृष्णसे विमुख बद्धजीवको भगवान् श्रीकृष्णकी माया (बहिरङ्गाशक्ति) के द्वारा भगवद् स्वरूपकी स्मृतिका अभाव होता है, तब उसे मायाकृत कर्मफलके भोक्ताके अभिमानसे और स्वरूपकी विस्मृतिसे मैं यह देह हूँ, ऐसी विपरीत बुद्धि होती है और तब द्वितीय-अभिनिवेश अर्थात् अपनेको भोक्ता मानकर अपने स्वरूपसे अन्य वस्तु-देहमें आवेश होनेके कारण देहमें आत्मबुद्धिके अहङ्कार और स्वरूपकी विस्मृतिके कारण देह-धन-सुहृदसे बिछुड़नेका 238 |