भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1685

भय होता है। इसलिये श्रीकृष्ण-उन्मुख बुद्धिमान् जीव गुरुदेवको आराध्य-देवता और प्रियतम जानकर भगवान्की ऐकान्तिक भक्तिके द्वारा (श्रीकृष्णसे अतिरिक्त ज्ञान- कर्ममार्गके अनुसरणको त्यागकर) सम्यक्रूपसे सेवा करेंगे ॥ 119 ॥

(घ) चिच्छक्तिमान् परमेश्वरके अवरोह अथवा अवतारका वर्णन; मायाको जीतनेका एकमात्र उपाय :- साधु-शास्त्र-कृपाय यदि कृष्णोन्मुख हय। सेइ जीव निस्तारे, माया ताहारे छाड़य ॥ 120 ॥ अनुवाद-साधु और शास्त्रकी कृपासे जीव जब श्रीकृष्णोन्मुख होता है, तब उस जीवका उद्धार होता है और माया उसे छोड़ देती है ॥ 120 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णबहिर्मुखतासे ही जीवका पतन होता है-यह साधु और शास्त्रकी कृपासे ही जाना जाता है। इसे जानकर जो जीव पुनः श्रीकृष्णोन्मुख होता है, उसका ही उद्धार होता है और माया उसे अपने चङ्गलसे मुक्त कर देती है ॥ 120 ॥ अनुभाष्य-श्रीकृष्ण-विमुख रहकर जीव संसारमें सुखभोगमें व्यस्त हो जाता है। वैष्णवकी कृपा और शास्त्रके अनुग्रहसे जीव कर्मफलभोग-वासनासे मुक्त होकर जब श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होता है, तब वह भोग करने अथवा मुक्त होनेकी पिपासासे छुटकारा प्राप्त करता है। श्रीकृष्णसेवा-परायण बुद्धि होनेसे विषयभोग- वासनारूपी माया उसे छोड़ देती है। श्रीकृष्ण-सेवोन्मुख होनेपर तब जीव पुनः अहंग्रहोपासनामें मत्त होकर मुक्तिकामी ज्ञानी अथवा विषय-भोगवासनासे फलभोगकामी होकर श्रीकृष्णसे भिन्न वस्तुओंमें आबद्ध नहीं होता, अपितु मायाके चङ्गलसे छुटकारा प्राप्त करता है ॥ 120 ॥

एकमात्र श्रीकृष्णके शरणागत भक्त ही मायाको जीतनेवाले :- श्रीमद्भगवद्गीता (7/14)में- दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ 121 ॥

अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 121 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-मेरी इस त्रिगुणमयी मायासे अत्यन्त कष्टसे पार हुआ जाता है; जो मेरे शरणागत होते हैं, वे ही केवल इस मायासे पार हो सकते हैं ॥ 121 ॥ अनुभाष्य- एषा मम (परमेश्वरस्य) दैवी (अलौकिकी वैष्णवी) गुणमयी (सत्त्वरजस्तमोमयी) माया (बहिरङ्गा शक्तिः) दुरत्यया (भुक्तिमुक्तिवासनाबद्धजीवानां दुरतिक्रमा) हि (एव); मां (स्वरूपशक्तियुक्तं स्वयं भगवन्तं कृष्णं) ये (जनाः) प्रपद्यन्ते (सर्वात्मना आश्रयं कुर्वन्ति), ते (एव) एतां मायां (जीवविमोहिनीं प्रकृतिं) तरन्ति (अतिक्रामन्ति पराजयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद-भुक्ति-मुक्तिकी वासनासे बद्ध जीवोंके लिये मुझ परमेश्वरकी इस अलौकिकी वैष्णवी (सत्त्व-रज-तमकी) त्रिगुणमयी बहिरङ्गा शक्तिका अतिक्रम करना अति दुष्कर है, किन्तु जो स्वरूपशक्तियुक्त स्वयं मुझ कृष्णका सभी प्रकारसे आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस जीव-विमोहिनी प्रकृतिको जय कर लेते हैं ॥ 121 ॥

जीवके प्रति अहैतुकी-कृपामय अधोक्षज विष्णुके द्वारा अपने अवतारका प्राकट्य :- मायामुग्ध जीवेर नाहि कृष्णस्मृति-ज्ञान। जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥ 122 ॥ अनुवाद-मायामुग्ध जीवको श्रीकृष्णका स्मृतिरूपी ज्ञान नहीं रहता, जीवपर कृपा करके ही श्रीकृष्णने वेदों और पुराणोंको प्रकाशित किया है ॥ 122 ॥ अनुभाष्य-मायामुग्ध जीव प्रतिक्षण प्रत्येक विषयमें स्वरूपविभ्रमके कारण अपने भोगफलको प्राप्त करनेमें लगे रहते हैं। कभी तो वे मायाबद्ध-बुद्धिसे फलभोगकी कामनासे छूटनेकी इच्छा करते हैं, कभी वे फलकामी बनकर अनित्य भोगोंका बहुत आदर करते हैं; दोनों अवस्थाओंमें ही, मायासे ढके होनेके कारण उनके श्रीकृष्ण-स्मरणका अभाव लक्षित होता है। इसलिये परमकरुणामय श्रीकृष्णने ऐसे भ्रान्तबुद्धि कुविचारपरायण