भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1693

बीसवाँ अध्याय 20/156-161 ] श्रीमद्भागवत (1/3/28)में :— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे॥ 156॥ अनुवाद—राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥ 156॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/67 संख्या देखें॥ 156॥ तीन प्रकारके अभिधेयोंमें सम्बन्ध-तत्त्व अद्वयज्ञान श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी प्रतीति :— ज्ञान, योग, भक्ति,—तिन साधनेर वशे। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्—त्रिविध प्रकाशे॥ 157॥ अनुवाद—ज्ञान, योग और भक्ति—इन तीन प्रकारके साधनोंके द्वारा श्रीकृष्ण क्रमशः ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीन प्रकारके रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥ 157॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जो निर्विशेष ज्ञानके द्वारा उन अद्वयतत्त्वका अनुसन्धान करते हैं, उनके लिये वे निर्विशेष ब्रह्म ही प्रतीत होते हैं। जो अष्टाङ्गयोग मार्गसे उस परम वस्तुका अनुसन्धान करते हैं, उनके हृदयमें स्थित होकर जगत्के परमात्मा उदित होते हैं। जो शुद्धभक्तिके द्वारा परम-तत्त्वका साधन करते हैं, वे भगवान्का दर्शन करते हैं॥ 157॥ शास्त्र-प्रमाण :— श्रीमद्भागवत (1/2/11)में— वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम्। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते॥ 158॥ अनुवाद—जो अद्वयज्ञान अर्थात् एक अद्वितीय वास्तव वस्तु है, उसीको तत्त्वज्ञानीजन परमार्थ कहते हैं। वही तत्त्ववस्तु ब्रह्म, परमात्मा और भगवान्—इन तीनों नामोंसे जानी जाती है॥ 158॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/11 संख्या देखें॥ 158॥ (1) निर्विशेष ब्रह्म—श्रीकृष्णके अङ्गकी प्रभा :— ब्रह्म—अङ्गकान्ति ताँर, निर्विशेष-प्रकाशे। सूर्य येन चर्मचक्षे ज्योतिर्मय भासे॥ 159॥ अनुवाद—ब्रह्म श्रीकृष्णकी अङ्ग-कान्ति हैं और उनका निर्विशेष प्रकाश हैं। जिस प्रकार साधारण नेत्रोंसे सूर्य ज्योतिर्मय ही दिखलायी देता है, उसी प्रकार श्रीकृष्ण भी निर्विशेष ज्ञानियोंके समक्ष निर्विशेष ब्रह्मके रूपमें प्रतीत होते हैं॥ 159॥ शास्त्र-प्रमाण :— ब्रह्मसंहिता (5/40)में— यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि- कोटिष्वशेषवसुधादिविभूतिभिन्नम्। तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥ 160॥ अनुवाद—कोटि-कोटि ब्रह्माण्डोंमें समस्त पृथ्वी आदि ऐश्वर्योंके द्वारा पृथक्कृत, निष्कल, अनन्त, असीम ब्रह्म जिनकी प्रभासे उत्पन्न हुए हैं, उन्हीं आदिपुरुष श्रीगोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥ 160॥ अनुभाष्य—आदिलीला, 2/14 संख्या देखें॥ 160॥ (2) परमात्मा—श्रीकृष्णांश-वैभव :— परमात्मा यैँहो, तैँहो कृष्णेर एक अंश। आत्मार 'आत्मा' हन कृष्ण—सर्व-अवतंस॥ 161॥ अनुवाद—जो परमात्मा हैं, वे भी श्रीकृष्णका ही एक अंश हैं। किन्तु श्रीकृष्ण समस्त आत्माओंके भी 'आत्मा' होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ हैं॥ 161॥ अनुभाष्य—मायिक अनुभूतिके द्वारा सर्वव्यापी परमात्माको मायिक जगत्के अंशसमूहका अंशी कहकर सर्वव्यापक 'परमात्मा' कहा जाता है। किन्तु श्रीकृष्ण समस्त चित्-अचित् प्रकाशके और समस्त परमात्माओंके भी 'परमात्मा' होनेके कारण सर्वश्रेष्ठ हैं॥ 161॥ । 247