श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1692, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/150-155 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला चित् और अचित् जगत्—उनकी शक्तिका परिणाम एवं श्रीकृष्णाश्रित :— वैकुण्ठ, ब्रह्माण्डगण—शक्ति-कार्य हय। स्वरूपशक्ति शक्ति-कार्येरे—कृष्ण समाश्रय ॥ 150 ॥ अनुवाद—वैकुण्ठ और मायिक ब्रह्माण्ड, सभी श्रीकृष्णकी शक्तिका कार्य हैं। श्रीकृष्ण ही स्वरूपशक्ति और मायाशक्तिके कार्यरूप वैकुण्ठ एवं मायिक ब्रह्माण्डोंके एकमात्र आश्रय हैं॥ 150 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—स्वरूपशक्ति और समस्त शक्तियोंके कार्यरूप जगत्,—श्रीकृष्ण ही इनके एकमात्र परम आश्रय हैं॥ 150 ॥ भावार्थदीपिका (श्रीमद्भागवत 10/1/1)में :— दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम्। श्रीकृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥ 151 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण नामक दशम पदार्थ ही भागवतके दशम स्कन्धका लक्ष्य हैं, वे आश्रितोंके आश्रयविग्रह स्वरूप हैं, परमधाम और जगत्के आधार स्वरूप हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ॥ 150 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/95 संख्या देखें ॥ 150 ॥ श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार; वे—अद्वयज्ञान, विभु-सच्चिदानन्द, सर्वावतारी, किशोर और व्रजेन्द्रनन्दन :— कृष्णेर स्वरूप-विचार शुन, सनातन। अद्वयज्ञान-तत्त्व, व्रजे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 152 ॥ सर्व-आदि, सर्व-अंशी, किशोर-शेखर। चिदानन्द-देह, सर्वाश्रय, सर्वेश्वर ॥ 153 ॥ अनुवाद—हे सनातन, श्रीकृष्णके स्वरूपके विषयमें सुनो। श्रीकृष्ण अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, तथापि वे व्रजमें व्रजेन्द्रनन्दन हैं। वे सबके आदि अर्थात् मूल हैं और वे सबके अंशी अर्थात् सभी उनके अंश हैं। उनका नित्य परम मनोहर किशोर स्वरूप है और उनकी देह पूर्ण चिदानन्दमय है। वे सबके परम आश्रय और समस्त ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं॥ 152-153 ॥ अनुभाष्य—हे सनातन, श्रीकृष्णके स्वरूपका विचार यह है कि श्रीकृष्ण व्रजधाममें व्रजपति नन्दके पुत्र हैं। वे अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, उनके नाम, रूप, गुण और लीला,—इन चार प्रकारके तत्त्वोंमें मायाजनित परस्पर भेद अथवा विरोध नहीं देखा जाता अर्थात् श्रीकृष्णके नाम, रूप, गुण और लीलामें मायिक भेद-विधि कोई कार्य नहीं करती है। श्रीकृष्ण समस्त विष्णुतत्त्वों और वैष्णवतत्त्वोंके आदि तत्त्व हैं; उन्हींसे ही सभी अंश प्रकट हुए हैं; वे पूर्ण किशोर अवस्थावाले हैं, सच्चिदानन्द विग्रह हैं, सभीके प्रभु और समस्त वस्तुओंके आश्रय हैं॥ 152-153 ॥ ब्रह्मसंहिता (5/1)में :— ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम् ॥ 154 ॥ अनुवाद—सच्चिदानन्द-विग्रह श्रीकृष्ण ही परमेश्वर हैं; वे स्वयं अनादि और सभीके आदि एवं समस्त कारणोंके कारण हैं॥ 154 ॥ अनुभाष्य—आदिलीला 2/107 संख्या देखें॥ 154 ॥ श्रीकृष्ण ही श्रीगोविन्द एवं गोलोकधाममें विराजमान :— स्वयं भगवान् कृष्ण, 'गोविन्द'—पर-नाम। सर्वैश्वर्यपूर्ण याँर गोलोक—नित्यधाम ॥ 155 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। 'गोविन्द' उनका मुख्य नाम है। समस्त प्रकारके ऐश्वर्योंसे परिपूर्ण गोलोक उनका नित्यधाम है॥ 155 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पर-नाम'—श्रेष्ठ अर्थात् मुख्य नाम; 'कृष्ण', 'गोविन्द' आदि—भगवान्के मुख्य नाम हैं॥ 155 ॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णका आवास स्थल—समस्त ऐश्वर्यपूर्ण, अविनाशी और नित्यकालस्थित गोलोक-धाम है॥ 155 ॥ 246 ।