श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1691, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/147-149 ] मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते त्वहम्। एतावान् सर्ववेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्। मायामात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति ॥ 148 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 147-148 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-समस्त वेदवचन किसका विधान करते हैं और किसे प्रतिपादित करते हैं, किसे लक्ष्य करके विकल्प करते हैं-वेदोंके ऐसे तात्पर्यको मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं जानता। मैं कह रहा हूँ कि समस्त वेदवचन मेरा ही साक्षात् विधान और नाम लेते हैं एवं मुझे ही विकल्पके द्वारा वर्णन करते हैं। मैं ही समस्त वेदार्थोंका एकमात्र तात्पर्य हूँ। वेद मायामात्रका विचार करके उसे अन्तमें सम्पूर्णरूपसे निषेध करके प्रसन्न (विचारादिसे शान्त) होते हैं॥ 147-148 ॥ अनुभाष्य-वेदोंकी विधि और निषेधके सम्बन्धमें उद्धवके द्वारा जिज्ञासा करनेपर श्रीकृष्णने पहले वैदिक कर्मकाण्डकी फलश्रुति और फिर विविध वैदिक छन्दोंका वर्णन करके गूढ़ रहस्यमय बड़ी कठिनाईसे जानने योग्य समस्त त्रिकाण्डात्मक वेदोंके एकमात्र प्रतिपाद्य विषय और जानने योग्य वस्तु जो वे स्वयं ही हैं, उस विषयमें बतला रहे हैं, - [बृहत्याः वैखर्याः श्रुतेः साकल्येन स्वरूपतो दुर्ज्ञेयत्वमुक्त्वा अर्थतोऽपि दुर्ज्ञेयत्वमाह-] किं विधत्ते (कर्म-देव-ज्ञान- त्रिकाण्डात्मक-वेदशास्त्रमध्ये कर्मकाण्डे विधिवाक्यैः किं विदधाति), किम् आचष्टे (देवताकाण्डे मन्त्रवाक्यैः किं प्रकाशयति कथयतीत्यर्थः), किम् अनूद्य (ज्ञानकाण्डे किम् आश्रित्य) विकल्पयेत् इति (एवम्) अस्याः (श्रुतेः) हृदयं (तात्पर्यं) लोके (इह जगति) मत् (मत्तः) अन्यः कश्चन न वेद (जानाति)। [ननु तर्हि त्वं मत्कृपया कथयेति कथयति-] मां (यज्ञरूपं) [विधिना] विधत्ते, [अभिधा-वृत्त्या] मामेव (तत्तद्देवतारूपं) अभिधत्ते, अहम् (एव) विकल्प्य (सन्देहं कृत्वा) अपोह्यते (निराक्रियते, तदप्यहमेव, न मत्तः पृथगस्ति)। [सर्ववेदार्थं संक्षेपतः कथयति-] एतावान् एव सर्ववेदार्थः (सर्वेषां वेदानां तात्पर्यम्)-शब्दः (वेदः) भिदाम् (अवतारादिरूपाम्) अनूद्य (उक्त्वा) मायामात्रं (जगत्) प्रतिषिध्य (निषिद्ध्य) अन्ते (शेषे) मां (परमार्थरूपम्) आस्थाय (आश्रित्य) प्रसीदति (निवृत्तव्यापारो भवति; मां श्रीकृष्णरूपमेवावलम्ब्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद-[भगवद्-वाणी श्रुतियोंसे भगवद्-स्वरूपकी सम्पूर्णरूपमें दुर्ज्ञेयताका वर्णन करके उस स्वरूपकी अर्थके द्वारा भी सम्पूर्णरूपसे दुर्ज्ञेयताका वर्णन करते हैं-] कर्म-देव-ज्ञानका वर्णन करनेवाले त्रिकाण्डात्मक वेदशास्त्रोंके मध्य अर्थात् कर्मकाण्डमें विधि वाक्योंसे किसका स्थापन किया जाता है, देवता- काण्डमें मन्त्रवाक्योंसे किसको प्रकाशित किया जाता है, ज्ञानकाण्डमें किसका आश्रय लेकर वेदोंका प्रतिपादन होता है, इस प्रकारसे इन श्रुतियोंके तात्पर्यको इस जगत्में मेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं जानता है। [तब यदि उद्धव कहें कि आप मेरे ऊपर कृपाकर उसका वर्णन कीजिये, तो भगवान् उत्तरमें कहते हैं-] कर्मकाण्ड विधिके द्वारा यज्ञपुरुषरूप मेरा ही स्थापन करता है [अभिधा-वृत्तिसे] मुझे ही विभिन्न देवताओंके रूपमें सम्बोधित करता है [अभिधत्ते] और मेरे विषयमें ही पहले सन्देह उत्पन्नकर फिर उसका निराकरण करता है [अपोह्यते], वह निराकरण भी मैं ही हूँ, वह मुझसे भिन्न नहीं है। [अब समस्त वेदान्तको संक्षेपमें कहते हैं-] सभी वेदोंका तात्पर्य यह है-शब्द-प्रमाणरूप वेद अवतारादि रूप भेदोंका निरूपण करके [अनूद्य] मायामात्र जगत्का निषेधकर अन्तमें परमार्थ-तत्त्व रूप मेरा ही आश्रय लेकर परम प्रसन्न होते हैं अर्थात् अपने विवेचनके कार्यसे निवृत्ति प्राप्त करते हैं। तात्पर्य यह है कि मुझ कृष्ण रूपका ही अवलम्बनकर वेद कृतकृत्य होते हैं॥ 147-148 ॥ अनन्तस्वरूप-श्रीकृष्णकी अनन्त-शक्तिका वैभव :- कृष्णेर स्वरूप-अनन्त, वैभव-अपार। चिच्छक्ति, मायाशक्ति, जीवशक्ति आर॥ 149 ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके अनन्त स्वरूप हैं, उनका वैभव भी अपार है। वे चिद्-शक्ति, मायाशक्ति और जीवशक्तिके आश्रय हैं॥ 149 ॥ । 245