भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1690

[ 20/142-147 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला अनुवाद—दरिद्रताका नाश और भवक्षय—ये दोनों प्रेमके वास्तविक 'फल' नहीं हैं। प्रेमसुखका भोग ही भगवद्-सेवाका मुख्य प्रयोजन है॥ 142 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णसेवा आस्वादनका मुख्य फल ही प्रेम-सुख है, श्रीकृष्ण-बहिर्मुखता ही जीवकी दरिद्रता है। इस दरिद्रताका नाश एवं संसार-क्षय श्रीकृष्णसेवा आस्वादनके साथ-साथ गौण-फलके रूपमें उदित होते हैं, वास्तवमें वे मुख्य फल नहीं हैं॥ 142 ॥ वेदोंमें श्रीकृष्ण-सम्बन्ध, भक्ति-अभिधेय, प्रेम-प्रयोजन :- वेदशास्त्रे कहे सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन। कृष्ण, कृष्णभक्ति, प्रेम,—तिन महाधन ॥ 143 ॥ अनुवाद—वेदशास्त्रोंमें श्रीकृष्णको सम्बन्ध, उनकी भक्तिको अभिधेय और श्रीकृष्णप्रेमको प्रयोजन कहा गया है। इसलिये श्रीकृष्ण, श्रीकृष्णभक्ति और श्रीकृष्ण- प्रेम—ये तीनों महाधन हैं॥ 143 ॥ सम्बन्ध ज्ञानके साथ-ही-साथ भवबन्धनका कटना :- वेदादि सकल शास्त्रे कृष्ण—मुख्यसम्बन्ध। ताँर ज्ञाने आनुषङ्गे याय मायाबन्ध ॥ 144 ॥ अनुवाद—वेदादि समस्त शास्त्रोंमें श्रीकृष्णको मुख्य सम्बन्ध कहा गया है। उनका ज्ञान होनेपर मायाका बन्धन तो आनुषङ्गिक रूपमें अपने आप ही दूर हो जाता है॥ 144 ॥ समस्त पुराणों और आगमोंमें विष्णुके ही परमेश्वर होनेका वर्णन :- भक्तिरसामृतसिन्धु (2/4/142)—में उद्धृत पद्मपुराणके वैशाख-माहात्म्यमें यमब्राह्मण-संवादमें— व्यामोहाय चराचरस्य जगतस्ते ते पुराणागमा- स्तां तामेव हि देवतां परमिकां जल्पन्तु कल्पावधि। सिद्धान्ते पुनरेक एव भगवान् विष्णुः समस्तागम- व्यापारेषु विवेचनव्यतिकरं नीतेषु निश्चीयते ॥ 145 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वे-वे पुराण और आगम ग्रन्थ सभी चाहे चर-अचर प्राणियोंके मोहको उत्पन्न करनेके लिये अपने-अपने उद्दिष्ट देवताओंको 'प्रधान' कहकर 'कल्प'-काल तक जल्पना करते रहें, तो भी उन सभी आगमादिका भली-भाँति विचार करके देखनेपर सिद्धान्तके अनुसार विष्णुको ही एकमात्र भगवान् कहकर निश्चित किया गया है॥ 145 ॥ अनुभाष्य— चराचरस्य (स्थिरजङ्गमस्य) जगतः व्यामोहाय (अज्ञान- तमोवर्द्धनाय) ते ते पुराणागमाः (स्मृतितन्त्रादयः) कल्पावधि (कल्पकालपर्यन्तं) तां तां देवताम् एव परमिकां (श्रेष्ठां) जल्पन्तु (कथयन्तु इत्युपहासे); पुनः (किन्तु) समस्तागमव्यापारेषु (समस्तानां सकलानाम् आगमानां शास्त्राणां व्यापारेषु प्रयोजनेषु) विवेचनव्यतिकरं (विवेचनस्य व्यापारस्य दूषणत्वेन तदेव स्कन्दपुराणादि-विचारस्य व्यतिकरः आसङ्गः तं) नीतेषु (प्रापितेषु सत्सु) सिद्धान्ते (विषये) विष्णुः एव एकः भगवान् (सर्वेश्वरः इति) निश्चीयते (निर्द्धार्यते, संस्थाप्यते इत्यर्थः)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 145 ॥ अन्वय और व्यतिरेक रूपसे समस्त-वेदोंसे श्रीकृष्ण ही जानने योग्य और प्रतिपाद्य :- मुख्य-गौण-वृत्ति, किंवा अन्वय-व्यतिरेके। वेदेर प्रतिज्ञा केवल कहये कृष्णके ॥ 146 ॥ अनुवाद—मुख्य या गौण वृत्तिसे अथवा अन्वय और व्यतिरेक भावसे वेदोंको जाननेपर यह उपलब्धि होती है कि वेदोंका प्रतिपाद्य विषय केवल श्रीकृष्ण ही हैं॥ 146 ॥ अनुभाष्य—रूढ़ि और लक्षणा-वृत्ति अथवा अन्वय और व्यतिरेक दर्शनसे भी श्रीकृष्ण ही वेदोंके प्रतिपाद्य-विषयरूपमें निर्दिष्ट हैं॥ 146 ॥ शास्त्र प्रमाण; श्रीमुखकी वाणी :- श्रीमद्भागवत (11/21/42-43)में— किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्। इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद्द्वेद कश्चन ॥ 147 ॥ 244 |