श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशुद्धजीवसत्तासे रहित सायुज्य अथवा कैवल्यरूपी सर्पके मुखमें गिरकर भी धन प्राप्त नहीं करता ॥ 132-135 ॥
शुद्धभक्तिके बलसे श्रीकृष्णप्रेमकी प्राप्ति ही सभी शास्त्रोंका तात्पर्य :- ऐछे शास्त्र कहे, - कर्म, ज्ञान, योग त्यजि'। 'भक्त्ये' कृष्ण वश हय, भक्त्ये ताँरे भजि ॥ 136 ॥
अनुवाद-इसी प्रकार शास्त्र कहते हैं, -कर्म, ज्ञान और योगको त्यागकर भक्तिके द्वारा श्रीकृष्णका भजन करना चाहिये जिसके द्वारा श्रीकृष्ण वशीभूत हो जाते हैं ॥ 136 ॥
भगवान् भक्तके लिये ही प्राप्य; भक्तिके बलसे ही अशुद्ध भी पवित्र :- श्रीमद्भागवत (11/14/20-21) में- न साधयति मां योगो न सांख्यं धर्म उद्धव। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो यथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥ 137 ॥
अनुवाद-हे उद्धव ! मेरी प्रति की गयी प्रबला भक्ति जिस प्रकार मुझे वशीभूत कर सकती है, अष्टाङ्ग-योग, अभेद-ब्रह्मवादरूप सांख्यज्ञान, ब्राह्मणोंका स्वशाखा-अध्ययनरूप स्वाध्याय, सब प्रकारकी तपस्या और त्यागरूप संन्यासादिके द्वारा मुझे वैसा वशीभूत नहीं किया जा सकता ॥ 137 ॥
अनुभाष्य-आदिलीला 17/76 संख्या देखें ॥ 137 ॥
भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम्। भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात् ॥ 138 ॥
अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य-साधुओंका प्रिय मैं, अनन्य श्रद्धासे उत्पन्न भक्तिके द्वारा ही प्राप्त होता हूँ। भक्ति ही मुझमें निष्ठा रखनेवाले चण्डालका भी जन्मदोषसे उद्धार करती है ॥ 138 ॥
अनुभाष्य-उद्धवजीके प्रश्नके उत्तरमें श्रीकृष्णकी उक्ति,-
सतां (नित्यसेवकानां सज्जनानां) प्रियः (सेव्यः) आत्मा (प्रेष्ठः) अहम् (स्वयं भगवान् कृष्णः) एकया (अव्यभिचारिण्या, अहैतुक्या) श्रद्धया (श्रद्धापूर्वकिया) भक्त्या ग्राह्यः (साध्यः, प्राप्यः, लभ्यः इत्यर्थः); मन्निष्ठा (कृष्णैकसेवनधर्म-तत्परा) भक्तिः श्वपाकान् (नीचकुलोद्द्भवान् जनान्) अपि सम्भवात् (प्राक्तन-दुष्कृति-जनित-शौक्र-जाति-दोषात्) पुनाति।
श्लोक-भावानुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 138 ॥
सभी शास्त्रोंमें श्रीकृष्णप्राप्तिके साधन- 'भक्ति' को ही अभिधेय होनेका गान :- अतएव 'भक्ति'-कृष्णप्राप्तयेर उपाय। 'अभिधेय' बलि' तारे सर्वशास्त्रे गाय ॥ 139 ॥
अनुवाद-इसलिये भक्ति ही श्रीकृष्ण-प्राप्तिका उपाय है। सभी शास्त्र इसी 'भक्ति'को ही 'अभिधेय' कहकर वर्णन करते हैं ॥ 139 ॥
दृष्टान्त :- धन पाइले यैछे सुखभोग-फल पाय। सुखभोग हैते दुःख आपनि पलाय ॥ 140 ॥
सम्बन्धयुक्त सेवाके फलसे श्रीकृष्णप्रीतकी वृद्धि; उसके साथ-ही-साथ मुक्ति अथवा अनर्थ-निवृत्ति :- तैछे भक्ति-फले कृष्णे प्रेम उपजाय। प्रेमे कृष्णास्वाद हैले भव नाश पाय ॥ 141 ॥
अनुवाद-धन प्राप्त होनेसे जैसे सुखभोगरूप फलकी प्राप्ति होती है और सुखभोगसे दुःख अपने आप ही दूर हो जाते हैं। इसी प्रकार भक्तिके फलसे श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न होता है और प्रेममें श्रीकृष्णआस्वादन होनेपर भवनाश (पुनः जन्म-मृत्युके चक्रका नाश) हो जाता है ॥ 140-141 ॥
श्रीकृष्णप्रीतिमूलक सेवाका मुख्य फल - श्रीकृष्णप्रेमानन्दकी प्राप्ति, गौणफल - विमुखताका दूर होना और मुक्ति :- दारिद्रय-नाश, भवक्षय,-प्रेमेर 'फल' नय। प्रेमसुख-भोग-मुख्य प्रयोजन हय ॥ 142 ॥