श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1688, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/132-135 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला ततैये और मधुमक्खियाँ निकलेंगे और तुम्हें धनकी प्राप्ति नहीं होगी॥ 132 ॥ (2) विभूति-सिद्धिकी प्राप्तिके लिये योगमार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 'यक्ष' एक हय। से विघ्न करिबे,—धने हात ना पड़य ॥ 133 ॥ अनुवाद—यदि तुम पश्चिम भागमें खोदोगे, तो वहाँ एक यक्ष है, वह ऐसी बाधा उत्पन्न करेगा, जिससे धन तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा ॥ 133 ॥ (3) सायुज्य प्राप्तिके लिये ज्ञान-मार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'उत्तरे' खुदिले आछे कृष्ण-'अजगरें'। धन नाहि पाबे, खुदिते गिलिबे सबारे ॥ 134 ॥ अनुवाद—उत्तर भागमें खोदनेपर देखोगे कि वहाँ काले रङ्गका अजगर है। तुम्हें धन तो मिलेगा नहीं, अपितु वही अजगर ही खोदनेवालेको निगल जायेगा ॥ 134 ॥ पूर्व अथवा पुराण अथवा नित्य शाश्वत धन श्रीकृष्णभक्ति ही एकमात्र विपत्ति-रहित :- पूर्वादिके ताते माटी अल्प खुदिते। धनेर झारि पड़िबेक तोमार हातेते ॥ 135 ॥ अनुवाद—पूर्व दिशामें थोड़ी सी मिट्टी खोदनेपर ही धनकी मटकी तुम्हारे हाथ लगेगी ॥ 135 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—वेद और पुराण शास्त्रोंमें अनेक प्रकारके उपायोंकी बात स्थान-स्थानपर लिखी है; उसमें किसी ओर ततैय्यारूप कर्मकाण्ड, किसी ओर ज्ञान- काण्डरूपी यक्ष, किसी ओर काले रङ्गका अजगर-रूपी योगगत कैवल्य, पुनः किसी ओर रक्षित धनका पात्र बहुत कम परिश्रमसे ही हाथमें आ जाता है। इसलिये वेदशास्त्रोंने कहा है कि कर्म, ज्ञान और योगको परित्यागकर भक्तिपथसे श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है ॥ 135 ॥ अनुभाष्य—'उपमेय',—जैसे, पूर्वदिशामें—श्रीकृष्णभक्ति, दक्षिणदिशामें—कर्मकाण्ड, पश्चिमदिशामें—सिद्धिकाण्ड (मतान्तरमें ज्ञानकाण्ड), उत्तरदिशामें—ज्ञानकाण्ड (मतान्तरमें योगकाण्ड)। और इनके 'उपमान',—जैसे, पूर्वदिशामें—पितृधन, दक्षिणदिशामें—ततैये और मधुमक्खी, पश्चिमदिशामें—यक्ष, उत्तरदिशामें—काला अजगर। दक्षिणा-मार्गीय साधन ही फलभोगपरक कर्मकाण्ड है; यमके द्वारा दण्डनीय 'दक्षिणा' ग्रहण करके फलका आरोप करते हैं। इस कर्ममार्गमें जीव भोगवासनारूपी ततैये, मधुमक्खी आदिके द्वारा डंक मारे जानेपर कष्ट प्राप्त करते हैं, इससे उनके भोगकी आशा पूर्ण नहीं होती, केवल उत्तरोत्तर वर्धित ही होती है। उत्तरा-मार्गीय साधन ही सिद्धिवाञ्छा-परायण योगमार्ग है; उसमें कैवल्यरूपी काले रङ्गका अजगर-सर्प शुद्धजीवकी सत्ताको ग्रास कर लेता है। किसीके मतानुसार, उत्तरा-मार्गीय साधन ही निष्काम-ज्ञानमार्ग है, वहाँ शुद्धजीवकी सत्ताको ब्रह्मसायुज्यरूपी काले सर्पने ग्रास कर रखा है। यक्ष धनका रक्षक है, धनको प्रदान करनेवाला नहीं। यक्षसे प्रार्थना करनेवालोंका विनाशके अतिरिक्त धनकी प्राप्ति दुराशामात्र है, अर्थात् धनके लोभसे प्रलोभित करके यक्ष अन्तमें धन पानेके अभिलाषी व्यक्तिका विनाश करनेवाला है; वास्तवमें ज्ञानमार्गमें अथवा योगमार्गमें सायुज्य अथवा कैवल्य, दोनों ही जीवकी सत्ताके संहारक हैं। श्रीकृष्णभक्ति ही बद्धजीवका 'पूर्व' अर्थात् सिद्धधन है। उसे प्राप्त करके शुद्धजीव नित्यकालके लिये धनी हो जाता है। भक्तिधन-हीन व्यक्ति जड़ीय नश्वर अभावोंसे ग्रस्त होकर कभी तो कर्मरूपी ततैयेके डंकसे छटपट करता है, धन प्राप्त नहीं करता; पुनः कभी श्रीकृष्णकी तरफ पीठ करके अहंग्रोपासनामें अथवा कैवल्यके साधनमें व्यस्त होकर योगरूपी यक्षके द्वारा प्रेमधनसे वञ्चित होता है; पुनः उत्तरमें अर्थात् 242 ।