श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1687, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/127-132 ] घरमें एक ज्योतिषीने आकर उसके दुःखको देखकर उससे पूछा, - 'तुम इतने दुःखी क्यों हो? तुम्हारे पिताने तुम्हारे लिये बहुत धन छोड़ा है। परन्तु तुम्हारे पिताने अन्य किसी स्थानपर शरीर छोड़ा था, इसलिये वे तुम्हें धनके विषयमें बतला नहीं पाये।' 127-128 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जीवकी श्रीकृष्ण-बहिर्मुखताके कारण उसकी स्वरूपस्मृतिके लुप्त होनेपर श्रीकृष्णने वेद-पुराणादिका प्रवर्त्तन करके स्वयंको प्रकाशित किया है। 'दरिद्र और ज्योतिषीकी कथा'—उसकी उपमा है॥ 127 ॥ अनुभाष्य- 'सर्वज्ञ'-भाः 5/5/10-13 माध्व-भाष्य देखें ॥ 127 ॥ अमृताणुकणा-छान्दोग्योपनिषद् (8वाँ प्रपाठक)- “त इमे सत्याः कामा अनृतापिधानास्तेषां सत्यानां सतामनृतमपिधानं xx अथ ये चास्येह जीवा ये च प्रेतामच्चान्यदिच्छन्न लभते सर्वं तदत्र गत्वा विन्दतेऽत्र ह्यस्यैते सत्याः कामा अनृतापिधानाः। तद् यथापि हिरण्यनिधिं निहितमक्षेत्रज्ञा उपर्युपरि सञ्चरन्तो न विन्देयुरेवमेवेमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः।” अर्थात् “इस जगत्में ये सब सत्यकामनाएँ आत्मामें विद्यमान रहनेपर भी अविद्यारूप असत्यके आवरणमें आवृत हैं। किन्तु आत्मदर्शी व्यक्ति सत्यकाम होकर इस लोकमें स्थित, परलोकमें स्थित अथवा अन्य जो कुछ दुर्लभ है, उन सबको हृदयाकाशमें गमनके द्वारा प्राप्त करता है। जैसे, पृथ्वीमें छिपे स्वर्ण आदि गुप्तधनके सम्बन्धमें अज्ञ व्यक्ति उस भूमिके ऊपर बार-बार विचरण करनेपर भी उसे प्राप्त नहीं कर सकता, वैसे ही सभी प्राणी अज्ञानके कारण हृदयमें अवस्थित ब्रह्मवस्तुको प्राप्त नहीं कर सकते।” 'सर्वज्ञ'-(भःरःसिः 2/1/182)- “परचित्तस्थितं देशकालाद्यन्तरितं तथा। यो जानाति समस्तार्थं स सर्वज्ञो निगद्यते॥” अर्थात् “जो दूसरोंके हृदयकी बात और देश- कालादिकी ढकी हुई सभी बातोंको जानता है, उसको सर्वज्ञ कहते हैं॥" 127-128 ॥ साध्य-प्रेमके साधनभूत भक्तिकी अवश्य-कर्त्तव्यता; शास्त्रमें इसीका ही विधान :- सर्वज्ञेर वाक्ये करे धनेर उद्देशे। ऐछे वेद-पुराण जीवे 'कृष्ण' उपदेशे॥ 129 ॥ अनुवाद-उपरोक्त दृष्टान्तमें ज्योतिषीके वचन जैसे धनके विषयमें निर्देश करते हैं, उसी प्रकार वेद-पुराण जीवको 'श्रीकृष्ण'के विषयमें बतलाते हैं॥ 129 ॥ जीवोंके नित्य सम्बन्धी श्रीकृष्ण ही सभी शास्त्रोंके उद्दिष्ट :- सर्वज्ञेर वाक्ये मूलधन अनुबन्ध। सर्वशास्त्रे उपदेशे, 'श्रीकृष्ण' - सम्बन्ध ॥ 130 ॥ अनुवाद-ज्योतिषीके वचनोंसे जिस प्रकार दरिद्र व्यक्तिको अपने धनके विषयमें पता चल जाता है, उसी प्रकार सभी शास्त्रोंके उपदेशोंसे जीवको श्रीकृष्णसे अपने सम्बन्धके विषयमें पता चल जाता है॥ 130 ॥ नित्यसिद्ध भावका प्राकट्य ही बद्धजीवका साधन :- 'बापेर धन आछे' - जाने, धन नाहि पाय। सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर उपाय ॥ 131 ॥ अनुवाद - 'पिताके द्वारा छोड़ा गया धन है' - ज्योतिषीके वचनानुसार दरिद्र व्यक्तिको इसे जानकर भी उस धनकी प्राप्ति नहीं होती। ज्योतिषी ही उसे प्राप्तिका उपाय भी बतलाता है॥ 131 ॥ अभक्ति-मार्ग-(1) भोगकी प्राप्तिके लिये कर्ममार्गमें विपत्तिकी आशङ्का :- 'एइ स्थाने आछे धन' - बलि' दक्षिणे खुदिबे। 'भीमरुल-वरुली' उठिबे, धन ना पाइबे ॥ 132 ॥ अनुवाद - 'इस स्थानपर धन है'-यह बताकर ज्योतिषीने कहा-यदि तुम दक्षिण भागमें खोदोगे, तो । 241