भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 1701, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 1701

बीसवाँ अध्याय 20/202-209 ] वैष्णवाचमन (हःभःविः तृतीय विः 202 संख्या)- “त्रिःपाने केशवं नारायणं माधबमप्यथ। प्रक्षालने द्वयोः पाण्योर्गोविन्दं विष्णुमप्युभौ॥ मधुसूदनमेकञ्च मार्जनेऽन्यं त्रिविक्रमम्। उन्मार्जनेऽप्यधरयोर्वामन-श्रीधरावुभौ॥ प्रक्षालने पुनः पाण्योर्हृषीकेशञ्च पादयोः। पद्मनाभं प्रोक्षणे तु मूर्ध्नोदामोदरं ततः॥ वासुदेवं मुखे सङ्कर्षणं प्रद्युम्नमित्युभौ। नासायोर्नेत्रयुगलेऽनिरुद्धं पुरुषोत्तमम्॥ अधोक्षजं नृसिंहञ्च कर्णयोर्नाभितोऽच्युतम्। जनार्द्दनञ्च हृदये उपेन्द्रं मस्तके ततः॥ दक्षिणे तु हरिं बाहौ वामे कृष्णं यथाविधि। नमोऽन्तञ्च चतुर्थ्यन्तमाचमेत् क्रमतो जपन्॥" [अर्थात् “तीन बार आचमनके समय केशव, श्रीनारायण और माधवको, उसके बाद दोनों हाथोंको धोनेमें श्रीगोविन्द और विष्णुको, एक हाथ धोनेमें मधुसूदनको और दूसरे हाथ धोनेमें त्रिविक्रमको, अधर और ओष्ठके मार्जनमें वामन और श्रीधर दोनोंको, पुनः दोनों हाथोंको धोनेमें हृषीकेशको, दोनों पैरोंको धोनेके समय पद्मनाभको और उसके बाद सिरको धोनेमें दामोदरको, मुखको धोनेमें वासुदेवको, दोनों नासिकाको धोनेमें सङ्कर्षण और प्रद्युम्नको, दोनों नेत्रोंमें अनिरुद्ध और पुरुषोत्तमको, दोनों कानोंमें अधोक्षज और नृसिंहको, नाभिदेशमें अच्युतको, हृदयमें जनार्दनको, उसके बाद मस्तकमें उपेन्द्रको, दाहिनी भुजामें हरिको और बायीं भुजामें कृष्णको यथाविधि क्रमानुसार (भगवद्-नामोंको) चतुर्थी विभक्तिके संयोगसे [जैसे केशवाय, नारायणाय आदि] अन्तमें नमः-शब्दके साथमें जप करते-करते आचमन करेंगे।”] ॥ 202 ॥ (ग) द्वितीय चतुर्व्यूहके प्रत्येककी दो मूर्तियाँ करके विलास-विग्रह - आठ वैभवविलास :- एइ चारिजनेर विलास-मूर्त्ति आर अष्ट जन। ताँ सबार नाम कहि, शुन, सनातन ॥ 203 ॥ पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्द्दन। हरि, कृष्ण, अधोक्षज, उपेन्द्र, —अष्टजन ॥ 204 ॥ वासुदेवेर विलास दुइ-अधोक्षज, पुरुषोत्तम। सङ्कर्षणेर विलास-उपेन्द्र, अच्युत, दुइजन ॥ 205 ॥ प्रद्युम्नेर विलास-नृसिंह, जनार्द्दन। अनिरुद्धेर विलास-हरि, कृष्ण, दुइजन ॥ 206 ॥ अनुवाद - इन चारों वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धके विस्तार आठ और विलास मूर्तियाँ हैं। हे सनातन-सुनो, मैं उन सबके नाम बतला रहा हूँ। ये आठ विलास-मूर्तियाँ- पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्दन, हरि, कृष्ण, अधोक्षज और उपेन्द्र हैं। वासुदेवके दो विलास-अधोक्षज और पुरुषोत्तम, सङ्कर्षणके दो विलास-उपेन्द्र और अच्युत, प्रद्युम्नके दो विलास-नृसिंह और जनार्दन तथा अनिरुद्धके दो विलास-हरि और कृष्ण हैं॥ 203-206 ॥ प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूहका ही विलास-वैभवविलास; अस्त्रके भेदसे नामकी विचित्रता :- एइ चब्बिश मूर्त्ति-प्राभवविलास प्रधान। अस्त्रधारण-भेदे धरे भिन्न भिन्न नाम ॥ 207 ॥ वेश और आकारके भेदसे पुनः इनका ही विलास-वैभव-वैचित्र्य :- इँहार मध्ये याहार हय आकार-वेश-भेद। सेइ सेइ हय विलास-वैभव-विभेद ॥ 208 ॥ अनुवाद-इन चौबीस मूर्तियोंमें प्राभवविलास आदि-चतुर्व्यूह प्रधान है। इनके अस्त्रोंको धारण करनेके भेदसे भिन्न-भिन्न नाम हैं। इनमेंसे जिनके आकार और वेशमें भेद होता है, वे विलास-वैभवका विभेद हैं॥ 207-208 ॥ आकारमें विचित्रतासे युक्त विष्णुमूर्तिगण :- पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन। हरि, कृष्ण आदि हय 'आकारें' विलक्षण ॥ 209 ॥ अनुवाद-पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन, हरि, कृष्ण आदि 'आकार' में विलक्षण (भिन्न) होते हैं॥ 209 ॥ । 255

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