श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1702, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/210-218 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला दूसरे चतुर्व्यूहके अतिरिक्त शेष बीस मूर्तियाँ विलास-विग्रह :- कृष्णेर प्राभवविलास—वासुदेवादि चारिजन। सेइ चारिजनेर विलास—विंशति गणन॥210॥ अनुवाद—वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध— ये चारों श्रीकृष्णके प्राभवविलास हैं। उन चारोंका विलास बीस प्रकारका होता है॥210॥ आठों दिशाओंके प्रत्येक ओर तीन-तीन मूर्ति करके चौबीस मूर्तियाँ ही वैकुण्ठमें अपने-अपने धाममें नित्य विराजमान :- इँहा सबार पृथक् वैकुण्ठ—परव्योम-धामे। पूर्वादि अष्टदिके तिन तिन क्रमे॥211॥ अनुवाद—परव्योम-धाममें इन सबके पूर्व-दिशासे आरम्भ करके क्रमशः आठों दिशाओंमें पृथक् वैकुण्ठ लोक हैं। आठों दिशाओंमें तीन-तीन करके कुल चौबीस मूर्तियाँ विराजमान हैं॥211॥ किसी-किसी तदेकात्मरूपका अपने-अपने धाम सहित ब्रह्माण्डमें अधिष्ठान :- यद्यपि परव्योम सबाकार नित्यधाम। तथापि ब्रह्माण्डे कारो काँहो सन्निधान॥212॥ अनुवाद—यद्यपि परव्योम सभीका नित्य धाम है, तथापि कोई-कोई अपने-अपने धाम सहित मायिक ब्रह्माण्डोंमें भी विद्यमान हैं॥212॥ वैकुण्ठमें दूसरे-चतुर्व्यूह आवरणके साथ श्रीनारायण, उसके ऊपर गोलोकमें अर्थात् पुरमें आदि-चतुर्व्यूह आवरणके साथ श्रीदेवकीनन्दन और गोकुलमें श्रीयशोदानन्दन :- परव्योम-मध्ये नारायणेर नित्य-स्थिति। परव्योम-उपरि कृष्णलोकेर विभूति॥213॥ अनुवाद—परव्योममें श्रीनारायणका नित्य-वास है, परव्योमके ऊपरी भागमें समस्त ऐश्वर्य-पूर्ण श्रीकृष्णलोक है॥213॥ कृष्णलोकमें तीन प्रकोष्ठ :- एक 'कृष्णलोक' हय त्रिविधप्रकार। गोकुलाख्य, मथुराख्य, द्वारकाख्य आर॥214॥ अनुवाद—एक ही 'कृष्णलोक'में गोकुल, मथुरा और द्वारका नामक तीन विभाग हैं॥214॥ ब्रह्माण्डमें चौबीस विभिन्न स्थानोंपर इन चौबीस मूर्तियोंका अपने-अपने धामके साथ अधिष्ठान :- मथुराते केशवेर नित्य सन्निधान। नीलाचले पुरुषोत्तम—'जगन्नाथ' नाम॥215॥ प्रयागे माधव, मन्दारे श्रीमधुसूदन। आनन्दारण्ये वासुदेव, पद्मनाभ, जनार्द्दन॥216॥ विष्णुकाञ्चीते विष्णु रहे, हरि मायापुरे। ऐछे आर नाना मूर्ति ब्रह्माण्ड-भितरे॥217॥ अनुवाद—मथुरामें श्रीकेशवका नित्य वास है। नीलाचलमें पुरुषोत्तम भगवान् 'जगन्नाथ'के नामसे नित्य वास करते हैं। भगवान् प्रयागमें बिन्दुमाधव, मन्दार-पर्वत पर श्रीमधुसूदन, आनन्दारण्यमें श्रीवासुदेव, पद्मनाभ और जनार्दन, विष्णुकाञ्चीमें विष्णु और मायापुरमें हरिके रूपमें नित्य रहते हैं। इस प्रकार ब्रह्माण्डमें उनकी और भी अनेक मूर्तियाँ विराजमान हैं॥215-217॥ अनुभाष्य—ब्रह्माण्डमें अर्च्चा-मूर्तिके रूपमें मथुरामें 'श्रीकेशव', नीलाचलमें 'पुरुषोत्तम जगन्नाथ', प्रयागमें 'बिन्दुमाधव', मन्दारमें 'मधुसूदन', केरल प्रान्तके दक्षिणमें आनन्दारण्यमें 'वासुदेव', 'पद्मनाभ' और 'जनार्दन', विष्णुकाञ्चीमें 'वरदराज विष्णु', मायापुरमें 'हरि' एवं अन्यान्य स्थानोंपर अनेक मूर्तियोंमें भगवान् विराजमान हैं॥215-217॥ भक्तोंको सुखी करना, धर्मकी स्थापना करना और अधर्मके नाशरूपी विलास अथवा लीलाके निमित्त ही ब्रह्माण्डमें उनका प्राकट्य :- एइमत ब्रह्माण्ड-मध्ये सबार 'परकाश'। सप्तद्वीपे नवखण्डे याँहार विलास॥218॥ 256