भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1703

बीसवाँ अध्याय 20/218-223 ] सर्वत्र प्रकाश ताँर—भक्ते सुख दिते। जगतेर अधर्म नाशि' धर्म स्थापिते ॥ 219 ॥ अनुवाद—इस प्रकार ब्रह्माण्डमें भगवान्‌का इन सब रूपोंमें 'प्रकाश' है। वे सात द्वीपोंके नौ खण्डोंमें वास करते हुए विलास करते हैं। भगवान् भक्तोंको सुखी करने और जगत्‌में अधर्मका नाश करके धर्मको स्थापित करनेके लिये ही सभी ब्रह्माण्डोंमें विभिन्न रूपोंमें प्रकाशित होते हैं॥ 218-219 ॥ अनुभाष्य—'सप्तद्वीप'—(सिद्धान्तशिरोमणिमें गोलाध्यायमें गोलप्रशंसा-प्रकरणमें)— “भूमेरर्द्धं क्षीरसिन्धोरुदकस्थं जम्बुद्वीपं प्राहुराचार्यवर्याः। अर्द्धेऽन्यस्मिन् द्वीपषट्कस्य याम्ये क्षारक्षीराद्याम्बुधीनां निवेशः॥ शाकं ततः शाल्मलमत्र कौशं क्रौञ्चञ्च गोमेदकपुष्करे च। द्वयोर्द्वयोरन्तरमेकमेकं समुद्रयोद्वीपमुदाहरन्ति॥” [अर्थात् “पृथ्वीके मध्यस्थलमें लवणसमुद्र है, उसके उत्तरमें पृथ्वीका आधा अंश और दक्षिणमें आधा अंश है। उत्तरके आधे अंशका नाम जम्बुद्वीप है और दक्षिणके आधे अंशमें सात समुद्र और नौ द्वीप हैं। पहले लवणसमुद्र है, उसके बाद दुग्धसमुद्र है जिससे अमृत, चन्द्र और लक्ष्मी प्रकट हुए हैं एवं जिसमें ब्रह्मादि देवताओंके पूजित चरणकमल और समस्त भुवनोंके आश्रय भगवान् वासुदेव वास करते हैं। उसके बाद क्रमशः दही, घी, गन्नेके रस, मद्य और सबसे अन्तमें स्वादुजलका समुद्र है। पृथ्वीके (लवणसमुद्रके) दायें आधे भागमें पहले शाकद्वीप, उसके बाद क्रमशः शाल्मल, क्रोश अथवा कुश, क्रोञ्च, गोमेदक और पुष्करद्वीप हैं। दो-दो समुद्रोंके बीचमें एक-एक द्वीप अवस्थित है।”] (1) जम्बु, (2) शाक, (3) शाल्मली, (4) कुश, (5) क्रौञ्च, (6) गोमेद अथवा प्लक्ष और (7) पुष्कर,—ये सप्तद्वीप हैं। 'नवखण्ड'—(1) भारत, (2) किन्नर (किंपुरुष), (3) हरि, (4) कुरु, (5) हिरण्मय, (6) रम्यक (रमणक), (7) इलावृत, (8) भद्राश्व, (9) केतुमाल— ये नवखण्ड अथवा वर्ष (जम्बुद्वीपके नौ अंश हैं); दो पर्वतोंके बीचवाले प्रदेशको 'खण्ड' अथवा 'वर्ष' कहते हैं—गोलाध्यायमें भुवनकोष देखें॥ 218 ॥ उनमेंसे कोई-कोई जगत्में अवतीर्ण :— इँहार मध्ये कारो हय 'अवतार' गणन। यैछे विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन ॥ 220 ॥ अनुवाद—इनमेंसे किसी-किसीकी अवतारोंमें गिनती होती है जैसे विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामनादि ॥ 220 ॥ अस्त्रके भेदसे परस्परके नामका वैचित्र्य :— अस्त्रधृति-भेद—नाम-भेदेर कारण। चक्रादि-धारण-भेद शुन, सनातन ॥ 221 ॥ दाक्षिणाधो हस्त हैते वामाधः पर्यन्त। चक्रादि अस्त्रधारण-गणनार अन्त ॥ 222 ॥ अनुवाद—इन विष्णु मूर्तियोंके द्वारा अस्त्रादिको धारण करनेके भेदसे ही इनके नामोंमें भेद है। हे सनातन, अब तुम चक्रादि अस्त्रोंके धारणके भेदके विषयमें सुनो। नीचेवाले दायें हाथसे लेकर नीचेवाले बायें हाथ तक चक्रादि अस्त्रोंको धारण करनेकी गणना पूर्ण होती है॥ 221-222 ॥ अनुभाष्य—चतुर्भुज विष्णुके दायें ओरके नीचेवाले हाथमें, दायें ओरके ऊपरवाले हाथमें, बाईं ओरके ऊपरवाले हाथमें और बाईं ओरके नीचेवाले हाथमें क्रमशः चार प्रकारके अस्त्र लिखे गये हैं॥ 222 ॥ सिद्धार्थ-संहिता-कथित चौबीस मूर्तियाँ :— सिद्धार्थ-संहिता करे चब्बिश मूर्ति गणन। तार मते आगे कहि चक्रादि-धारण ॥ 223 ॥ अनुवाद—सिद्धार्थ-संहितामें चौबीस मूर्तियोंकी गणना की गयी है। पहले मैं उसीके मतानुसार चक्रादि धारणके विषयमें बतला रहा हूँ॥ 223 ॥ । 257