भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1706

[ 20/237-239 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला आदिमूर्त्तेस्तु भेदोऽयं केशवेति प्रकीर्त्त्यते। अधरोत्तरभावेन कृतमेतत्तु यत्र वै। नारायणाख्या सा मूर्त्तिः स्थापिता भुक्तिमुक्तिदा॥ सव्याधः पङ्कजं यस्य पाञ्चजन्यं तथोपरि। दक्षिणाेर्द्धं गदा यस्य चक्रं चाधो व्यवस्थितम्। आदिमूर्त्तेस्तु भेदोऽयं माधवेति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाधःस्थितं चक्रं गदा यस्योपरि स्थिता। वामोर्द्ध्वसंस्थितं पद्मं शङ्खं चाधो व्यवस्थितम्। सङ्कर्षणस्य भेदोऽयं गोविन्देति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाेपरि पद्यन्तु गदा चाधो व्यवस्थिता। सङ्कर्षणस्य भेदोऽयं विष्णुरित्यभिशब्दते॥ दक्षिणाेपरि शङ्खश्च चक्रं चाधः प्रदृश्यते॥ वामोपरि तथा पद्मं गदा चाधः प्रदृश्यते। मधुसूदननामायं भेदः सङ्कर्षणस्य च॥ वामोर्द्धसंस्थितश्चक्रमधः शङ्खं प्रदृश्यते। ब्रह्माण्डगं वामपदं दक्षिणं शेषपृष्ठगम्। बलिवञ्चन संयुक्तं वामनाश्राप्यधःस्थितम्॥ वामोर्द्धे कौमोदी यस्य पुण्डरीकमधःस्थितम्। दक्षिणाेर्द्धं सहस्रारं पाञ्चजन्यमधःस्थितम्। सप्ततालप्रमाणेने वामनं कारयेत् सदा॥ ऊर्ध्वं दक्षिणतश्चक्रमधः पद्मं व्यवस्थितम्। पद्मा पद्मकरा वामे पार्श्वे यस्य व्यवस्थिता। स्थितो वाप्युपविष्टो वा सानुरागो विलासवान्। प्रद्युम्नस्य हि भेदोऽयं श्रीधरेति प्रकीर्त्त्यते॥ दक्षिणाेर्द्धं महाचक्रं कौमोदी तदधःस्थिता। वामोर्द्धे नलिनं यस्य अधः शङ्खं विराजते। हृषीकेशेति विज्ञेयः स्थापितः सर्वकामदः॥ दक्षिणाेर्द्धे पुण्डरीकं पाञ्चजन्यमधस्तथा। वामोर्द्धे संस्थितं चक्रं कौमोदी तदधःस्थिता। पद्मनाभेति सा मूर्त्तिः स्थापिता मोक्षदायिनी॥ दक्षिणाेर्द्धे पाञ्चजन्यमधस्तात्तु कुशेशयम्। सव्योर्द्धे कौमोदी चेव हेतिराजमधःस्थितम्। अनिरुद्धस्य भेदोऽयं दामोदर इति स्मृतः॥ एतेषान्तु स्त्रियो कार्ये पद्मवीणाधरे शुभे। इति क्रमेण मार्गादि-मासाधिपाः केशवादयो द्वादश॥ [अर्थात् "हयशीर्ष-पञ्चरात्रके अनुसारमें-आदिमूर्त्ति वासुदेव सङ्कर्षणको प्रकाश करते हैं। इस प्रकारसे प्रधानरूपमें कही गई चार मूर्तियाँ (वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) प्रत्येक तीन मूर्तियोंमें विभक्त होते हैं। वे केशवादिके भेदसे बारह मूर्तियाँ कहलाती हैं। जो दायें ओर नीचेवाले हाथमें पद्म और ऊपरवाले हाथमें पाञ्चजन्य शङ्ख, बाँयें ओर ऊपरवाले हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें चक्र धारण करते हैं—आदिमूर्त्ति श्रीवासुदेवके इस भेदको 'केशव'-नामसे कहा जाता है। केशव-मूर्तिके अस्त्रधारणके विपरीत क्रमसे जिस मूर्तिमें अस्त्रधारण होता है, वे भुक्तिमुक्तिप्रदाता 'श्रीनारायण'-नामसे कहे जाते हैं। जिनके बाँयें ओरके नीचे हाथमें पद्म और ऊपरवाले हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख, दायें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें चक्र—वे आदिमूर्तिके भेद 'माधव' नामसे विख्यात हैं। जिनके दायें नीचेवाले हाथमें चक्र और ऊपरवालेमें गदा, बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचेवालेमें शङ्ख है—सङ्कर्षणके ये भेद 'गोविन्द'-नामसे कहे जाते हैं। दायें ऊपरवाले हाथमें पद्म और नीचेवाले हाथमें गदा, बाँयें ऊपरवाले हाथमें शङ्ख और नीचेवाले हाथमें चक्र—सङ्कर्षणके ये भेद 'विष्णु'-नामसे कथित होते हैं। जिनके दायें ऊपरी हाथमें शङ्ख और नीचेमें चक्र दिखायी देता है, बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचे गदा दिखायी देते हैं—सङ्कर्षणके ये भेद 'मधुसूदन'-नामसे कहे जाते हैं। जिनके दायें नीचेवाले हाथमें पद्म और ऊपरी हाथमें गदा, बाँयें ऊपरी हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें शङ्ख दिखायी देता है, बाँया चरण ब्रह्माण्डगामी और दायाँ चरण अनन्तदेवकी पीठ तक जाता है—वे 'त्रिविक्रम' हैं। बलिकी वञ्चना करनेवाले और अधोलोकमें अवस्थित जिनके बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें पद्म तथा दायें ऊपरी हाथमें चक्र और नीचेवाले हाथमें शङ्ख—इस प्रकार 'श्रीवामन'देवकी मूर्ति सप्तताल-परिमाणमें निर्मित करनी होगी। दायें ऊपरी हाथमें चक्र नीचेवाले हाथमें पद्म, बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवाले हाथमें शङ्खयुक्त जिनके बाँयेंमें लक्ष्मीदेवी हस्तमें कमल लेकर अवस्थित हैं और जो खड़े हुए 260 ।