श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1707, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथवा बैठे हुए, इस प्रकार अनुरागयुक्त और विलासवान् 'श्रीधर' प्रद्युम्नके भेद कहलाये जाते हैं। जिनके दायें ऊपरी हाथमें महाचक्र, नीचेवाले हाथमें गदा और बाँयें ऊपरी हाथमें पद्म, नीचेवाले हाथमें शङ्ख विराजित हैं, उनको समस्त कामना पूर्ण करनेवाले 'हृषीकेश' जानना होगा। जिनके दायें ऊपरी हाथमें पद्म और नीचेवाले हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख एवं बाँयें ऊपरी हाथमें चक्र तथा नीचेवाले हाथमें गदा अवस्थित है, वह मूर्ति मोक्षप्रदाता 'पद्मनाभ'-नामसे प्रतिष्ठित है। दायें ऊपरी हाथमें पाञ्चजन्य-शङ्ख, नीचेवाले हाथमें पद्म और बाँयें ऊपरी हाथमें गदा और नीचेवालेमें चक्र—अनिरुद्धके इन भेदको 'दामोदर'-नामसे कहा जाता है। उन सबके साथ पद्म और वीणा धारण करनेवाली परमशुभा दो-दो स्त्रियाँ विद्यमान होती हैं। केशवादि बारह मूर्तियाँ इस प्रकारसे अग्रहायणादि सभी महीनोंके अधिपति हैं।] ॥ 237-239 ॥
व्रजेन्द्रनन्दनके दो नाम :- 'स्वयं भगवान्', आर 'लीला-पुरुषोत्तम'। एइ दुइ नाम धरे व्रजेन्द्रनन्दन ॥ 240 ॥
अनुवाद—व्रजेन्द्रनन्दन 'स्वयं भगवान्' और 'लीला-पुरुषोत्तम'—इन दो नामोंको धारण करते हैं॥ 240 ॥
मथुरा और द्वारकाके आवरणके रूपमें नवव्यूह :- पुरीर आवरणरूपे पुरीर नवदेशे। नवव्यूहरूपे नवमूर्त्ति परकाशे ॥ 241 ॥
अनुवाद—श्रीकृष्ण स्वयं मथुरा और द्वारकापुरीको आवृत करके उनकी रक्षा करते हैं। वे इन पुरियोंमें नौ स्थानोंपर नवव्यूहके रूपमें नौ मूर्तियाँ धारण करते हैं॥ 241 ॥
अनुभाष्य—यहाँपर देखने योग्य यह है कि इस नवव्यूहके अन्तर्गत वराह और हयग्रीव 'वैभवावस्थ' अवतार होनेपर भी 'परावस्थ'के समान हैं॥ 241 ॥
नवव्यूहका परिचय :- लघुभागवतामृत (1/451)में— चत्वारो वासुदेवाद्या नारायणनृसिंहकौ। हयग्रीवो वराहश्च ब्रह्मा चेति नवोदिताः ॥ 242 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 242 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—चतुर्व्यूहके वासुदेवादि चार विग्रह, श्रीनारायण, नृसिंह, हयग्रीव, वराह और ब्रह्मा,—ये नौ विग्रह हैं॥ 242 ॥
अनुभाष्य— वासुदेवाद्याः (वासुदेवसङ्कर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्धाः) चत्वारः (द्वितीय-व्यूहाः) नारायणनृसिंहकौ (नारायणः नृसिंहश्च द्वौ), हयग्रीवः, वराहश्च, ब्रह्मा च इति नवमूर्त्तयः (व्यूहाः) उदिताः (कथिताः—“तत्र ब्रह्मा तु विज्ञेयः पूर्वोक्तविधया हरिः” इति, “भवेत् क्वचिन्महाकल्पे ब्रह्मा जीवोऽप्युपासनैः। क्वचिदत्र महाविष्णुर्ब्रह्मत्वं प्रतिपद्यते॥” इति पाद्मवचनोक्तरीत्या ब्रह्मणोऽत्रेश्वरकोटित्वं ज्ञेयम्)।
श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें। (पूर्वोक्त विधिके अनुसार वहाँ जिन्हें ब्रह्मा कहा गया है, उन्हें श्रीहरि ही जानना होगा। किसी-किसी महाकल्पमें जीव भी उपासनाके द्वारा ब्रह्मा होते हैं, और किसी समयमें महाविष्णु ब्रह्मा-रूपमें प्रतिपादित होते हैं। इस पद्मपुराणमें कहे गये नियमके अनुसार इस स्थानपर ब्रह्माको ईश्वर-कोटिका जानना होगा।)॥ 242 ॥
अब तक श्रीकृष्णस्वरूपके छः प्रकारके विलासके अन्तर्गत प्राभव और वैभवरूपी दो प्रकारके प्रकाशोंका विलास वर्णित; अब स्वांश और शक्त्यावेशरूपी दो प्रकारके अवतारोंका वर्णन :- प्रकाश-विलासेर एइ कैलुँ विवरण। स्वांशेर भेद एबे शुन, सनातन ॥ 243 ॥
अनुवाद—हे सनातन, मैंने अब तक तुम्हें भगवान्के प्रकाश और विलासका विवरण सुनाया है। अब तुम स्वांशके भेदको सुनो ॥ 243 ॥
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