भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1709

बीसवाँ अध्याय 20/247-252 ] अनुवाद-बाल्य और पौगण्ड विग्रहका धर्म है। व्रजेन्द्रनन्दन श्रीकृष्ण इन (बाल्य और पौगण्ड) रूपोंमें लीला करते हैं॥247॥ श्रीकृष्णके असंख्य अवतार :- अनन्त अवतार कृष्णेर, नाहिक गणन। शाखा-चन्द्र-न्याय करि दिग्दर्शन॥248॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके असंख्य अवतार हैं, उनकी गणना नहीं की जा सकती। मैं तो केवल शाखा-चन्द्र-न्यायकी भाँति इनका दिग्दर्शन करा रहा हूँ॥248॥ अनुभाष्य - 'शाखा-चन्द्र-न्याय'-भूमिपर स्थित समतलमें वृक्षकी शाखाको निर्देश करके उसके पीछे आकाश-गोलमें स्थित चन्द्रके स्थानके निर्देशकी भाँति दिशाके प्रदर्शन मात्रको शाखा-चन्द्र-न्याय कहते हैं। अवतारसमूह लौकिक नेत्रोंके द्वारा देखे जानेपर भी वे मायिक नहीं हैं। उनकी अप्राकृत लीलाको अन्वय भावसे अनुगत जीवोंके द्वारा ही जाना जा सकता है, तर्कपन्थी लोगोंकी प्राकृत इन्द्रियोंके द्वारा वह ग्रहणीय नहीं है॥248॥ श्रीमद्भागवत (1/3/26)में- अवतारा ह्यसंख्येया हरेः सत्त्वनिधेर्द्विजाः। तथाऽविधासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः॥249॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥249॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे द्विजगणों! जैसे बहुत बड़े सरोवरमेंसे हजारों हजारों छोटे जलाशय उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार सत्त्वनिधि हरिके अवतार असंख्य हैं॥249॥ अनुभाष्य-शौनकादि ऋषियोंको श्रीसूत-गोस्वामी श्रीहरिके असंख्य अवतारोंकी कथाका वर्णन करके अवतारोंके असंख्य होनेके विषयमें बतला रहे हैं- हे द्विजाः, अविदासिनः (अपक्षयहीनात्) सरसः [सकाशात्] [यथा] कुल्याः (स्वल्पप्रवाहाः) सहस्रशः स्युः (सम्भवन्ति), तथा हि सत्त्वनिधेः (सर्वसत्त्वाश्रयस्य विशुद्धसत्त्वसेवधेः) हरेः असंख्येयाः (गणनातीताः) अवताराः। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥249॥ (क) सर्वप्रथम तीन पुरुषावतार- कारण-गर्भ-क्षीरसागरशायी :- प्रथमेइ करे कृष्ण 'पुरुषावतार'। सेइत पुरुष हय त्रिविध प्रकार॥250॥ अनुवाद-सर्वप्रथम श्रीकृष्ण 'पुरुषावतार' प्रकाशित करते हैं। वे पुरुषावतार तीन प्रकारके होते हैं॥250॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'सेइत पुरुष हय त्रिविध प्रकार'- यहाँ तक श्रीकृष्णके बहुत प्रकारके स्वरूपोंका विचार हुआ है। अब श्रीकृष्णकी शक्तिका विचार किया जायेगा॥250॥ लघुभागवतामृत (1/33)में सात्वततन्त्र-वाक्य :- विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः। एकन्तुः महतः स्रष्टृ तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्यते॥251॥ अनुवाद-नित्यधाममें विष्णुके तीन रूप हैं। प्रथम-महत्तत्त्वके स्रष्टा कारणाब्धिशायी महाविष्णु; द्वितीय-गर्भोदशायी और समष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष; तृतीय-क्षीरोदशायी व्यष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष, वे प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी ईश्वर और परमात्मा हैं। इन तीनोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव जड़बुद्धिसे मुक्त हो जाता है॥251॥ अनुभाष्य-आदिलीला 5/77 संख्या देखें॥251॥ एक श्रीकृष्ण ही तीन प्रकारकी स्वरूपशक्तिके अधिष्ठाता :- अनन्तशक्ति-मध्ये कृष्णेर तिन शक्ति प्रधान। 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति', 'ज्ञानशक्ति' नाम॥252॥ अनुवाद-श्रीकृष्णकी अनन्त शक्तियोंमेंसे उनकी तीन शक्तियाँ प्रधान हैं। वे 'इच्छाशक्ति', 'ज्ञानशक्ति' और 'क्रियाशक्ति'-इन तीन नामोंसे कही जाती हैं॥252॥ । 263