भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 1710

[ 20/253-259 श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत मध्यलीला स्वयं श्रीकृष्ण-इच्छा अथवा आनन्दशक्तिके एवं चतुर्व्यूहके बीचमें (1) वासुदेवरूपमें वे ही संवित्शक्तिके प्रभु :- इच्छाशक्ति-प्रधान कृष्ण-इच्छाय सर्वकर्त्ता। ज्ञानशक्ति-प्रधान वासुदेव अधिष्ठाता ॥ 253 ॥ इच्छा-ज्ञान-क्रिया बिना ना हय सृजन। तिनेर तिनशक्ति मेलि' प्रपञ्च-रचन ॥ 254 ॥ अनुवाद—इच्छाशक्तिके अधिष्ठातृ देवता श्रीकृष्ण हैं, उनकी इच्छासे ही सभी वस्तुएँ प्रकाशित होती हैं। इच्छाशक्तिके साथ ज्ञानकी भी आवश्यकता होती है और ज्ञानशक्तिके अधिष्ठातृ देवता वासुदेव हैं। इच्छा, ज्ञान और क्रियाशक्तिके बिना सृष्टि नहीं होती। तीनों अधिष्ठातृ देवताओंकी शक्तियाँ परस्पर मिलकर प्रपञ्चकी (भौतिक जगत्की) रचना करती हैं॥ 253-254 ॥ वे ही श्रीबलराम अथवा श्रीसङ्कर्षणके रूपमें सन्धिनीशक्तिके प्रभु, तीन प्रकारकी शक्तियोंके द्वारा चिद्-अचिद् जगत्का प्राकट्य :- क्रियाशक्ति-प्रधान सङ्कर्षण बलराम। प्राकृताप्राकृत-सृष्टि करेन निर्माण ॥ 255 ॥ अनुवाद—क्रिया-शक्तिके अधिष्ठातृ देवता श्रीसङ्कर्षण ही श्रीबलराम हैं। वे प्राकृत और अप्राकृत, दोनों प्रकारकी सृष्टिकी उत्पत्ति करते हैं ॥ 255 ॥ श्रीसङ्कर्षण ही आदिपुरुष अथवा कारणशायी और चिद्वैभवकी सत्ताके कारण :- अहङ्कारेर अधिष्ठाता कृष्णेर इच्छाय। गोलोक, वैकुण्ठ सृजे चिच्छक्तिद्वाराय ॥ 256 ॥ अनुवाद—अहङ्कारके अधिष्ठातृ देवता श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णकी इच्छासे चिद्-शक्तिके द्वारा गोलोक और वैकुण्ठका सृजन करते हैं ॥ 256 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—उन अद्वयतत्त्व श्रीकृष्णकी अनन्त शक्तियाँ हैं, उनमेंसे 'इच्छाशक्ति', 'क्रियाशक्ति' और 'ज्ञानशक्ति'—सभी कार्योंमें ही इन तीनोंका विशेष परिचय मिलता है। 'इच्छाशक्ति'के प्रधान—'श्रीकृष्ण' हैं, जिनकी इच्छासे ही समस्त कार्य होते हैं; 'ज्ञानशक्ति'के प्रधान—'वासुदेव' और 'क्रियाशक्ति'के प्रधान—'सङ्कर्षण' हैं। इन तीनोंकी इन शक्तियोंको लेकर ही प्राकृत-अप्राकृत जगत्की सृष्टि अथवा प्रकाश होता है। अहङ्कारके अधिष्ठाता 'सङ्कर्षण'ने श्रीकृष्णकी इच्छासे चिद्-शक्तिके द्वारा चिद्-शक्तिविलासरूप गोलोक-वैकुण्ठादि धाम प्रकट किये हैं॥ 252-256 ॥ चिद्-शक्ति विलास तद्रूपवैभव सङ्कर्षणसे प्रकाशित :- यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्तिविलास। तथापि सङ्कर्षण-इच्छाय ताहार प्रकाश ॥ 257 ॥ अनुवाद—यद्यपि चिद्-शक्तिके विलास वैकुण्ठादिके नित्यत्वके कारण उनकी सृष्टि सम्भव नहीं है, तथापि सङ्कर्षणकी इच्छासे उनका प्रकाश होता है ॥ 257 ॥ अनन्तरूपी सङ्कर्षणसे गोलोकधामका प्राकट्य :- ब्रह्मसंहिता (5/2)में— सहस्रपत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत्पदम्। तत्कर्णिकारं तद्धाम तदनन्तांशसम्भवम् ॥ 258 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 258 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—गोकुल-नामक महत्पद—सौ पत्तोंवाले कमलके समान है; उसकी कर्णिका ही उसका आधार है, सब कुछ ही अनन्तके (बलदेवके) अंशसे उत्पन्न हुआ है ॥ 258 ॥ अनुभाष्य— गोकुलाख्यं महत्पदं (तद्रूपवैभवश्रेष्ठं धाम)—सहस्रपत्रं कमलं (सहस्रदल-पद्ममिव); तत्कर्णिकारं (तत्पद्मपुष्पमध्यम् एव) तद्धाम (तस्य कृष्णस्य धाम); तत्-अनन्तांशसम्भवं (बलदेवांशजातम्)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 258 ॥ सांख्यवादका खण्डन, सङ्कर्षणकी ईक्षणशक्तिसे क्षुब्ध जड़ीय माया ही क्रियावती होकर विश्वकी सृष्टि करनेवाली :- माया-द्वारे सृजे तें हो ब्रह्माण्डेर गण। जड़रूपा प्रकृति नहे ब्रह्माण्ड-कारण ॥ 259 ॥ 264 ।