श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 1711, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंबीसवाँ अध्याय 20/259-265
जड़ हैते सृष्टि नहे ईश्वरशक्ति बिने। ताहातेइ सङ्कर्षण करे शक्तिर आधाने ॥ 260 ॥ उपमा :- ईश्वरेर शक्त्ये सृष्टि करये प्रकृति। लौह येन अग्निशक्त्ये पाय दाह-शक्ति ॥ 261 ॥
अनुवाद—मायाके द्वारा सङ्कर्षण ही ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं। जड़रूपा प्रकृति ब्रह्माण्डका कारण नहीं है। ईश्वरकी शक्तिके बिना जड़से सृष्टि नहीं हो सकती। जड़रूपा प्रकृतिमें सङ्कर्षण ही शक्तिका सञ्चार करते हैं। ईश्वरकी शक्तिसे ही प्रकृति सृष्टि करती है, जैसे लोहा अग्निकी शक्तिसे दाहक-शक्ति (जलानेकी शक्ति) प्राप्त करता है ॥ 259-261 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/60-64 संख्या देखें ॥ 259-261 ॥
श्रीबलराम-कृष्ण ही विश्वके एकमात्र जनक और नियामक :- श्रीमद्भागवत (10/46/31)में— एतौ हि विश्वस्य च बीजयोनी रामो मुकुन्दः पुरुषः प्रधानम्। अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्य ज्ञानस्य चेशात इमौ पुराणौ ॥ 262 ॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 262 ॥
अमृतप्रवाह भाष्य—ये—राम-कृष्ण, इस विश्वके बीजयोनिस্বরূপ हैं। इन दोनोंने ही समस्त भूतोंमें प्रवेश करके परस्पर भेद-ज्ञान उत्पन्न किया है ॥ 262 ॥
अनुभाष्य—श्रीकृष्णके अनुरोधसे व्रजवासियोंके श्रीकृष्णके विरहसे उत्पन्न शोकको कम करनेके उद्देश्यसे महात्मा उद्धवके व्रजमें आकर विश्राम करनेके बाद श्रीनन्दके द्वारा श्रीकृष्णके सम्बन्धमें जिज्ञासा करनेपर श्रीनन्द-यशोदाको उद्धवजीके द्वारा श्रीकृष्णके माहात्म्यका वर्णन,—
रामः मुकुन्दश्च इति एतौ—विश्वस्य बीजयोनी (निमित्तोपादाने), पुरुषः (अंशः), प्रधानं (शक्तिः) [अतः प्रधान-पुरुषौ अपि एतौ एवेत्यर्थः,—एवमनयोर्जनकत्वमुक्तम्]; इमौ—पुराणौ (अनादी, सनातनौ; अतः) भूतेषु अन्वीय (अनुप्रविश्य) [भूतानां तदुपहितस्य] विलक्षणस्य (नानाभेदस्य) ज्ञानस्य (जीवस्य) च ईशाते (नियन्तारौ भवतः; एवमनयोर्नियन्तृत्वमप्युक्तम्)।
श्लोक-भावानुवाद—बलराम और श्रीकृष्ण इस विश्वके बीजयोनि स्वरूप (निमित्त और उपादानस्वरूप) हैं, ये ही पुरुष (कारणोदशायी विष्णु) और प्रधान (शक्ति) हैं [इसलिये इन्हें सभीका जनक कहा गया है]। इन दोनों अनादी पुरुषोंने ही समस्त भूतोंमें अन्तर्यामीरूपमें प्रवेश करके परस्पर भेद-ज्ञान उत्पन्न किया है [इसलिये ये सभीके नियन्ता कहे गये हैं] ॥ 262 ॥
प्रपञ्चातीत धामसे कृपापूर्वक प्रपञ्चमें प्राकट्य और अवतरण ही अवतार :- सृष्टि-हेतु येइ मूर्त्ति प्रपञ्चे अवतरे। सेइ ईश्वरमूर्त्ति 'अवतार' नाम धरे ॥ 263 ॥ मायातीत परव्योमे सबार अवस्थान। विश्वे अवतरि' धरे 'अवतार' नाम ॥ 264 ॥
अनुवाद—सृष्टिके लिये जो विग्रह प्रपञ्चमें अवतरित होते हैं, उन्हीं विग्रहोंको 'अवतार' कहते हैं। ये सब विग्रह मायातीत परव्योममें ही वास करते हैं। इस विश्वमें अवतरित होनेके कारण उन्हें 'अवतार' कहते हैं ॥ 263-264 ॥
अनुभाष्य—आदिलीला 5/81 संख्या देखें ॥ 264 ॥
सङ्कर्षण ही प्रकृतिके प्रति ईक्षण और बीज बोनेवाले आदि-पुरुषावतार :- सेइ माया अवलोकिते श्रीसङ्कर्षण। पुरुषरूपे अवतीर्ण हइला प्रथम ॥ 265 ॥
अनुवाद—मायापर ईक्षण करके उसमें शक्ति सञ्चारित करनेके लिये ही श्रीसङ्कर्षण प्रथम-पुरुषके रूपमें अवतीर्ण हुए ॥ 265 ॥
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